टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल 5 साल बढ़ाने को टाटा ट्रस्ट ने गलत बताया है। टाटा ट्रस्ट का कहना है कि सिर्फ बोर्ड में बहुमत से वोट मिलने से चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति नहीं हो सकती। कंपनी के नियमों में उनके द्वारा नामित डायरेक्टर्स की सहमति भी जरूरी है। ट्रस्ट्स ने कहा- उनके नॉमिनी डायरेक्टर नोएल टाटा के विरोध के बाद भी यह प्रस्ताव पास होना अवैध है। बता दें कि टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 66% हिस्सेदारी है, इसलिए ट्रस्ट की आपत्ति का कंपनी के कंट्रोल और लीडरशिप पर असर पड़ सकता है। टाटा सन्स के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल 17 सितंबर को 5 साल बढ़ाकर 2032 तक कर दिया गया। वे फरवरी 2027 में रिटायर होने वाले थे। चंद्रशेखरन ने पिछले महीने 12 अगस्त 2026 को इस्तीफा दे दिया था। तब नोएल टाटा से मतभेद और ट्रस्ट में खींचतान की वजह बनी थी। एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने के फैसले को अभी सालाना आम बैठक में मंजूरी मिलना बाकी है, जिसमें टाटा ट्रस्ट की 66% हिस्सेदारी है। 2 नॉमिनी डायरेक्टर्स में बहुमत के लिए 2 वोटों की जरूरत, 1 की नहीं टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन यानी कंपनी के कानून के मुताबिक, किसी भी बड़े फैसले या प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नोमिनेटेड डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन अनिवार्य है। 17 सितंबर की मीटिंग में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट के खिलाफ वोट दिया था, जबकि ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया था। पूरे बोर्ड में प्रस्ताव के पक्ष में 4 और विपक्ष में 1 वोट पड़ा था। हालांकि, ट्रस्ट्स का कहना है कि जब बोर्ड में उनके 2 प्रतिनिधि हैं, तो बहुमत का मतलब 2 वोट होता है, न कि 1। ऐसे में यह शर्त पूरी नहीं हुई और प्रस्ताव खारिज माना जाएगा। टाटा ट्रस्ट्स ने कहा- स्पेशल वोट से प्रस्ताव पास नहीं किया जा सकता
टाटा ट्रस्ट्स ने साफ किया कि जब कोई प्रस्ताव नियम के तहत पहले ही खारिज हो चुका हो, तो चेयरमैन अपने स्पेशल वोट का इस्तेमाल करके उसे दोबारा मंजूर नहीं करा सकते। ट्रस्ट्स का कहना है कि दोनों प्रतिनिधियों के अलग-अलग वोट देने से कोई भ्रम या अड़चन पैदा नहीं हुई थी। नियम (AoA) के मुताबिक, जवाब पहले से ही ‘ना’ था। चेयरमैन का स्पेशल वोट सिर्फ तब काम आता है, जब पक्ष और विपक्ष में बराबर-बराबर वोट पड़े हों, खारिज हो चुके फैसले को बदलने के लिए नहीं।
2027 में खत्म हो रहा कार्यकाल, नया चेयरमैन चुनने की मांग एन चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म हो रहा है। उन्होंने पहले संकेत दिया था कि वे अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद अगला टर्म नहीं लेंगे। नोएल टाटा का मानना है कि टाटा समूह को अब नए नेतृत्व की ओर बढ़ना चाहिए और टाटा संस के आर्टिकल्स में नए चेयरमैन के चयन के लिए तय की गई प्रक्रिया को तुरंत शुरू कर देना चाहिए। 12 अगस्त को कहा- अगला कार्यकाल नहीं लेंगे, 17 सितंबर को कार्यकाल बढ़ा 63 साल के चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 तक है। उन्होंने 12 अगस्त को कहा था कि वे अगला कार्यकाल नहीं लेंगे। इसके बाद नॉमिनेशन कमेटी ने 3 सितंबर को उनसे अपने फैसले पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया। 17 सितंबर को चंद्रशेखरन तैयार हो गए। मामला 1-1 पर अटका, तो कानूनी राय के बाद आया निर्णायक वोट गुरुवार को टाटा संस की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव आया तो टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर आमने-सामने हो गए। