इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में एक जज हैं जस्टिस पंकज भाटिया। वही जस्टिस जिन्होंने दहेज हत्या के मामले में आरोपी को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि वह 27 जुलाई 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। इसलिए वह जमानत का हकदार है। 9 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस पंकज भाटिया से मिली इस जमानत को खारिज कर दिया। सिर्फ जमानत ही खारिज नहीं की बल्कि हाई कोर्ट के फैसले को निराशाजनक बताते हुए कोर्ट के विवेक पर सवाल उठा दिए। इस घटना के बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट को बकायदा एक आवेदन लिखकर खुद को जमानत वाले मामलों से अलग करने की अपील कर दी। यह दलील देते हुए कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने उन पर भयावह प्रभाव डाला है। उनका मनोबल गिरा दिया है। इस मामले में खूब हंगामा हुआ। यहां तक कि अवध बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट को लेटर लिखकर उनके टिप्पणी को रिकॉर्ड से हटाने तक की मांग कर दी। लेकिन अब जस्टिस पंकज भाटिया के फैसलों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल में दावा किया है कि अक्टूबर 2025 से दिसंबर 2025 तक जस्टिस पंकज भाटिया ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े 510 मामलों में सुनवाई की है। जिनमें से सिर्फ दो को छोड़कर 508 मामलों में उन्होंने आरोपी को जमानत दे दी है। हैरानी की बात यह है कि इन सभी मामलों में भले ही मौत की परिस्थितियां अलग-अलग थी लेकिन जस्टिस पंकज भाटिया द्वारा दिए जमानत के आदेश आदेश का स्ट्रक्चर आदेश की भाषा जमानत के बॉन्ड के लिए तय की गई राशि सभी मामलों में एक जैसी थी। यानी भले ही हत्या हत्या का कारण उसकी परिस्थितियां अलग-अलग थी। लेकिन जस्टिस भाटिया द्वारा जमानत को लेकर दिया गया फैसला करीब-करीब एक जैसा ही था। और तो और 99% से ज्यादा मामलों में उन्होंने जमानत दी थी। पूरा मामला सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
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9 फरवरी को न्यायमूर्ति भाटिया द्वारा दिए गए जमानत आदेश को रद्द करते हुए, न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और के वी विश्वनाथन की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि विवादित आदेश को सीधे पढ़ने से हम यह समझने में असमर्थ हैं कि उच्च न्यायालय क्या कहना चाह रहा है… दहेज हत्या जैसे अत्यंत गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में जमानत देने के उद्देश्य से उच्च न्यायालय ने अपने विवेक का प्रयोग करते समय किन बातों को ध्यान में रखा। जमानत रद्द करने और आरोपी को आत्मसमर्पण करने का आदेश देते हुए न्यायालय ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला घोंटना बताया गया है और यह घटना पीड़िता के विवाह के महज तीन महीने बाद घटी है, जिसके चलते भारतीय सुरक्षा अधिनियम, 2023 की धारा 118 के तहत आरोप बनते हैं। न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपराध की प्रकृति, निर्धारित सजा, आरोपी और मृतक के बीच संबंध, घटना स्थल और रिकॉर्ड पर मौजूद चिकित्सा साक्ष्यों की जांच करे। अदालत ने उस मामले में दी गई जमानत रद्द कर दी और आरोपी को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। अदालत ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में महिला की मौत गला घोंटने के कारण हुई थी और यह घटना उसकी शादी के महज तीन महीने बाद हुई थी। अदालत ने भारतीय सुरक्षा अधिनियम के तहत प्रावधान लागू किए।
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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत देने से पहले उच्च न्यायालय को अपराध की प्रकृति, निर्धारित सजा, आरोपी और मृतक के बीच संबंध, घटना स्थल और रिकॉर्ड पर मौजूद चिकित्सा साक्ष्य की जांच करनी चाहिए थी। इन टिप्पणियों के कुछ दिनों बाद, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, जिन्होंने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश से उन्हें जमानत मामलों की सूची न सौंपने का अनुरोध किया था। उनके एक जमानत आदेश को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अत्यंत चौंकाने वाला और निराशाजनक बताया गया था। जज ने दहेज हत्या के मामलों में जमानत दी है। द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच उनकी अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ द्वारा पारित दहेज हत्या के मामलों में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध 510 नियमित जमानत आदेशों के विश्लेषण से पता चलता है कि न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने 508 मामलों में जमानत दी – यानी कुल मामलों का 99.61%। इसके अलावा, जमानत आदेशों की संरचना और भाषा, साथ ही न्यायमूर्ति भाटिया द्वारा निर्धारित बांड राशि, सभी मामलों में समान थी, हालांकि मृत्यु की परिस्थितियां भिन्न थीं।
