बोकारो स्टील प्लांट बनने से पहले माराफारी क्षेत्र की अपनी पहचान थी। इसी इलाके में मां चंचली देवी का एक प्राचीन मंदिर है, जो आज भी उस दौर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। यहां मां की पूजा सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है। महानवमी पर यहां विशेष पूजा और बलि की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी गोपाल पांडे के मुताबिक, मां चंचली देवी माराफारी के जमींदार ठाकुर सरजू प्रसाद सिंह के परिवार की कुलदेवी हैं। माना जाता है कि देवी की स्थापना उनके पूर्वजों ने की थी। मंदिर की स्थापना का कोई निश्चित साल नहीं पता, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार यह बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण से भी पहले से श्रद्धा का केंद्र रहा है। 24 घंटे जलती रहती है अखंड ज्योति मंदिर की खासियत यहां स्थापित मां की पिंडी और गर्भगृह में जलने वाली अखंड ज्योति है। पुजारी गोपाल पांडे बताते हैं कि मां के दरबार में 24 घंटे दीपक प्रज्ज्वलित रहता है। उनके पिता स्वर्गीय बद्रीनाथ पांडे मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। अब वह स्वयं मां की सेवा कर रहे हैं। इस तरह पांडे परिवार पीढ़ियों से मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहा है। नवरात्र की नवमी पर विशेष पूजा आश्विन नवरात्र की महानवमी मंदिर का प्रमुख धार्मिक अवसर है। इस दिन मां की विशेष पूजा होती है और परंपरा के अनुसार बलि अर्पित की जाती है। दूर-दराज में रहने वाले श्रद्धालु भी इस मौके पर दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुजारी के मुताबिक, बोकारो स्टील प्लांट से जुड़े रहे कई लोग सेवानिवृत्त होकर दूसरे स्थानों पर चले गए हैं, लेकिन मां के प्रति आस्था उन्हें दोबारा यहां खींच लाती है। बिहार और झारखंड सहित देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतिहास और आस्था का संगम स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्लांट निर्माण के दौरान भी श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर को बाउंड्री वॉल के बाहर रखा गया, ताकि पूजा-अर्चना जारी रह सके। वर्ष 1971 में मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसे कंक्रीट संरचना दी गई। आज यहां पूजा के साथ शादी-विवाह जैसे धार्मिक आयोजन भी होते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग से यात्री शेड और धर्मशाला की सुविधा भी विकसित की गई है। मां चंचली का यह दरबार आज भी माराफारी की ऐतिहासिक पहचान और बोकारोवासियों की अटूट आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। बोकारो स्टील प्लांट बनने से पहले माराफारी क्षेत्र की अपनी पहचान थी। इसी इलाके में मां चंचली देवी का एक प्राचीन मंदिर है, जो आज भी उस दौर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। यहां मां की पूजा सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है। महानवमी पर यहां विशेष पूजा और बलि की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर के पुजारी गोपाल पांडे के मुताबिक, मां चंचली देवी माराफारी के जमींदार ठाकुर सरजू प्रसाद सिंह के परिवार की कुलदेवी हैं। माना जाता है कि देवी की स्थापना उनके पूर्वजों ने की थी। मंदिर की स्थापना का कोई निश्चित साल नहीं पता, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार यह बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण से भी पहले से श्रद्धा का केंद्र रहा है। 24 घंटे जलती रहती है अखंड ज्योति मंदिर की खासियत यहां स्थापित मां की पिंडी और गर्भगृह में जलने वाली अखंड ज्योति है। पुजारी गोपाल पांडे बताते हैं कि मां के दरबार में 24 घंटे दीपक प्रज्ज्वलित रहता है। उनके पिता स्वर्गीय बद्रीनाथ पांडे मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। अब वह स्वयं मां की सेवा कर रहे हैं। इस तरह पांडे परिवार पीढ़ियों से मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहा है। नवरात्र की नवमी पर विशेष पूजा आश्विन नवरात्र की महानवमी मंदिर का प्रमुख धार्मिक अवसर है। इस दिन मां की विशेष पूजा होती है और परंपरा के अनुसार बलि अर्पित की जाती है। दूर-दराज में रहने वाले श्रद्धालु भी इस मौके पर दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुजारी के मुताबिक, बोकारो स्टील प्लांट से जुड़े रहे कई लोग सेवानिवृत्त होकर दूसरे स्थानों पर चले गए हैं, लेकिन मां के प्रति आस्था उन्हें दोबारा यहां खींच लाती है। बिहार और झारखंड सहित देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतिहास और आस्था का संगम स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्लांट निर्माण के दौरान भी श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर को बाउंड्री वॉल के बाहर रखा गया, ताकि पूजा-अर्चना जारी रह सके। वर्ष 1971 में मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसे कंक्रीट संरचना दी गई। आज यहां पूजा के साथ शादी-विवाह जैसे धार्मिक आयोजन भी होते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग से यात्री शेड और धर्मशाला की सुविधा भी विकसित की गई है। मां चंचली का यह दरबार आज भी माराफारी की ऐतिहासिक पहचान और बोकारोवासियों की अटूट आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

