बिहार की सड़कों पर अब एक नई तस्वीर उभर रही है। ये तस्वीर हौसले, संघर्ष और समाज की सोच बदलने वाली महिलाओं की है। जिन्होंने बचपन में कई ताने सुने, प्रताड़ना भी झेली, आज वह महिलाएं आने वाली पीढ़ी के लिए नई प्रेरणा बन गई हैं। पुनपुन की रहने वाली अनीता, गायत्री, बेबी और सरस्वती कुमारी जैसी महिलाएं आज बस की ड्राइविंग सीट पर बैठकर न सिर्फ बस चला रही हैं, बल्कि पूरे समाज की सोच को भी नई दिशा दे रही हैं। ये महिलाओं मुसहर समाज से आती हैं, इनका सफर कभी आसान नहीं था। इन्होंने कभी साइकिल तक नहीं चलाई, लेकिन आज भारी भरकम बस और ट्रक तक चला रही हैं। अपने गांव वाले-रिश्तेदारों से कद-काठी को लेकर कई ताने सुने कि तुम्हारी हाइट नहीं है, पैर बस तक कैसे पहुंचेंगे, तुम इतनी पतली-दुबली हो, हाथ से गियर क्या पकड़ोगी। सड़क पर बस निकालेगी तो एक-आध लाशें बिछती जाएंगी। इन महिलाओं ने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा और आगे बढ़ीं। इनके पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘सुधा दीदी’ यानी सुधा वर्घीस का रहा, जिन्होंने महिलाओं को हौसला दिया, बस चलाने की ट्रेनिंग दिलाई और आत्मनिर्भर बनाया। महिला दिवस पर जानिए इन नारियों के हौसलों की कहानी। कोई पटना में पिंक बस चला रहीं तो कोई पेट्रोल पंप पर काम कर रही हैं….पढ़ें पूरी रिपोर्ट… छोटी गाड़ी का लाइसेंस था, फिर बस का भी बनाया पुनपुन निवासी महिला ड्राइवर अनीता (23) ने कहा, सुधा दीदी ने हमें ट्रेनिंग के लिए औरंगाबाद भेजा। गाड़ी चलानी सिखी, फिर लाइसेंस लेकर घर बैठी थी। सुधा दीदी (सुधा वर्घीस) ने पिंक बस चलाने का ऑफर दिया, पर मेरे पास छोटी गाड़ी का लाइसेंस था। फिर बस का भी लाइसेंस बन गया। तब पिंक बस के लिए हम लोगों ने अप्लाई किया और आज हम लोग यहां तक पहुंच पाए। 26 जनवरी को गांधी मैदान में झांकियां निकली थी, उसमें भी मैंने भाग लिया था। वहां मंत्रियों को बस में बैठाकर ड्राइव किया। घर-गांव वालों का पहला रिएक्शन- ड्राइविंग करेगी वह भी चार चक्का अनीता ने आगे बताया, ‘लोग ताने मारते थे कि तुमको साइकिल चलाने तो आता नहीं और बड़ी गाड़ी चलाओगी ? अब हम बस चला लेते हैं। जब 30 दिन की ट्रेनिंग से लौटे तो सुधा दीदी ने अपनी गाड़ी दी और ज्यादा प्रेक्टिस करने बोला’। अनीता बोली- 18 साल में हो गई थी शादी, ससुरालवालों ने सपोर्ट किया अनीता बताती हैं कि, मेरे परिवार वालों का बहुत सपोर्ट रहा। मेरी शादी 2021 में हुई थी, उस वक्त मैं 18 साल की थी। हमारे मुसहर समाज में लड़की की शादी 18 साल तक कर दी जाती है, लेकिन मेरे सास-ससुर और पति ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। ससुराल वालों ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया। मेरे पति ने कहा