उदयपुर. पांच दशक पहले निकाय चुनावों में अलग ही माहौल होता था। उदयपुर में तब नारों के बूते बड़े-बड़े मैदान मारे जाते थे। गली-गली ऐसी हवा चलती कि पूरी जाजम बिछ जाती और नारे वोटर्स के दिलो दिमाग पर छा जाते। ऐसा ही एक चुनावी किस्सा आज भी उदयपुर के पुराने राजनीतिक कार्यकर्ताओं की यादों में जिंदा है हिरण आया… शेर भागा, हिरण आया… शेर भागा।
बात 1970 के आसपास की है। उस समय उदयपुर नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनसंघ के बीच कड़ा मुकाबला होता था। दोनों ही राष्ट्रीय दल थे लेकिन नगर पालिका चुनाव में प्रत्याशियों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह आवंटित होते थे। एक चुनाव में भारतीय जनसंघ का चुनाव चिन्ह हिरण और कांग्रेस का शेर था। बस फिर क्या था, जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने इसी चुनाव चिन्ह को प्रचार की ताकत बना लिया और गलियों में नारा गूंजने लगा हिरण आया… शेर भागा।
दाईजी के सामने बड़े चेहरे को उतारना पड़ा
उस समय भारतीय जनसंघ की चुनावी रणनीति और प्रत्याशी चयन में तीन प्रमुख नेताओं की भूमिका मानी जाती थी मदनलाल धुप्पड़, जोधसिंह चौहान दाईजी और भानुकुमार शास्त्री। भीतरी शहर की कमान जोधसिंह चौहान दाईजी संभालते थे। वे जगदीश चौक, गणगौर घाट, गणेश घाटी और चांदपोल क्षेत्र से लगातार पांच बार पार्षद रहे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जाता है कि उन्हें हराने के लिए कांग्रेस को हर चुनाव में खास रणनीति बनानी पड़ती थी। एक चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें चुनौती देने के लिए मेवाड़ के चर्चित सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी और बेहद संपन्न माने जाने वाले नंदलाल माथुर को मैदान में उतारा। उस समय संबंधित वार्ड में माथुर और उनके संबंधित परिवारों की संख्या काफी थी। नतीजा फिर भी दाईजी के पक्ष में गया। जोधसिंह चौहान भारी बहुमत से जीत गए। चुनावी रणनीति से लेकर प्रचार तक में उनकी पकड़ और मोहल्ले में व्यक्तिगत संपर्क उनकी सबसे बड़ी ताकत बने।
तीन नेताओं ने बांट रखा था पूरा शहर
भारतीय जनसंघ की उस समय की चुनावी रणनीति में शहर को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर जिम्मेदारियां तय की जाती थीं। भीतरी शहर के रावजी का हाटा, भाटियानी चोहट्टा, जगदीश चौक, घंटाघर, हाथीपोल, चांदपोल और अंबापोल क्षेत्र की कमान जोधसिंह चौहान के पास रहती थी। मंडी, देहलीगेट, अशोकनगर, भूपालपुरा और झीणीरेत क्षेत्र में मदनलाल धुप्पड़ पार्टी का काम संभालते थे। वहीं सूरजपोल, उदियापोल, शिवाजीनगर और गुलाबबाग के आसपास की बस्तियों की जिम्मेदारी भानुकुमार शास्त्री के पास रहती थी। यह चुनाव प्रबंधन आज की तरह किसी कार्यालय, डिजिटल डैशबोर्ड या सोशल मीडिया समूह से नहीं चलता था। नेताओं और कार्यकर्ताओं का पूरा नेटवर्क मोहल्लों, चौक और व्यक्तिगत संपर्क पर टिका था।
टाउन हॉल में दो दिन तक मतगणना
उस समय मतदान पूरी तरह बैलेट पेपर से होता था। वोट पड़ने के बाद मतगणना वर्तमान टाउन हॉल परिसर में होती थी, जहां अब सुखाड़िया रंगमंच है। मतगणना कुछ घंटों का काम नहीं था। परिणाम आने में 40 से 45 घंटे तक लग जाते थे। कार्यकर्ताओं के लिए यह इंतजार भी चुनाव का हिस्सा होता था। परिणाम की उम्मीद में कांग्रेस और जनसंघ दोनों के कार्यकर्ता टाउन हॉल परिसर में बने हाथी वाले पार्क में जाकर सो जाते थे। सुबह उठते ही पहला सवाल यही होता कहां तक पहुंची गिनती? कभी किसी दौर में कोई प्रत्याशी आगे निकलता तो समर्थकों में उत्साह की लहर दौड़ जाती और कुछ देर बाद दूसरे दौर की गिनती तस्वीर बदल देती। परिणाम की हर सूचना मतगणना स्थल से कानों-कान बाहर आती थी।

