धीरूभाई ने भारत को सिर्फ बचत नहीं, निवेश करना सिखाया:शेयर बाजार को मध्यमवर्गीय परिवारों तक पहुंचाया, बड़े सपनों का साझेदार बनाया

धीरूभाई ने भारत को सिर्फ बचत नहीं, निवेश करना सिखाया:शेयर बाजार को मध्यमवर्गीय परिवारों तक पहुंचाया, बड़े सपनों का साझेदार बनाया

गुजरात हमेशा से व्यापार, बचत और सोच-समझकर जोखिम उठाने के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन गुजरात के चोरवाड से निकले एक व्यक्ति ने गुजरात और पूरे देश को दिखाया कि इन खूबियों से कितनी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है। उनका नाम था धीरूभाई अंबानी। उस दौर में भारत का शेयर बाजार कुछ अमीर कारोबारियों और बड़े व्यावसायिक परिवारों तक सीमित था। आम मध्यमवर्गीय परिवार अपने पैसे सोने, जमीन या बैंक में जमा करते थे। किसी बड़ी कंपनी में हिस्सेदारी खरीदने के बारे में वे शायद ही सोचते थे। धीरूभाई अंबानी ने इस सोच को बदल दिया। उनके पास न कोई विरासत में मिला कारोबारी साम्राज्य था और न ही कोई बड़ा व्यावसायिक परिवार। उनके पास एक ऐसी सोच थी, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वे बड़े सपने देखते थे और आम लोगों को भी उन सपनों का भागीदार बनाना चाहते थे। आज भारत में स्टार्टअप और बड़ी कंपनियों की चर्चा होती है, लेकिन धीरूभाई ने बहुत पहले ही एक नए कारोबारी की तरह अपना सफर शुरू किया था। चोरवाड से अदन तक का सफर धीरूभाई अंबानी का जन्म 1932 में सौराष्ट्र के तटीय इलाके चोरवाड में एक साधारण परिवार में हुआ था। किशोरावस्था में ही वे काम की तलाश में यमन के अदन शहर चले गए। वहां उन्होंने ए. बेस्से एंड कंपनी में क्लर्क के रूप में काम शुरू किया। बाद में वे कंपनी के पेट्रोलियम कारोबार से जुड़े एक तेल भरने वाले स्टेशन का प्रबंधन करने लगे। अदन उनके लिए किसी बिजनेस स्कूल से कम नहीं था। वहां उन्होंने जहाजों, व्यापारियों और अलग-अलग देशों के बीच होने वाले कारोबार को करीब से देखा। उन्होंने सीखा कि व्यापार केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपके पास क्या है, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि आप अवसरों को कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं। मुंबई लौटने के बाद उन्होंने छोटा व्यापार शुरू किया। पहले मसालों का कारोबार किया, फिर धागे के व्यापार में उतरे और आगे चलकर विनिर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। 1966 में गुजरात के नरोडा में उन्होंने कपड़ा मिल शुरू की। इसी से विमल ब्रांड को पहचान मिली, जो जल्द ही घर-घर में मशहूर हो गया। एक सवाल जिसने भारतीय निवेश की सोच बदल दी धीरूभाई का सबसे बड़ा विचार एक सरल लेकिन क्रांतिकारी सवाल में छिपा था। अगर भारत के लाखों परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत से पैसे बचाते हैं, तो वे बड़ी कंपनियों के बनाए उत्पादों के केवल ग्राहक ही क्यों बने रहें? वे उन कंपनियों के मालिक भी क्यों नहीं बन सकते? इसका जवाब 1977 में मिला, जब रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज पहली बार शेयर बाजार में उतरी। कंपनी के शेयरों की मांग उपलब्ध शेयरों से सात गुना ज्यादा रही। इसके बाद एक शिक्षक, छोटा व्यापारी या नौकरी करने वाला व्यक्ति भी तेजी से बढ़ती औद्योगिक कंपनी में हिस्सेदारी खरीद सकता था। वह कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट, लाभांश और बोनस शेयरों के जरिए उसकी तरक्की पर नजर रख सकता था। धीरूभाई ने भारत में शेयर बाजार की शुरुआत नहीं की थी। देश में शेयर बाजार उनसे बहुत पहले से मौजूद था। लेकिन उन्होंने बड़े पैमाने पर आम लोगों को शेयर बाजार से जोड़ा। उन्होंने शेयरों में निवेश को कुछ अमीर लोगों के विशेषाधिकार से निकालकर आम लोगों के सपनों का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिलायंस की तरक्की से उसके शुरुआती कई निवेशकों ने अच्छी संपत्ति बनाई। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि लोगों के मन में यह भरोसा पैदा हुआ कि किसी कंपनी की सफलता का लाभ उन लोगों को भी मिल सकता है, जिन्होंने उस पर विश्वास करके पैसा लगाया है। अपनी मेहनत से कारोबार का साम्राज्य खड़ा किया उस समय भारतीय उद्योग जगत में टाटा, बिड़ला और बॉम्बे डाइंग जैसे बड़े नामों का दबदबा था। ऐसे माहौल में धीरूभाई एक ऐसे उद्यमी के रूप में उभरे, जिन्होंने अपनी मेहनत से कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया। गुजरात के लिए यह सिर्फ एक कारोबारी उपलब्धि नहीं, बल्कि गर्व का विषय था। राज्य के शहरों और कस्बों में बचत और निवेश की मजबूत परंपरा रही है। ऐसे में रिलायंस को लोगों के बीच अच्छी स्वीकार्यता मिली। धीरूभाई इसी मिट्टी से निकले थे। उनकी सफलता ने गुजरात के लोगों के उस विश्वास को मजबूती दी कि कारोबार, मेहनत, लगन और जोखिम उठाने का साहस किसी की भी किस्मत बदल सकता है। इसी उद्यमशीलता को गुजराती अस्मिता से जोड़कर देखा गया। धीरूभाई अंबानी को ‘औद्योगिक गुजरात का नाथ’ यानी औद्योगिक गुजरात का प्रमुख व्यक्तित्व या पितामह, कहा जाने लगा। एक ऐसा अवसर, जो आज भी कायम है धीरूभाई ने 1977 में गुजरात को जो सबसे बड़ा उपहार दिया, वह न कोई कारखाना था और न ही कोई ब्रांड। वह एक अवसर था। भारत की आर्थिक तरक्की को बाहर से देखने के बजाय उसका हिस्सा बनने का अवसर।
जिन लोगों ने इस अवसर को स्वीकार किया, वे देश की बड़ी कारोबारी सफलता की कहानियों के भागीदार बने। यह अवसर आगे की दो पीढ़ियों तक पहुंचा और आज भी मौजूद है। गुजरात के सामने आज भी लगभग वही सवाल है, जो करीब पांच दशक पहले था- जब विकास का अगला अध्याय लिखा जाएगा, तो क्या आप केवल उसे देखेंगे या उसमें भागीदार भी बनेंगे?

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