कि जब तुमको ड्राइविंग आती है, तुम्हारे पास लाइसेंस है तो तुम घर पर बैठकर क्यों चूल्हा चौकी करोगी? जाओ अपने पैर पर खड़ा हो। ड्राइविंग सीट पर महिला को देख लोग डर से भागने लगते हैं अनीता कहती हैं अब जब बस चलाती हूं तो लड़के भी ताने मारते हैं। सब कहते हैं कि लड़की बस चला रही है। रोड पर ले जाएगी तो एक आध लाश भी गिरा देगी। मुझे ड्राइविंग सीट पर बैठे हुए देखकर लोग डर से भागने लगते हैं, लेकिन हमने सोच लिया है कि मुझे आगे बढ़ते रहना है। हमारे समाज की लड़कियों को भी मैं यही मैसेज दूंगी कि वो अपना सपना जिए और आगे बढ़ें। गांव वालों ने कहा- हाथ में दम नहीं तो गियर कैसे लगेगा? पिंक बस चलाने वाली गायत्री कुमारी (23) ने बताया, सुधा दीदी की वजह से मैं बस चला पा रही। फिर भी लोग ताने देते कि देखो लड़की बस चला रही है। गांव वाले ताने मारते हैं। भाई कहता था कि सिर्फ घूमने जाती है, कभी बस नहीं सीख पाएगी। गांव वाले कहते थे कि इतनी पतली है, इससे बस कैसे चलेगी? इसके हाथ में दम ही नहीं है तो गियर कैसे लगेगा? इन सबके बावजूद हम आगे बढ़े। माता-पिता ने हमेशा सपोर्ट किया। पापा कहते हैं कि यह न्यूज पेपर में भी आ रही है, जो हम नहीं कर पाए, वह मेरी बेटी कर रही है। मेरे पापा एक मजदूर हैं। रोज का 400 रुपए कमाते हैं। मेरी दो बहन और तीन भाई हैं, इसी पैसे में सब का गुजारा होता है। औरंगाबाद में मिली असली उड़ान पिंक बस ड्राइवर बेबी कुमारी ने कहा, सुधा दीदी के जरिए ही यहां तक पहुंची हूं। घर में पहली बार हमने बोला कि मुझे बस चलानी है तो मम्मी ने चौंक कर पूछा कि बस चलाएगी? छोड़ दो यह सब नहीं करना है, लेकिन पापा ने कहा कि क्या हो जाएगा चलाने दो। फिर पापा ने मम्मी को भी मनाया। पापा ने बचपन से आज तक सपोर्ट किया। हमारे समाज में लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में कर दी जाती है। लोग अक्सर ताने मारते हैं कि उम्र हो गई है अब कब शादी करोगी? लेकिन मेरे पापा ने कहा कि तुमको जहां तक पढ़ना है तुम पढ़ाई करो। जब तक बेटी नहीं चाहेगी तब तक शादी नहीं होगी। हम मुसहर समाज से आते हैं और हम यही चाहते हैं कि हमको देखकर हमारे समाज की और लड़कियों में भी जज्बा आए। वह भी आगे आकर मेहनत करें और अच्छे मुकाम पर पहुंचे। बचपन से ही लड़कों को देखकर गाड़ी चलाने का रखती थी शौक पिंक बस चालक सरस्वती कुमारी ने कहा, जब बचपन में लड़कों को गाड़ी चलाते देखती तो मेरा भी मन करता था। सुधा दीदी ने ड्राइविंग के लिए पूछा तो सोचा कि सीखने का मौका मिल रहा तो सीख लेते हैं। औरंगाबाद में बस चलानी सीखने गई। फिर सीखकर आई तो काफी अच्छा लगा। अब पटना में पिंक बस चलाकर काफी खुशी हो रही। सरस्वती ने आगे बताया, जब मैं मायके जाती, तो लोग मम्मी को कहते कि आपकी बेटी ड्राइविंग