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जिस मामले ने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना को जन्म दिया, वह श्रावस्ती जिले की 28 वर्षीय सुषमा देवी की मौत से संबंधित था। शादी के दो महीने से भी कम समय बाद उनका शव उनके ससुराल के बरामदे में मिला था। उनके पिता ने पुलिस को बताया कि उन्होंने शादी के समय 3.5 लाख रुपये नकद दिए थे और बाद में दूल्हे के परिवार ने कार की मांग की थी। सेशन कोर्ट ने पहले पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “मृत्यु से पहले गला घोंटने के कारण दम घुटने” और पीड़िता के गले पर निशान का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था। एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 510 मामलों में आईपीसी की धारा 304बी (या भारतीय न्याय संहिता की धारा 80, जो दहेज हत्या से संबंधित है) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप दर्ज किए गए हैं।
छह मामलों में मृत महिलाओं की मृत्यु के समय गर्भावस्था दर्ज की गई थी। आदेशों में उल्लिखित पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, 340 मामलों में मृत्यु का कारण फांसी था। 27 मामलों में जहर का सेवन, 16 में गला घोंटना, 11 में जलने की चोटें, सात-सात मामलों में गला दबाना और सिर में चोट लगना, और चार मामलों में डूबने की मौत हुई। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 356 मामलों में, आरोपियों ने जमानत मिलने से पहले एक वर्ष से कम समय हिरासत में बिताया था। जमानत के अधिकांश आदेशों में, न्यायमूर्ति भाटिया ने दर्ज किया कि उन्होंने एफआईआर विवरण, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आरोपी के आपराधिक इतिहास का हवाला देने से पहले आवेदक के वकील और अतिरिक्त सरकारी वकील की दलीलें सुनी थीं।
पहले यह समझ लेते हैं कि दहेज हत्या की धारा लागू कब होती है। कानून कहता है कि शादी के 7 साल के अंदर महिला की अस्वाभाविक मौत हुई हो और दहेज उत्पीड़न का सबूत हो। इस सिचुएशन में कोर्ट यह मानकर ट्रायल शुरू करता है कि दहेज के कारण हत्या हुई है। तब तक यह मानता है जब तक ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर दहेज हत्या का आरोप खारिज नहीं हो जाता। अब आते हैं कोर्ट के जमानत के आदेशों पर। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल में पाया है कि करीब-करीब सभी सुनवाइयों के दौरान आदेश एक जैसे हैं। आदेश की भाषा यहां तक कि जमानत का बॉन्ड भी एक जैसा है। ज्यादातर मामलों में जमानत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जेल में बिताए समय, आपराधिक रिकॉर्ड ना होने के आधार पर दी गई है। 253 आदेशों में जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा है कि मौत से ठीक पहले उत्पीड़न का कोई सबूत नहीं मिला है। कुछ जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि आवेदक के खिलाफ कुछ खास नहीं है या आवेदक के खिलाफ कोई खास आरोप नहीं है। जमानत देने के कारणों में अक्सर हिरासत में बिताया गया समय, आपराधिक पृष्ठभूमि का अभाव और यह उल्लेख किया जाता था कि मृत्यु से ठीक पहले उत्पीड़न का कोई सबूत नहीं था। विश्लेषण के अनुसार, यह बात 253 आदेशों में सामने आई। अधिकांश आदेशों में आरोपी को 20,000 रुपये का निजी मुआवज़ा और इतनी ही राशि के दो ज़मानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया था और इसमें सुनवाई में उपस्थित होना और गवाहों को प्रभावित न करना जैसी मानक शर्तें शामिल थीं।
बहरहाल, इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी जानकारी दी है कि इस मामले को लेकर जस्टिस भाटिया से उन्होंने कई बार संपर्क साधने की कोशिश की। ईमेल भी लिखा लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला है। इसके अलावा इस मामले से जुड़े कुछ सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी भेजे गए थे जिसका अब तक कोई जवाब नहीं आया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आवेदकों में 362 पति, 68 सासें और 63 ससुर, साथ ही अन्य रिश्तेदार शामिल थे।


