एक शहर, दो घटनाएं… और वही सिस्टम की चुप्पी। एक तरफ NEET की तैयारी कर रही होनहार छात्रा सपनों के साथ घर से निकली और लौटी तो सिर्फ एक लाश। दूसरी तरफ शिल्पी-गौतम एक आम परिवार, रोजमर्रा की जिंदगी और अचानक मौत का साया। नाम अलग हैं, कहानियां अलग दिखती हैं, लेकिन दोनों हत्याकांडों की तह में उतरिए तो तस्वीर एक जैसी नजर आती है-दरिंदगी, लापरवाही और सिस्टम की नाकामी। मानों लड़कियों के लिए 27 सालों में कुछ बदला ही नहीं है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में पढ़िए, 1999 की शिल्पी-गौतम हत्याकांड और 2026 की NEET स्टूडेंट की हत्या में क्या समानता है। कैसे महिलाओं के लिए कुछ नहीं बदला है। कैसे आज भी बिहार की बेटियां बेबसी ओढ़े हुए हैं। 1. शुरुआती जांच में ही चूक NEET स्टूडेंट केस हो या शिल्पी-गौतम हत्याकांड, दोनों में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई सवालों के घेरे में रही। सबूतों को समय पर सुरक्षित नहीं किया गया, घटनास्थल से अहम कड़ियां गायब रहीं और केस की दिशा तय करने में देर होती रही। शिल्पी-गौतम हत्याकांडः 3 जुलाई, 1999, नीले सूट में, कंधे पर बैग टांगे शिल्पी जैन रिक्शे पर बैठकर कोचिंग के लिए निकल रही थी। शिल्पी ‘मिस पटना’ रह चुकी थी। वह गौतम की दोस्त थी। रिक्शा अभी उसके घर के कनाल रोड के मोड़ पर पहुंचा ही था कि पीछे से एक सफेद कार धीरे-धीरे पास आई। अंदर से एक जानी-पहचानी आवाज आई- ‘अरे शिल्पी! रिक्शे में क्यों? मेरी गाड़ी में बैठो, छोड़ देता हूं।’ वो गौतम सिंह का दोस्त था। शिल्पी को गौतम पर भरोसा था और उसके दोस्तों पर भी। ‘अच्छा, बस पास तक छोड़ देना’, उसने मुस्कुराते हुए कहा और रिक्शा रुकवा दिया। वो कार में बैठ गई। शुरुआत में सब सामान्य था- कार उसी दिशा में बढ़ी, जहां शिल्पी की कोचिंग थी, लेकिन कुछ मिनट बाद, उसने देखा कि रास्ता बदल गया है। गाड़ी अब शहर से बाहर की तरफ मुड़ चुकी थी। ‘ये रास्ता तो नहीं है मेरे इंस्टीट्यूट का…?’, उसने हैरान होकर पूछा। बगल में बैठा गौतम का दोस्त मुस्कुराया, बोला- ‘अरे, घबराओ मत। वाल्मी गेस्ट हाउस चल रहे हैं। गौतम वहीं है, उसने बुलाया है। कुछ जरूरी बात करनी है।’ उधर, गौतम सिंह को किसी ने बताया- ‘शिल्पी को वाल्मी गेस्ट हाउस ले जाया गया है।’ वो सन्न रह गया। दौड़ा-भागा वहां पहुंचा। पहली मंजिल पर पहुंचा तो गौतम की सांस रुक गई। वो दरवाजे की ओर भागा। दरवाजा आधा खुला था। कमरे में शिल्पी थी- उसके कपड़े आधे फटे हुए, चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ। चारों तरफ कुछ लोग खड़े थे- वही चेहरे, जिन्हें गौतम अक्सर अपने साथ राजनीति के दांव-पेच में देखता था। वो लोग अब जानवर बन चुके थे। गौतम ने चिल्लाकर कहा, ‘रुको! छोड़ दो उसे!’ लेकिन उसकी आवाज उनकी गंदी हंसी में गुम हो गई। उसने झपटकर शिल्पी की ओर बढ़ने की कोशिश की, मगर पीछे से किसी ने उसे पकड़ लिया। और अगले ही पल, पहला मुक्का उसके चेहरे पर पड़ा। गौतम लड़ने की कोशिश करता रहा, पर हर तरफ से लातें और घूसे पड़ने लगे। वो बार-बार गिरता, उठता, फिर गिरता। सामने, वही लोग शिल्पी के साथ दरिंदगी करते रहे- और वो कुछ नहीं कर पाया। किसी ने पास रखे गिलास में कुछ मिलाया- कोई कड़वी-सी चीज, शायद जहर। थोड़ी देर बाद वही गिलास शिल्पी के होठों पर लगाया गया। वो बेहोश हो चुकी थी। कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ पंखे की आवाज रह गई। दो लोग फर्श पर पड़े थे। (…लोगों की चर्चाओं के आधार पर तब के अखबारों में ऐसा ही छपा था।) गैराज में मिली शिल्पी-गौतम की अर्ध नग्न लाश इधर, घर नहीं पहुंची शिल्पी तो घरवालों ने गांधी मैदान थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। थोड़ी ही देर में पुलिस साधु यादव के क्वार्टर के बाहर पहुंची। वहां पुलिस से पहले कुछ लोग जमा थे- कुछ चौकीदार, कुछ स्थानीय लोग। फुलवारी शरीफ के उस पुराने MLA क्वार्टर के पीछे एक गैराज था- आधा टूटा-फूटा, जिसमें अक्सर सफेद गाड़ियां पॉलिश होती थीं। इसके भीतर से पेट्रोल और धुएं की तेज गंध आ रही थी। थानेदार ने टॉर्च जलाया और धीरे से अंदर कदम रखा। पहली नजर में लगा, कोई हादसा हुआ है, लेकिन जैसे ही रोशनी वहां खड़ी कार के भीतर पड़ी- सबके होश उड़ गए। सामने सफेद कार खड़ी थी। अंदर दो शव पड़े थे- गौतम सिंह और शिल्पी जैन के। गौतम के शरीर पर सिर्फ पैंट थी। बगल में शिल्पी पड़ी थी- उसके ऊपरी हिस्से पर सिर्फ एक टी-शर्ट थी, जो साफ तौर पर गौतम की थी। बाकी कपड़े गायब थे। थानेदार कुछ पल के लिए चुप रहा, लेकिन इससे पहले कि पुलिस और जांच करती, एक जोरदार शोर उठा- गेट के बाहर कुछ गाड़ियों की हेडलाइटें चमक उठीं और भीड़ उमड़ आई। एक गाड़ी के बाहर से भारी आवाज सुनाई दी- ‘क्या हो रहा है यहां? वो साधु यादव थे। पुलिस वालों ने झटपट सलाम ठोका। थानेदार कुछ कहने ही वाला था कि साधु ने इशारे से बात रोक दी। ‘लाश मिली है?’ थानेदार ने सिर झुका लिया, ‘जी… कार में…’ साधु कुछ पल कार की ओर देखते रहे। ‘जांच करो… जो करना है, करो’, उन्होंने कहा, और पीछे हट गए। अब गैराज के भीतर सिर्फ पुलिस थी और दो बेजान जिस्म। एक पुलिस वाले ने धीरे से कहा, ‘गाड़ी को थाने ले चलते हैं।’ ‘लेकिन सर, फिंगर प्रिंट्स…’थानेदार ने डांट दिया, ‘ज्यादा दिमाग मत लगाओ।’ गाड़ी स्टार्ट की गई और थाने ले जाई गई- उसी वक्त दोनों के शरीर भी पोस्टमॉर्टम के लिए भेजे गए। रात के साढ़े 9 बज चुके थे। एक रिपोर्टर ने अफसर से पूछा, ‘साहब, ये मर्डर है या एक्सीडेंट?’ अफसर ने कहा- ना, ना, आत्महत्या लग रही है।’ ‘लेकिन पोस्टमॉर्टम तो हुआ नहीं अभी?’ ‘हम इतने केस देख चुके हैं कि पहली नजर में समझ जाते हैं मौत कैसे हुई।’ अफसर ने जवाब दिया, और किसी को भी अंदर जाने से रोक दिया। रात गहराती गई। पोस्टमॉर्टम उसी रात किया गया, जल्दबाजी में, बिना परिजनों की मौजूदगी के। रात में ही गौतम का अंतिम संस्कार कर दिया गया। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET छात्रा के रेप-मौत मामले की सूचना मिलने के बाद भी 3 दिन तक थाना प्रभारी रोशनी कुमारी घटनास्थल पर पहुंचीं ही नहीं। भास्कर की पड़ताल में पता चला है कि लड़की से वारदात की जानकारी चित्रगुप्त नगर थाना प्रभारी रोशनी कुमारी को कदमकुआं थाने से मिली थी। उस वक्त वह गांधी मैदान में मीटिंग में थीं। सूचना मिलने के बाद वह अस्पताल तो पहुंचीं, लेकिन घटनास्थल यानी हॉस्टल कहां है, इसकी उन्हें जानकारी तक नहीं थी। परिजन बोले-कपड़े पर लगा था खून, डॉक्टर ने फेंक दिया परिजनों ने कहा- सबसे पहले उनकी बच्ची को हॉस्टल के पास सहज सर्जरी में भर्ती कराया गया। वहां से एक निजी अस्पताल ले जाया गया। वहां के एक जूनियर डॉक्टर और अस्पताल के स्टाफ ने हमें बताया कि पीड़िता के कपड़े पर खून लगा था। जब हमने बच्ची का कपड़ा मांगा तो डॉक्टर ने थानेदार और हॉस्टल संचालक की मौजूदगी में कहा-फेंक दिया हूं। डॉक्टर ने कहा-तुम्हें बच्ची को बचाना है या उसका कपड़ा रखना है? 2. पीड़ित वही, कहानी बदली गई दोनों मामलों में सबसे पहले पीड़ित के चरित्र और परिस्थितियों पर सवाल उठाए गए। कहीं पढ़ाई और मूवमेंट को शक के दायरे में लाया गया, तो कहीं पारिवारिक विवाद की थ्योरी उछाली गई। असली सवाल—कातिल कौन है—हाशिए पर चला गया। शिल्पी-गौतम हत्याकांडः द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने शुरुआती जांच में बताया कि शिल्पी और गौतम की मौत सेक्स के दौरान हुई है। कार बंद थी। एसी ऑन था। संबंध बनाने के दौरान उन्हें घुटन होने लगी। कार में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस फैल गया। दम घुटने की वजह से दोनों की मौत हो गई। तीन साल बाद CBI ने पुलिस की जांच को सही बताया सितंबर 1999 से 2004 तक CBI की टीम ने पटना और फुलवारी शरीफ की गलियों में हर तरह की छानबीन की। तीन साल की लंबी जद्दोजहद के बाद CBI ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में दावा किया कि यह हत्या का मामला नहीं था, बल्कि शिल्पी और गौतम ने जहर खाकर अपनी जान दी। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः पुलिस जांच से पहले ही आत्महत्या करार दे चुकी है। हालांकि, लोगों का आक्रोश देखते हुए पुलिस अपने बयान से बैकफुट पर है। SIT मामले की जांच कर रही है, लेकिन उसकी जांच की दिशा अपने पहले के बयानों की तरफ मुड़ती दिख रही है। 3. सत्ता-सिस्टम की खामोशी NEET स्टूडेंट केस हो या शिल्पी–गौतम हत्याकांड-राजनीतिक बयान देर से आए, वो भी औपचारिक। न तत्काल जवाबदेही तय हुई, न अफसरों पर कार्रवाई। सिस्टम ने पहले खुद को बचाया, पीड़ितों को नहीं। शिल्पी गौतम हत्याकांडः दोनों कपल की बॉडी गराज में मिली थी। इस घटना की सूचना मिलते ही वहां पुलिस से पहले तत्कालीन RJD विधायक साधु यादव के समर्थक पहुंच गए और हंगामा करने लगे। नारेबाजी करने लगे। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः 6 जनवरी को NEET की तैयारी कर रही छात्रा शंभू हॉस्टल के कमरे में बेहोश मिली। हॉस्टल के कर्मचारी हॉस्पिटल ले गए। एक हॉस्पिटल, दो हॉस्पिटल और फिर तीसरे हॉस्पिटल में मौत। 