Madras High Court POCSO Ruling: मद्रास हाई कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक युवक को बरी कर दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सहमति वाले किशोर संबंधों में अक्सर युवा लड़के ही POCSO के कठोर प्रावधानों का बोझ उठाते हैं, जबकि लड़की को अभिभावकों के दबाव में दूसरी शादी करनी पड़ती है और फिर लड़के के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू हो जाती है।
युवक पर लगे थे सहमति से संबंध बनाने और अपहरण के आरोप
यह फैसला जस्टिस एन. माला की एकल पीठ ने 16 फरवरी 2026 को दिया। मामला 2018 का है, जब एक 17 वर्षीय युवक पर 16 वर्षीय लड़की के साथ सहमति से संबंध बनाने और अपहरण के आरोप लगे थे। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि युवक ने लड़की से प्रेम जताया, शादी का वादा किया और उसे घर से भागने के लिए मजबूर किया। बाद में लड़की की दूसरी शादी हो गई, जिसके बाद POCSO के तहत केस दर्ज हुआ। ट्रायल कोर्ट ने युवक को दोषी ठहराया था, जिसमें IPC की धारा 366 (अपहरण) और POCSO की धारा 5(l) पढ़कर 6 (यौन हमला) के तहत सजा सुनाई गई थी।
हाई कोर्ट ने पोक्सो केस में युवक को किया बरी
हाई कोर्ट ने अपील पर फैसला सुनाते हुए युवक को बरी कर दिया। मुख्य आधार यह था कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए प्राथमिक सबूत (जन्म प्रमाण पत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट के मूल दस्तावेज) पेश नहीं किए गए। केवल जेरॉक्स कॉपी दी गई, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत बिना उचित कारण बताए स्वीकार्य नहीं है। पीड़िता ने खुद गवाही में कहा कि मूल दस्तावेज उपलब्ध हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष ने उन्हें पेश नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि यदि जन्म प्रमाण पत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की जेरॉक्स कॉपी खारिज कर दी जाए, तो अभियोजन का पूरा केस धराशायी हो जाता है, क्योंकि पीड़िता की उम्र का मूलभूत तथ्य साबित नहीं होता।
पोक्सो एक्ट के कड़े प्रावधानों पर जताई चिंता
जस्टिस माला ने आगे टिप्पणी की, ‘किशोरों के बीच सहमति वाले संबंधों में अक्सर युवा लड़का ही परिणाम भुगतता है। अभिभावकों के दबाव में लड़की को दूसरी शादी करनी पड़ती है, जिसके बाद POCSO के तहत लड़के के खिलाफ लंबी कैद की कार्रवाई शुरू हो जाती है।’
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को दिए ये निर्देश
कोर्ट ने POCSO एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए तमिलनाडु सरकार को धारा 43 के तहत सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए। इसमें सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिविर आयोजित करने, निजी संस्थानों में भी समान जागरूकता कार्यक्रम चलाने की सिफारिश की गई है, ताकि कानून के कठोर प्रावधानों की जानकारी बच्चों, अभिभावकों और समाज को हो और इसका दुरुपयोग रोका जा सके।