करती है, यह अच्छा नहीं है। लड़कों का काम है, लड़की कैसे करेगी। बहुत ताने सुने, लेकिन कभी भी उसको दिल पर नहीं लगाया। मेरे पति भी कहते हैं कि हमको तुम पर विश्वास है। जो हम नहीं कर पाए वह तुम सीख ली। अब जानिए पेट्रोल पंप पर काम करने वाली शिवानी के बारे में जिनकी कहानी काफी मार्मिक हैं, बचपन में पिता से परेशान होकर घर छोड़ा, स्ट्रगल कर अपने पैरों पर खड़ी हुईं… पेट्रोल पंप पर 8 घंटे लगातार खड़े रहने पड़ता नवादा की शिवानी पटना के पेट्रोल पंप पर काम करती हैं। लगातार 8 घंटे खड़े रहने के बावजूद भी वह अपने काम के लिए समर्पित हैं। शिवानी पेट्रोल पंप में काम करने के साथ ही बिहार पुलिस की तैयारी भी करती हैं। वह सुबह 4 बजे उठकर प्रैक्टिस करने जाती है, फिर 8 बजे फ्री होने के बाद 9 बजे आकर अपनी ड्यूटी जॉइन करती हैं। इसके बाद फिर शाम में वह 5 से 7 प्रैक्टिस करने जाती हैं। शिवानी ने कहा कि पिता मां को काफी प्रताड़ित करते थे। मार्च 2022 में होली से एक दिन पहले पिता ने मां को बहुत मारा। तब मैंने साहस करते हुए अपनी मां और दोनों छोटी बहनों के साथ घर छोड़ दिया। मेरे अंदर काफी गुस्सा था, क्योंकि उन्होंने मेरी मां के ऊपर हाथ उठाया था। मैं अपने किसी रिश्तेदार के घर नहीं जाना चाहती थी, क्योंकि वे फिर मुझे वापस समझाकर पिता के पास भेज देते। कम उम्र के कारण जॉब नहीं मिल रही थी शिवानी बोली, 17 साल होने के कारण मुझे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। मैंने 12वीं लेवल पर पारामेडिकल का फॉर्म भरा। जून 2023 में मैं एग्जाम देने बहन के साथ पटना आई। कई जगह अप्लाई किया, लेकिन मेरे हाथ निराशा ही लगी। इस दौरान कजिन ने काफी हेल्प की। ज्यादा कस्टमर होने पर वॉशरूम भी नहीं जा पाती थी शिवानी कहती हैं कि एक दिन डाक बंगला के पेट्रोल पंप पर लड़कियों को काम करते देखा। फिर मैंने उनसे जॉब के बारे में पूछा। मेरा मन हुआ यहीं काम कर लूं ताकि मां को साथ रख सकूं। इसमें भी परेशानी आई, फिर यहां जॉब मिल गई। जब जॉब ज्वाइन किया था तो मुझे थोड़ा डर लग रहा था, क्योंकि मैं इकलौती लड़की थी। चारों तरफ पुरुष से घिरी थी और कई कस्टमर ऐसे आते थे जो बदतमीजी भी करते थे। 8 घंटे खड़े रहना, किसी सजा जैसी लगती थी। अगर पेट्रोल पंप पर ज्यादा कस्टमर आ जाते थे, तो कई बार बाथरूम भी रोकना पड़ता था। धीरे-धीरे मैंने अपने काम को समझ लिया और यहां के स्टाफ भी मेरा सहयोग करते हैं। बिहार पुलिस का एग्जाम कर चुकी हैं क्वालिफाई शिवानी ने बताया, मैंने बिहार पुलिस का एग्जाम क्वालिफाई किया है, अब मेरा फिजिकल है। अपने जॉब के साथ बिहार पुलिस के फिजिकल के लिए प्रैक्टिस करती हूं। रोज सुबह 4 बजे उठती और मीठापुर बस स्टैंड के पास एक अकादमी में ट्रेनिंग के लिए जाती हूं। बिहार