6 जनवरी से 9 जनवरी तक चले इस घटनाक्रम में पुलिस सीन से गायब रही। 4. दबाव में पुलिस की जांच थोड़ी आगे बढ़ी दोनों ही मामलों में पीड़ित परिवार इंसाफ के लिए सड़क पर उतरे। मीडिया, सोशल मीडिया और जनदबाव के बिना जांच आगे बढ़ती नहीं दिखी। सवाल यह है—क्या न्याय पाने के लिए हर परिवार को आंदोलन करना होगा? शिल्पी गौतम हत्याकांडः पुलिस के बिना जांच किए सुसाइड करार देने पर विपक्ष सड़क पर उतर गया। प्रदर्शन शुरू हो गए। पटना की गलियां नारों से गूंज उठीं- ‘साधु यादव को नहीं बख्शा जाएगा!’ NEET स्टूडेंट हत्याकांडः छात्रा की मौत के बाद पटना SSP कार्तिकेय शर्मा ने कहा था, ‘नींद की गोली के ओवरडोज से छात्रा की मौत हुई है।’ हंगामा बढ़ा। लोगों ने प्रदर्शन किया तब पुलिस ने अपने बयान से यू-टर्न ले लिया। बवाल बढ़ता देख DGP विनय कुमार ने छात्रा की मौत के 6 दिन बाद 16 जनवरी को SIT बनाई। अब SIT मामले की जांच कर रही है। IG जितेंद्र राणा मामले की निगरानी कर रहे हैं। पुलिस ने अब तक मामले का खुलासा नहीं किया है। सवाल आज भी वही… NEET स्टूडेंट रेप-हत्याकांड और शिल्पी–गौतम हत्याकांड सिर्फ 2 केस नहीं, बल्कि सिस्टम के चेहरे पर पड़े वही पुराने दाग हैं-जो हर बार नए नामों के साथ सामने आते हैं। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक अगली खबर बस नाम बदलेगी… कहानी वही रहेगी। एक शहर, दो घटनाएं… और वही सिस्टम की चुप्पी। एक तरफ NEET की तैयारी कर रही होनहार छात्रा सपनों के साथ घर से निकली और लौटी तो सिर्फ एक लाश। दूसरी तरफ शिल्पी-गौतम एक आम परिवार, रोजमर्रा की जिंदगी और अचानक मौत का साया। नाम अलग हैं, कहानियां अलग दिखती हैं, लेकिन दोनों हत्याकांडों की तह में उतरिए तो तस्वीर एक जैसी नजर आती है-दरिंदगी, लापरवाही और सिस्टम की नाकामी। मानों लड़कियों के लिए 27 सालों में कुछ बदला ही नहीं है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में पढ़िए, 1999 की शिल्पी-गौतम हत्याकांड और 2026 की NEET स्टूडेंट की हत्या में क्या समानता है। कैसे महिलाओं के लिए कुछ नहीं बदला है। कैसे आज भी बिहार की बेटियां बेबसी ओढ़े हुए हैं। 1. शुरुआती जांच में ही चूक NEET स्टूडेंट केस हो या शिल्पी-गौतम हत्याकांड, दोनों में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई सवालों के घेरे में रही। सबूतों को समय पर सुरक्षित नहीं किया गया, घटनास्थल से अहम कड़ियां गायब रहीं और केस की दिशा तय करने में देर होती रही। शिल्पी-गौतम हत्याकांडः 3 जुलाई, 1999, नीले सूट में, कंधे पर बैग टांगे शिल्पी जैन रिक्शे पर बैठकर कोचिंग के लिए निकल रही थी। शिल्पी ‘मिस पटना’ रह चुकी थी। वह गौतम की दोस्त थी। रिक्शा अभी उसके घर के कनाल रोड के मोड़ पर पहुंचा ही था कि पीछे से एक सफेद कार धीरे-धीरे पास आई। अंदर से एक जानी-पहचानी आवाज आई- ‘अरे शिल्पी! रिक्शे में क्यों? मेरी गाड़ी में बैठो, छोड़ देता हूं।’ वो गौतम सिंह का दोस्त था। शिल्पी को गौतम पर भरोसा था और उसके दोस्तों पर भी। ‘अच्छा, बस पास तक छोड़ देना’, उसने मुस्कुराते हुए कहा और रिक्शा रुकवा दिया। वो कार में बैठ गई। शुरुआत में सब सामान्य था- कार उसी दिशा में बढ़ी, जहां शिल्पी की कोचिंग थी, लेकिन कुछ मिनट बाद, उसने देखा कि रास्ता बदल गया है। गाड़ी अब शहर से बाहर की तरफ मुड़ चुकी थी। ‘ये रास्ता तो नहीं है मेरे इंस्टीट्यूट का…?’, उसने हैरान होकर पूछा। बगल में बैठा गौतम का दोस्त मुस्कुराया, बोला- ‘अरे, घबराओ मत। वाल्मी गेस्ट हाउस चल रहे हैं। गौतम वहीं है, उसने बुलाया है। कुछ जरूरी बात करनी है।’ उधर, गौतम सिंह को किसी ने बताया- ‘शिल्पी को वाल्मी गेस्ट हाउस ले जाया गया है।’ वो सन्न रह गया। दौड़ा-भागा वहां पहुंचा। पहली मंजिल पर पहुंचा तो गौतम की सांस रुक गई। वो दरवाजे की ओर भागा। दरवाजा आधा खुला था। कमरे में शिल्पी थी- उसके कपड़े आधे फटे हुए, चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ। चारों तरफ कुछ लोग खड़े थे- वही चेहरे, जिन्हें गौतम अक्सर अपने साथ राजनीति के दांव-पेच में देखता था। वो लोग अब जानवर बन चुके थे। गौतम ने चिल्लाकर कहा, ‘रुको! छोड़ दो उसे!’ लेकिन उसकी आवाज उनकी गंदी हंसी में गुम हो गई। उसने झपटकर शिल्पी की ओर बढ़ने की कोशिश की, मगर पीछे से किसी ने उसे पकड़ लिया। और अगले ही पल, पहला मुक्का उसके चेहरे पर पड़ा। गौतम लड़ने की कोशिश करता रहा, पर हर तरफ से लातें और घूसे पड़ने लगे। वो बार-बार गिरता, उठता, फिर गिरता। सामने, वही लोग शिल्पी के साथ दरिंदगी करते रहे- और वो कुछ नहीं कर पाया। किसी ने पास रखे गिलास में कुछ मिलाया- कोई कड़वी-सी चीज, शायद जहर। थोड़ी देर बाद वही गिलास शिल्पी के होठों पर लगाया गया। वो बेहोश हो चुकी थी। कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ पंखे की आवाज रह गई। दो लोग फर्श पर पड़े थे। (…लोगों की चर्चाओं के आधार पर तब के अखबारों में ऐसा ही छपा था।) गैराज में मिली शिल्पी-गौतम की अर्ध नग्न लाश इधर, घर नहीं पहुंची शिल्पी तो घरवालों ने गांधी मैदान थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। थोड़ी ही देर में पुलिस साधु यादव के क्वार्टर के बाहर पहुंची। वहां पुलिस से पहले कुछ लोग जमा थे- कुछ चौकीदार, कुछ स्थानीय लोग। फुलवारी शरीफ के उस पुराने MLA क्वार्टर के पीछे एक गैराज था- आधा टूटा-फूटा, जिसमें अक्सर सफेद गाड़ियां पॉलिश होती थीं। इसके भीतर से पेट्रोल और धुएं की तेज गंध आ रही थी। थानेदार ने टॉर्च जलाया और धीरे से अंदर कदम रखा। पहली नजर में लगा, कोई हादसा हुआ है, लेकिन जैसे ही रोशनी वहां खड़ी कार के भीतर पड़ी- सबके होश उड़ गए। सामने सफेद कार खड़ी थी। अंदर दो शव पड़े थे- गौतम सिंह और शिल्पी जैन के। गौतम के शरीर पर सिर्फ पैंट थी। बगल में शिल्पी पड़ी थी- उसके ऊपरी हिस्से पर सिर्फ एक टी-शर्ट थी, जो साफ तौर पर गौतम की थी। बाकी कपड़े गायब थे। थानेदार कुछ पल के लिए चुप रहा, लेकिन इससे पहले कि पुलिस और जांच करती, एक जोरदार शोर उठा- गेट के बाहर कुछ गाड़ियों की हेडलाइटें चमक उठीं और भीड़ उमड़ आई। एक गाड़ी के बाहर से भारी आवाज सुनाई दी- ‘क्या हो रहा है यहां? वो साधु यादव थे। पुलिस वालों ने झटपट सलाम ठोका। थानेदार कुछ कहने ही वाला था कि साधु ने इशारे से बात रोक दी। ‘लाश मिली है?’ थानेदार ने सिर झुका लिया, ‘जी… कार में…’ साधु कुछ पल कार की ओर देखते रहे। ‘जांच करो… जो करना है, करो’, उन्होंने कहा, और पीछे हट गए। अब गैराज के भीतर सिर्फ पुलिस थी और दो बेजान जिस्म। एक पुलिस वाले ने धीरे से कहा, ‘गाड़ी को थाने ले चलते हैं।’ ‘लेकिन सर, फिंगर प्रिंट्स…’थानेदार ने डांट दिया, ‘ज्यादा दिमाग मत लगाओ।’ गाड़ी स्टार्ट की गई और थाने ले जाई गई- उसी वक्त दोनों के शरीर भी पोस्टमॉर्टम के लिए भेजे गए। रात के साढ़े 9 बज चुके थे। एक रिपोर्टर ने अफसर से पूछा, ‘साहब, ये मर्डर है या एक्सीडेंट?’ अफसर ने कहा- ना, ना, आत्महत्या लग रही है।’ ‘लेकिन पोस्टमॉर्टम तो हुआ नहीं अभी?’ ‘हम इतने केस देख चुके हैं कि पहली नजर में समझ जाते हैं मौत कैसे हुई।’ अफसर ने जवाब दिया, और किसी को भी अंदर जाने से रोक दिया। रात गहराती गई। पोस्टमॉर्टम उसी रात किया गया, जल्दबाजी में, बिना परिजनों की मौजूदगी के। रात में ही गौतम का अंतिम संस्कार कर दिया गया। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET छात्रा के रेप-मौत मामले की सूचना मिलने के बाद भी 3 दिन तक थाना प्रभारी रोशनी कुमारी घटनास्थल पर पहुंचीं ही नहीं। भास्कर की पड़ताल में पता चला है कि लड़की से वारदात की जानकारी चित्रगुप्त नगर थाना प्रभारी रोशनी कुमारी को कदमकुआं थाने से मिली थी। उस वक्त वह गांधी मैदान में मीटिंग में थीं। सूचना मिलने के बाद वह अस्पताल तो पहुंचीं, लेकिन घटनास्थल यानी हॉस्टल कहां है, इसकी उन्हें जानकारी तक नहीं थी। परिजन बोले-कपड़े पर लगा था खून, डॉक्टर ने फेंक दिया परिजनों ने कहा- सबसे पहले उनकी बच्ची को हॉस्टल के पास सहज सर्जरी में भर्ती कराया गया। वहां से एक निजी अस्पताल ले जाया गया। वहां के एक जूनियर डॉक्टर और अस्पताल के स्टाफ ने हमें बताया कि पीड़िता के कपड़े पर खून लगा था। जब हमने बच्ची का कपड़ा मांगा तो डॉक्टर ने थानेदार और हॉस्टल संचालक की मौजूदगी में कहा-फेंक दिया हूं। डॉक्टर ने कहा-तुम्हें बच्ची को बचाना है या उसका कपड़ा रखना है? 2. पीड़ित वही, कहानी बदली गई दोनों मामलों में सबसे पहले पीड़ित के चरित्र और परिस्थितियों पर सवाल उठाए गए। कहीं पढ़ाई और मूवमेंट को शक के दायरे में लाया गया, तो कहीं पारिवारिक विवाद की थ्योरी उछाली गई। असली सवाल—कातिल कौन है—हाशिए पर चला गया। शिल्पी-गौतम हत्याकांडः द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने शुरुआती जांच में बताया कि शिल्पी और गौतम की मौत सेक्स के दौरान हुई है। कार बंद थी। एसी