गोरखपुर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के अवसर पर साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। इसके दूसरे दिन भक्ति, गुरु महिमा और आध्यात्मिक जीवन पर चर्चा हुई। वृंदावन से आए कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि शास्त्र के वचनों को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, लेकिन गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण के बाद उनके वचनों में तर्क नहीं करना चाहिए। गुरु शिष्य को भगवान के चरणों तक पहुंचाते हैं कथा व्यास ने कहा कि लौकिक वस्तुओं का अभाव दूर हो जाना ही वास्तविक कल्याण नहीं है। वास्तविक कल्याण तब है, जब जीवन के आत्यंतिक दुखों से मुक्ति मिले। यह भगवान के चरणों की प्राप्ति से संभव है। गुरु अपने शिष्य को भगवान के चरणों तक पहुंचाने का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि शरीर नाशवान है, लेकिन इसी शरीर के माध्यम से भगवान की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए शरीर की जरूरत भर व्यवस्था करनी चाहिए और उसका उपयोग भगवान की प्राप्ति के लिए करना चाहिए। भजन में आलस्य को बताया सबसे बड़ा बाधक स्वामी राजेंद्रदास ने कहा कि व्यक्ति अपने दूसरे कामों में आलस्य नहीं करता, लेकिन भजन की बात आते ही टालने लगता है। जीवन कितना भी व्यस्त हो, भगवान के भजन के लिए समय निकालना चाहिए। उन्होंने भजन में आने वाले पांच दोष बताए। इनमें विषयभोग, निद्रा, हंसी, संसार के प्रति अत्यधिक मोह और अधिक बोलना शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यदि बुद्धि भगवान में स्थिर हो जाए तो काम और क्रोध जैसे विकार भी भक्ति के मार्ग में बाधक नहीं रहते। राधाष्टमी के गीत से वृंदावन के छठी महोत्सव की अनुभूति कथा के दौरान उन्होंने राधाष्टमी महोत्सव का गीत प्रस्तुत किया। इससे श्रद्धालुओं को वृंदावन के छठी महोत्सव की अनुभूति हुई। गीतावली के उत्तरकांड का एक पद हनुमानजी को समर्पित कर उन्होंने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि आलस्य का त्याग करके भगवान की कथा सुननी चाहिए। भगवान की कथा मन के अविद्या-जन्य विकारों को दूर कर भक्ति का भाव पैदा करती है। प्रेम को चंद्रमा की तरह बताया कथा व्यास ने कहा कि प्रेम की तुलना चंद्रमा से की गई है। जैसे चंद्रमा लगातार बढ़ता है, वैसे ही भगवान के प्रति प्रेम भी हर क्षण बढ़ता रहता है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्ण हो जाता है, लेकिन प्रेम रूपी चंद्रमा कभी पूर्ण नहीं होता। उन्होंने कहा कि भगवान का भक्त अपने वैराग्य से कभी संतुष्ट नहीं होता। भगवान की भक्ति में जो वस्तु बाधक हो, वह प्रिय होने के बावजूद त्याग देनी चाहिए। वहीं भक्ति में सहायक वस्तु अप्रिय होने पर भी स्वीकार करनी चाहिए। गोरक्षा को लेकर गोरक्षपीठ का उल्लेख कथा व्यास ने कहा कि गोरक्षा की आशा गोरक्षपीठ से है और गोरक्षपीठ लंबे समय से गो-रक्षा के लिए कार्य करती रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने सनातन धर्म और गो-रक्षा के लिए योगी को दोबारा प्रचंड बहुमत से जिताने की अपील भी की। उन्होंने नैमिष तीर्थ की महिमा बताते हुए कहा कि वहां कलियुग के दोषों का प्रभाव नहीं है। उन्होंने कहा कि परम धर्म वही है, जिसके आचरण से भगवान के चरणों की प्राप्ति हो। यह अहैतुकी भक्ति से संभव है, जिसमें किसी सांसारिक कामना का भाव नहीं होता। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। इस अवसर पर योगी कमलनाथ, अयोध्या के महंत राजूदास, महंत रविंद्रदास, ब्लॉक प्रमुख बृजेश यादव, डॉ. सुनीता सिंह, संजय सिंह, प्रदीप राव, डॉ. अरविंद चतुर्वेदी, महेश पोद्दार और विकास जालान समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