की सड़कों पर अब एक नई तस्वीर उभर रही है। ये तस्वीर हौसले, संघर्ष और समाज की सोच बदलने वाली महिलाओं की है। जिन्होंने बचपन में कई ताने सुने, प्रताड़ना भी झेली, आज वह महिलाएं आने वाली पीढ़ी के लिए नई प्रेरणा बन गई हैं। पुनपुन की रहने वाली अनीता, गायत्री, बेबी और सरस्वती कुमारी जैसी महिलाएं आज बस की ड्राइविंग सीट पर बैठकर न सिर्फ बस चला रही हैं, बल्कि पूरे समाज की सोच को भी नई दिशा दे रही हैं। ये महिलाओं मुसहर समाज से आती हैं, इनका सफर कभी आसान नहीं था। इन्होंने कभी साइकिल तक नहीं चलाई, लेकिन आज भारी भरकम बस और ट्रक तक चला रही हैं। अपने गांव वाले-रिश्तेदारों से कद-काठी को लेकर कई ताने सुने कि तुम्हारी हाइट नहीं है, पैर बस तक कैसे पहुंचेंगे, तुम इतनी पतली-दुबली हो, हाथ से गियर क्या पकड़ोगी। सड़क पर बस निकालेगी तो एक-आध लाशें बिछती जाएंगी। इन महिलाओं ने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा और आगे बढ़ीं। इनके पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘सुधा दीदी’ यानी सुधा वर्घीस का रहा, जिन्होंने महिलाओं को हौसला दिया, बस चलाने की ट्रेनिंग दिलाई और आत्मनिर्भर बनाया। महिला दिवस पर जानिए इन नारियों के हौसलों की कहानी। कोई पटना में पिंक बस चला रहीं तो कोई पेट्रोल पंप पर काम कर रही हैं….पढ़ें पूरी रिपोर्ट… छोटी गाड़ी का लाइसेंस था, फिर बस का भी बनाया पुनपुन निवासी महिला ड्राइवर अनीता (23) ने कहा, सुधा दीदी ने हमें ट्रेनिंग के लिए औरंगाबाद भेजा। गाड़ी चलानी सिखी, फिर लाइसेंस लेकर घर बैठी थी। सुधा दीदी (सुधा वर्घीस) ने पिंक बस चलाने का ऑफर दिया, पर मेरे पास छोटी गाड़ी का लाइसेंस था। फिर बस का भी लाइसेंस बन गया। तब पिंक बस के लिए हम लोगों ने अप्लाई किया और आज हम लोग यहां तक पहुंच पाए। 26 जनवरी को गांधी मैदान में झांकियां निकली थी, उसमें भी मैंने भाग लिया था। वहां मंत्रियों को बस में बैठाकर ड्राइव किया। घर-गांव वालों का पहला रिएक्शन- ड्राइविंग करेगी वह भी चार चक्का अनीता ने आगे बताया, ‘लोग ताने मारते थे कि तुमको साइकिल चलाने तो आता नहीं और बड़ी गाड़ी चलाओगी ? अब हम बस चला लेते हैं। जब 30 दिन की ट्रेनिंग से लौटे तो सुधा दीदी ने अपनी गाड़ी दी और ज्यादा प्रेक्टिस करने बोला’। अनीता बोली- 18 साल में हो गई थी शादी, ससुरालवालों ने सपोर्ट किया अनीता बताती हैं कि, मेरे परिवार वालों का बहुत सपोर्ट रहा। मेरी शादी 2021 में हुई थी, उस वक्त मैं 18 साल की थी। हमारे मुसहर समाज में लड़की की शादी 18 साल तक कर दी जाती है, लेकिन मेरे सास-ससुर और पति ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। ससुराल वालों ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया। मेरे पति ने कहा