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने पक्ष में वोट दिया। यानी नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच मुकाबला 1-1 से बराबर हो गया। बैठक में मौजूद एक डायरेक्टर के मुताबिक, यहीं कंपनी सचिव ने कानूनी राय सामने रखी कि बराबरी की स्थिति में चेयरमैन कास्टिंग यानी निर्णायक वोट दे सकते हैं। इसके बाद चंद्रशेखरन ने अपनी ही दोबारा नियुक्ति के पक्ष में निर्णायक वोट दिया और प्रस्ताव आगे बढ़ गया। टाटा ट्रस्ट्स चेयरमैन के कास्टिंग वोट को भी गलत बता रहा है। विवाद की जड़ अनुच्छेद 121ए: नोएल का विरोध टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 121ए पर आधारित था। इसके मुताबिक, चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति के लिए नॉमिनी डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन जरूरी है। नोएल के खिलाफ वोट देते ही यह शर्त पूरी नहीं हुई और प्रस्ताव ‘कानूनी रूप से शून्य’ हो गया। ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस शर्त को चेयरमैन के कास्टिंग वोट से पूरा नहीं किया जा सकता। आगे क्या… एजीएम अहम: बोर्ड का फैसला अंतिम पड़ाव नहीं है। अब जनरल बॉडी मीटिंग में शेयरधारकों की मंजूरी ली जाएगी। यहां टाटा ट्रस्ट्स 66% हिस्सेदारी के चलते मजबूत स्थिति में है। इसलिए वहां नया विवाद सामने आ सकता है। फैसले को कानूनी चुनौती भी दी जा सकती है। टाटा ग्रुप, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में फर्क जानिए टाटा ग्रुपः टाटा नाम से चलने वाली अलग-अलग कंपनियों और कारोबारों को मिलाकर टाटा ग्रुप बनता है। जैसे- टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और एअर इंडिया। टाटा संसः टाटा संस, टाटा ग्रुप की मुख्य कंपनी है। यह ग्रुप की बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है और बड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाती है। टाटा ट्रस्ट्सः टाटा ट्रस्ट्स सामाजिक और परोपकारी काम करने वाले ट्रस्टों का समूह है। इसके पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। टाटा में चंद्रशेखरन अहम क्यों? ग्रुप में पहली बार रिटायरमेंट की उम्र के बाद भी कार्यकाल बढ़ा टाटा ग्रुप में पहली बार कोई ग्रुप एग्जीक्यूटिव 65 साल की तय रिटायरमेंट उम्र के बाद भी पद पर बना रहेगा। टाटा ग्रुप की पॉलिसी के मुताबिक एग्जीक्यूटिव आमतौर पर 65 साल की उम्र में रिटायर होते हैं। हालांकि, नॉन-एग्जीक्यूटिव पद पर वे 70 साल तक रह सकते हैं। चंद्रशेखरन अभी 63 साल के हैं। उनका नया कार्यकाल 2032 में खत्म होगा, तब वे 70 साल के होंगे। चंद्रशेखरन अक्टूबर 2016 में पहली बार टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे। जनवरी 2017 में उन्हें चेयरमैन बनाया गया। उन्होंने 1987 में TCS में इंटर्न के तौर पर करियर शुरू किया था। —————————- ये खबर भी पढ़ें… टाटा-संस को 3 साल में IPO लाना ही होगा: RBI ने शेयर मार्केट में लिस्ट न होने की अर्जी खारिज की, छोटे निवेशकों को मौका मिलेगा टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को 3 साल में अपना IPO लाना ही होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने टाटा संस की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने NBFC यानी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी का दर्जा छोड़ने की मांग की थी। टाटा संस ने 2024 में ₹21,813 करोड़ का अपना सारा कर्ज चुका दिया था। कंपनी का कहना था कि अब उस पर कोई कर्ज नहीं है, इसलिए उसे NBFC की कैटेगरी से बाहर किया जाए, लेकिन RBI ने इस मांग को नहीं माना। पूरी खबर पढ़ें…

