UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी से गर्म हो चुके हैं। भाजपा, सपा, कांग्रेस सब सक्रिय हैं, लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मायावती के नेतृत्व में चुनाव को त्रिकोणी मुकाबला बना दिया है। मायावती अब पूरी तरह एक्टिव हो गई हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वे लगातार रैलियां कर रही हैं और नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठकें कर रही हैं। उनका निशाना साफ है, दलित और पिछड़े वोट बैंक को मजबूत करना।
सबसे बड़ा गेमचेंजर दलित-पिछड़ा वोट बैंक
यूपी में दलित वोटर करीब 21 फीसदी और पिछड़े वोटर 40 फीसदी से ज्यादा हैं। ये दोनों मिलकर चुनाव का रुख बदल सकते हैं। अखिलेश यादव की सपा मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम वोट पर भरोसा करती है। लेकिन अगर मायावती दलितों के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ों को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं, तो सपा का खेल बिगड़ सकता है। पिछले चुनावों में बसपा ने दलित वोट को एकजुट रखा था। इस बार मायावती उस वोट बैंक को और मजबूत करने में लगी हैं। वे ग्रामीण इलाकों में रैलियां कर रही हैं, जहां दलित और पिछड़े बहुल इलाके हैं। अपनी सभाओं में वे कह रही हैं कि दलित-ब्राह्मण-पिछड़ा एक होकर विकास का रास्ता बनाएंगे। बसपा की रणनीति साफ है कि जाटव, पासी, कोरी जैसे दलित समुदायों को एकजुट करना और कुर्मी, लोधी, गुर्जर, यादव-छोड़कर बाकी पिछड़ों को साधना।
मायावती दलित-पिछड़ा वोट कैसे साध रही हैं?
मायावती की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘बहुजन’ छवि है। वे खुद को दलितों की मसीहा बताती हैं। रैलियों में वे कहती हैं कि भाजपा ने दलितों को सिर्फ नाम दिया, लेकिन असली विकास बसपा ने किया। वे पिछड़ों को भी भरोसा दिला रही हैं कि बसपा उनके हितों की रक्षा करेगी। बैठकों में वे स्थानीय दलित और पिछड़े नेताओं को टिकट का लालच दे रही हैं। कई छोटे-छोटे पिछड़े संगठनों के नेताओं को बसपा में शामिल किया जा रहा है। मायावती का फॉर्मूला पुराना लेकिन कारगर है “सबको साथ लेकर चलो”। इससे दलित वोट तो पक्का रहता है, पिछड़ों का बड़ा हिस्सा भी टूटकर बसपा की तरफ जा सकता है।
मुस्लिम वोट का छोटा, लेकिन अहम हिस्सा
मायावती के पाले में मुस्लिम वोट का भी कुछ हिस्सा मिलता है। हालांकि मुस्लिम वोटर मुख्य रूप से सपा के साथ होते हैं, लेकिन कुछ मुस्लिम समुदाय बसपा को विकल्प मान रहे हैं। खासकर वे मुस्लिम जो भाजपा विरोधी हैं, लेकिन सपा की यादव-केंद्रित छवि से नाराज हैं। मायावती की रैलियों में मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी बढ़ रही है। बसपा का यह ‘मुस्लिम + दलित + पिछड़ा; का छोटा-सा गठजोड़ अखिलेश के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
अखिलेश का खेल क्यों बिगड़ सकता है?
अखिलेश यादव सपा को ‘पहचान और विकास’ का नारा देकर आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन अगर दलित-पिछड़ा वोट बैंक बंट गया तो सपा के उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने का खतरा बढ़ जाएगा। यूपी की 403 सीटों में कई सीटें ऐसी हैं, जहां दलित और पिछड़े वोटर निर्णायक हैं। बसपा अगर 15-20 फीसदी वोट भी काट ले तो भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला टूट सकता है। राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि 2027 में बसपा त्रिकोणी लड़ाई की वजह से किंगमेकर बन सकती है। मायावती का सक्रिय होना सपा के लिए सबसे बड़ा चैलेंज है।
दलित-पिछड़ा वोट बैंक जितना ज्यादा बंटेगा, उतना ही अखिलेश का रास्ता मुश्किल होगा। अभी से सारी निगाहें मायावती की रैलियों और बसपा की रणनीति पर हैं। 2027 का चुनाव सिर्फ तीन दलों का नहीं, बल्कि दलित-पिछड़ा वोट बैंक का गेमचेंजर बनने वाला है। मायावती कितना वोट काट पाती हैं, यह तय करेगा कि अखिलेश का सपना पूरा होता है या फिर बसपा फिर से यूपी की सियासत का बड़ा खिलाड़ी बन जाती है।