कि जब तुमको ड्राइविंग आती है, तुम्हारे पास लाइसेंस है तो तुम घर पर बैठकर क्यों चूल्हा चौकी करोगी? जाओ अपने पैर पर खड़ा हो। ड्राइविंग सीट पर महिला को देख लोग डर से भागने लगते हैं अनीता कहती हैं अब जब बस चलाती हूं तो लड़के भी ताने मारते हैं। सब कहते हैं कि लड़की बस चला रही है। रोड पर ले जाएगी तो एक आध लाश भी गिरा देगी। मुझे ड्राइविंग सीट पर बैठे हुए देखकर लोग डर से भागने लगते हैं, लेकिन हमने सोच लिया है कि मुझे आगे बढ़ते रहना है। हमारे समाज की लड़कियों को भी मैं यही मैसेज दूंगी कि वो अपना सपना जिए और आगे बढ़ें। गांव वालों ने कहा- हाथ में दम नहीं तो गियर कैसे लगेगा? पिंक बस चलाने वाली गायत्री कुमारी (23) ने बताया, सुधा दीदी की वजह से मैं बस चला पा रही। फिर भी लोग ताने देते कि देखो लड़की बस चला रही है। गांव वाले ताने मारते हैं। भाई कहता था कि सिर्फ घूमने जाती है, कभी बस नहीं सीख पाएगी। गांव वाले कहते थे कि इतनी पतली है, इससे बस कैसे चलेगी? इसके हाथ में दम ही नहीं है तो गियर कैसे लगेगा? इन सबके बावजूद हम आगे बढ़े। माता-पिता ने हमेशा सपोर्ट किया। पापा कहते हैं कि यह न्यूज पेपर में भी आ रही है, जो हम नहीं कर पाए, वह मेरी बेटी कर रही है। मेरे पापा एक मजदूर हैं। रोज का 400 रुपए कमाते हैं। मेरी दो बहन और तीन भाई हैं, इसी पैसे में सब का गुजारा होता है। औरंगाबाद में मिली असली उड़ान पिंक बस ड्राइवर बेबी कुमारी ने कहा, सुधा दीदी के जरिए ही यहां तक पहुंची हूं। घर में पहली बार हमने बोला कि मुझे बस चलानी है तो मम्मी ने चौंक कर पूछा कि बस चलाएगी? छोड़ दो यह सब नहीं करना है, लेकिन पापा ने कहा कि क्या हो जाएगा चलाने दो। फिर पापा ने मम्मी को भी मनाया। पापा ने बचपन से आज तक सपोर्ट किया। हमारे समाज में लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में कर दी जाती है। लोग अक्सर ताने मारते हैं कि उम्र हो गई है अब कब शादी करोगी? लेकिन मेरे पापा ने कहा कि तुमको जहां तक पढ़ना है तुम पढ़ाई करो। जब तक बेटी नहीं चाहेगी तब तक शादी नहीं होगी। हम मुसहर समाज से आते हैं और हम यही चाहते हैं कि हमको देखकर हमारे समाज की और लड़कियों में भी जज्बा आए। वह भी आगे आकर मेहनत करें और अच्छे मुकाम पर पहुंचे। बचपन से ही लड़कों को देखकर गाड़ी चलाने का रखती थी शौक पिंक बस चालक सरस्वती कुमारी ने कहा, जब बचपन में लड़कों को गाड़ी चलाते देखती तो मेरा भी मन करता था। सुधा दीदी ने ड्राइविंग के लिए पूछा तो सोचा कि सीखने का मौका मिल रहा तो सीख लेते हैं। औरंगाबाद में बस चलानी सीखने गई। फिर सीखकर आई तो काफी अच्छा लगा। अब पटना में पिंक बस चलाकर काफी खुशी हो रही। सरस्वती ने आगे बताया, जब मैं मायके जाती, तो लोग मम्मी को कहते कि आपकी बेटी ड्राइविंग करती है, यह अच्छा नहीं है। लड़कों का काम है, लड़की कैसे करेगी। बहुत ताने सुने, लेकिन कभी भी उसको दिल पर नहीं लगाया। मेरे पति भी कहते हैं कि हमको तुम पर विश्वास है। जो हम नहीं कर पाए वह तुम सीख ली। अब जानिए पेट्रोल पंप पर काम करने वाली शिवानी के बारे में जिनकी कहानी काफी मार्मिक हैं, बचपन में पिता से परेशान होकर घर छोड़ा, स्ट्रगल कर अपने पैरों पर खड़ी हुईं… पेट्रोल पंप पर 8 घंटे लगातार खड़े रहने पड़ता नवादा की शिवानी पटना के पेट्रोल पंप पर काम करती हैं। लगातार 8 घंटे खड़े रहने के बावजूद भी वह अपने काम के लिए समर्पित हैं। शिवानी पेट्रोल पंप में काम करने के साथ ही बिहार पुलिस की तैयारी भी करती हैं। वह सुबह 4 बजे उठकर प्रैक्टिस करने जाती है, फिर 8 बजे फ्री होने के बाद 9 बजे आकर अपनी ड्यूटी जॉइन करती हैं। इसके बाद फिर शाम में वह 5 से 7 प्रैक्टिस करने जाती हैं। शिवानी ने कहा कि पिता मां को काफी प्रताड़ित करते थे। मार्च 2022 में होली से एक दिन पहले पिता ने मां को बहुत मारा। तब मैंने साहस करते हुए अपनी मां और दोनों छोटी बहनों के साथ घर छोड़ दिया। मेरे अंदर काफी गुस्सा था, क्योंकि उन्होंने मेरी मां के ऊपर हाथ उठाया था। मैं अपने किसी रिश्तेदार के घर नहीं जाना चाहती थी, क्योंकि वे फिर मुझे वापस समझाकर पिता के पास भेज देते। कम उम्र के कारण जॉब नहीं मिल रही थी शिवानी बोली, 17 साल होने के कारण मुझे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। मैंने 12वीं लेवल पर पारामेडिकल का फॉर्म भरा। जून 2023 में मैं एग्जाम देने बहन के साथ पटना आई। कई जगह अप्लाई किया, लेकिन मेरे हाथ निराशा ही लगी। इस दौरान कजिन ने काफी हेल्प की। ज्यादा कस्टमर होने पर वॉशरूम भी नहीं जा पाती थी शिवानी कहती हैं कि एक दिन डाक बंगला के पेट्रोल पंप पर लड़कियों को काम करते देखा। फिर मैंने उनसे जॉब के बारे में पूछा। मेरा मन हुआ यहीं काम कर लूं ताकि मां को साथ रख सकूं। इसमें भी परेशानी आई, फिर यहां जॉब मिल गई। जब जॉब ज्वाइन किया था तो मुझे थोड़ा डर लग रहा था, क्योंकि मैं इकलौती लड़की थी। चारों तरफ पुरुष से घिरी थी और कई कस्टमर ऐसे आते थे जो बदतमीजी भी करते थे। 8 घंटे खड़े रहना, किसी सजा जैसी लगती थी। अगर पेट्रोल पंप पर ज्यादा कस्टमर आ जाते थे, तो कई बार बाथरूम भी रोकना पड़ता था। धीरे-धीरे मैंने अपने काम को समझ लिया और यहां के स्टाफ भी मेरा सहयोग करते हैं। बिहार पुलिस का एग्जाम कर चुकी हैं क्वालिफाई शिवानी ने बताया, मैंने बिहार पुलिस का एग्जाम क्वालिफाई किया है, अब मेरा फिजिकल है। अपने जॉब के साथ बिहार पुलिस के फिजिकल के लिए प्रैक्टिस करती हूं। रोज सुबह 4 बजे उठती और मीठापुर बस स्टैंड के पास एक अकादमी में ट्रेनिंग के लिए जाती हूं।