ऑन था। संबंध बनाने के दौरान उन्हें घुटन होने लगी। कार में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस फैल गया। दम घुटने की वजह से दोनों की मौत हो गई। तीन साल बाद CBI ने पुलिस की जांच को सही बताया सितंबर 1999 से 2004 तक CBI की टीम ने पटना और फुलवारी शरीफ की गलियों में हर तरह की छानबीन की। तीन साल की लंबी जद्दोजहद के बाद CBI ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में दावा किया कि यह हत्या का मामला नहीं था, बल्कि शिल्पी और गौतम ने जहर खाकर अपनी जान दी। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः पुलिस जांच से पहले ही आत्महत्या करार दे चुकी है। हालांकि, लोगों का आक्रोश देखते हुए पुलिस अपने बयान से बैकफुट पर है। SIT मामले की जांच कर रही है, लेकिन उसकी जांच की दिशा अपने पहले के बयानों की तरफ मुड़ती दिख रही है। 3. सत्ता-सिस्टम की खामोशी NEET स्टूडेंट केस हो या शिल्पी–गौतम हत्याकांड-राजनीतिक बयान देर से आए, वो भी औपचारिक। न तत्काल जवाबदेही तय हुई, न अफसरों पर कार्रवाई। सिस्टम ने पहले खुद को बचाया, पीड़ितों को नहीं। शिल्पी गौतम हत्याकांडः दोनों कपल की बॉडी गराज में मिली थी। इस घटना की सूचना मिलते ही वहां पुलिस से पहले तत्कालीन RJD विधायक साधु यादव के समर्थक पहुंच गए और हंगामा करने लगे। नारेबाजी करने लगे। NEET स्टूडेंट हत्याकांडः 6 जनवरी को NEET की तैयारी कर रही छात्रा शंभू हॉस्टल के कमरे में बेहोश मिली। हॉस्टल के कर्मचारी हॉस्पिटल ले गए। एक हॉस्पिटल, दो हॉस्पिटल और फिर तीसरे हॉस्पिटल में मौत। 6 जनवरी से 9 जनवरी तक चले इस घटनाक्रम में पुलिस सीन से गायब रही। 4. दबाव में पुलिस की जांच थोड़ी आगे बढ़ी दोनों ही मामलों में पीड़ित परिवार इंसाफ के लिए सड़क पर उतरे। मीडिया, सोशल मीडिया और जनदबाव के बिना जांच आगे बढ़ती नहीं दिखी। सवाल यह है—क्या न्याय पाने के लिए हर परिवार को आंदोलन करना होगा? शिल्पी गौतम हत्याकांडः पुलिस के बिना जांच किए सुसाइड करार देने पर विपक्ष सड़क पर उतर गया। प्रदर्शन शुरू हो गए। पटना की गलियां नारों से गूंज उठीं- ‘साधु यादव को नहीं बख्शा जाएगा!’ NEET स्टूडेंट हत्याकांडः छात्रा की मौत के बाद पटना SSP कार्तिकेय शर्मा ने कहा था, ‘नींद की गोली के ओवरडोज से छात्रा की मौत हुई है।’ हंगामा बढ़ा। लोगों ने प्रदर्शन किया तब पुलिस ने अपने बयान से यू-टर्न ले लिया। बवाल बढ़ता देख DGP विनय कुमार ने छात्रा की मौत के 6 दिन बाद 16 जनवरी को SIT बनाई। अब SIT मामले की जांच कर रही है। IG जितेंद्र राणा मामले की निगरानी कर रहे हैं। पुलिस ने अब तक मामले का खुलासा नहीं किया है। सवाल आज भी वही… NEET स्टूडेंट रेप-हत्याकांड और शिल्पी–गौतम हत्याकांड सिर्फ 2 केस नहीं, बल्कि सिस्टम के चेहरे पर पड़े वही पुराने दाग हैं-जो हर बार नए नामों के साथ सामने आते हैं। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक अगली खबर बस नाम बदलेगी… कहानी वही रहेगी।


