Lifestyle Inflation: सैलरी बढ़ने के साथ खर्च भी उसी रफ्तार से बढ़ जाता है, जिससे सेविंग और निवेश के लिए जगह कम होती चली जाती है। यही वजह है कि अच्छी आय के बावजूद कई लोग आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं कर पाते हैं। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा असर यह है कि कमाई बढ़ने के बाद भी संपत्ति बनाने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है और लोग खर्च के दबाव में फंसते चले जाते हैं।
बढ़ती आय और बढ़ते खर्च
जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे खर्च भी अपने आप बढ़ने लगता है और यही लाइफस्टाइल इंफ्लेशन की शुरुआत होती है। लाइफस्टाइल इंफ्लेशन का मतलब है कि सैलरी बढ़ते ही खर्च का स्तर भी बढ़ जाए। नया घर, बड़ी कार, महंगा फोन, ज्यादा बाहर खाना और कई तरह की सब्सक्रिप्शन इसका हिस्सा बन जाते हैं। धीरे-धीरे ये खर्च स्थायी हो जाते हैं और पूरी इनकम इन्हीं में खर्च होने लगती है। इसका नतीजा यह होता है कि सेविंग की आदत कमजोर पड़ जाती है और भविष्य के लिए पूंजी नहीं बन पाती।
वेल्थ बनाने पर असर
लाइफस्टाइल इंफ्लेशन का सबसे बड़ा नुकसान लंबी अवधि की वेल्थ क्रिएशन को होता है। आज खर्च किया गया हर रुपया निवेश से दूर चला जाता है और कंपाउंडिंग का फायदा नहीं मिल पाता। खासकर शुरुआती करियर के सालों में निवेश का महत्व ज्यादा होता है, क्योंकि इसी समय किया गया निवेश भविष्य में सबसे ज्यादा बढ़ता है। बढ़ती ईएमआई, किराया और दूसरे खर्च आर्थिक सुरक्षा को और कमजोर कर देते हैं।
जल्दी अमीर बनने का भ्रम
बढ़ते खर्च और वित्तीय दबाव के कारण कई युवा जल्दी पैसा कमाने के विकल्पों की ओर आकर्षित होने लगते हैं। शेयर बाजार में शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग और ज्यादा जोखिम वाले साधनों को आसान रास्ता माना जाता है। लेकिन अनुभव की कमी और जोखिम के कारण इसमें नुकसान की संभावना ज्यादा होती है। इससे फाइनेंशियल स्थिति और कमजोर हो सकती है और तनाव भी बढ़ता है।
आर्थिक स्थिरता की जरूरत
लाइफस्टाइल इंफ्लेशन से बचने के लिए आर्थिक स्थिरता सबसे जरूरी है। सैलरी बढ़ने पर सेविंग और निवेश को प्राथमिकता देने से खर्च पर नियंत्रण बना रहता है। इनकम का एक तय हिस्सा बचत और निवेश में जाने से भविष्य की सुरक्षा मजबूत होती है। साथ ही इमरजेंसी फंड जैसे बुनियादी कदम अचानक आने वाले खर्चों से राहत देते हैं।


