आज शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन:मां चन्द्रघंटा की होगी पूजा; विशाखा नक्षत्र के साथ प्रीति योग, सिद्ध योग का बन रहा संयोग

आज शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन:मां चन्द्रघंटा की होगी पूजा; विशाखा नक्षत्र के साथ प्रीति योग, सिद्ध योग का बन रहा संयोग

शारदीय नवरात्र के तीसरे दिवस में आज मंगलवार को आश्विन शुक्ल तृतीया में विशाखा नक्षत्र के साथ प्रीति योग, सिद्ध योग व रवियोग के सुयोग में देवी के तीसरे स्वरूप में माता चंद्रघंटा की पूजा होगी। आचार्य राकेश झा ने बताया कि शारदीय नवरात्रि के तृतीया तिथि को माता चंद्रघंटा की उपासना होती है। मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। मां को सुगंध अति प्रिय है। उनका वाहन सिंह है। उनके दस हाथ हैं। हर हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं। वे आसुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। देवी चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है तथा सौभाग्य, शांति एवं वैभव की प्राप्ति होती है। ऐसा होता है देवी चन्द्रघंटा का स्वरुप ज्योतिषी झा के मुताबिक माता दुर्गा के तीसरे स्वरूप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है। देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है। देवी की पूजन से कांति-गुण में होगी वृद्धि ज्योतिषी झा के अनुसार माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना से देवी अपने भक्तों के सर्व पाप हर लेती हैं और उसके काम के बीच आने वाली बाधाओं को नष्ट करती हैं। मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार हैं, इसलिए इनकी पूजा करने वाला पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। मां चंद्रघंटा के माथे पर अर्धचंद्र सुशोभित है इसलिए इनकी आराधना से स्वभाव में विनम्रता तो आती ही है साथ ही मुख, नेत्र और संपूर्ण काया में कांति-गुण में वृद्धि होती है। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। उपासना से भूलोक व परलोक में देवी करेंगी कल्याण पंडित झा ने कहा कि भगवती चंद्रघंटा की उपासना करने से उपासक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है और जो श्रद्धालु आज के इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक दुर्गा सप्तसती का पाठ करता है, वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान को प्राप्त करता है। माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना भक्तो को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्त कर भूलोक तथा परलोक में कल्याण करती है। भगवती अपने दोनों हाथों से साधकों को चिरायु, सुख-संपदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान भी देती हैं। माता चन्द्रघंटा का मंत्र: पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्र कैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।। शारदीय नवरात्र के तीसरे दिवस में आज मंगलवार को आश्विन शुक्ल तृतीया में विशाखा नक्षत्र के साथ प्रीति योग, सिद्ध योग व रवियोग के सुयोग में देवी के तीसरे स्वरूप में माता चंद्रघंटा की पूजा होगी। आचार्य राकेश झा ने बताया कि शारदीय नवरात्रि के तृतीया तिथि को माता चंद्रघंटा की उपासना होती है। मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। मां को सुगंध अति प्रिय है। उनका वाहन सिंह है। उनके दस हाथ हैं। हर हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं। वे आसुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। देवी चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है तथा सौभाग्य, शांति एवं वैभव की प्राप्ति होती है। ऐसा होता है देवी चन्द्रघंटा का स्वरुप ज्योतिषी झा के मुताबिक माता दुर्गा के तीसरे स्वरूप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है। देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है। देवी की पूजन से कांति-गुण में होगी वृद्धि ज्योतिषी झा के अनुसार माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना से देवी अपने भक्तों के सर्व पाप हर लेती हैं और उसके काम के बीच आने वाली बाधाओं को नष्ट करती हैं। मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार हैं, इसलिए इनकी पूजा करने वाला पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। मां चंद्रघंटा के माथे पर अर्धचंद्र सुशोभित है इसलिए इनकी आराधना से स्वभाव में विनम्रता तो आती ही है साथ ही मुख, नेत्र और संपूर्ण काया में कांति-गुण में वृद्धि होती है। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। उपासना से भूलोक व परलोक में देवी करेंगी कल्याण पंडित झा ने कहा कि भगवती चंद्रघंटा की उपासना करने से उपासक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है और जो श्रद्धालु आज के इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक दुर्गा सप्तसती का पाठ करता है, वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान को प्राप्त करता है। माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना भक्तो को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्त कर भूलोक तथा परलोक में कल्याण करती है। भगवती अपने दोनों हाथों से साधकों को चिरायु, सुख-संपदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान भी देती हैं। माता चन्द्रघंटा का मंत्र: पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्र कैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।  

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