US Iran Ceasefire: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर बना दिया था। अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से ज्यादा समय तक चले युद्ध के बाद अब जाकर दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बनी है। दोनों देशों को भारी टकराव के बाद इस युद्धविराम के लिए सहमत करने में पाकिस्तना की भूमिका अहम मानी जा रही है। सीजफायर की घोषणा के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर को दोनों पक्षों ने धन्यवाद दिया, जिससे साफ है कि इस्लामाबाद ने पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण मध्यस्थता की है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ईरान और अमेरिका ने ईरान को ही क्यों मध्यस्थता के लिए चुना।
दोनों देशों के बीच संचार का मुख्य माध्यम रहा पाकिस्तान
सीजफायर से पहले पाकिस्तान ने लगातार डिप्लोमैटिक प्रयास तेज कर दिए थे। मार्च के अंत में इस्लामाबाद ने तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की थी। इस दौरान क्षेत्र में शांति बहाल करने के विकल्पों पर चर्चा हुई। जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा, तब पाकिस्तान ने बैकचैनल बातचीत में अहम भूमिका निभाई। बताया जाता है कि अमेरिका के प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ईरान तक पहुंचे और ईरान के जवाब भी इसी माध्यम से वाशिंगटन भेजे गए। इस तरह पाकिस्तान दोनों देशों के बीच संचार का मुख्य माध्यम बन गया।
ईरान और अमेरिका को पाकिस्तान पर भरोसा
पाकिस्तान पर दोनों देशों का भरोसा उसके मध्यस्थ बनने के पीछे की मुख्य वजह माना जा रहा है। ईरान अपने अरब पड़ोसियों पर भरोसा नहीं करता क्योंकि उनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं। वहीं पाकिस्तान का ईरान के साथ साझा सीमा और ऐतिहासिक संबंध हैं, जिससे विश्वास बना। दूसरी ओर, पाकिस्तान के इजरायल से राजनयिक संबंध नहीं हैं, जो ईरान के नजरिए से महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान के रिश्ते हाल के वर्षों में बेहतर हुए हैं। असीम मुनीर के अमेरिका और ईरान दोनों के रक्षा तंत्र में संपर्क होने से इस्लामाबाद को अतिरिक्त बढ़त मिली है।
आर्थिक और रणनीतिक कारण भी शामिल
पाकिस्तान का सीजफायर के लिए प्रयास केवल कूटनीतिक प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी थे। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। साथ ही, लाखों पाकिस्तानी नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और वहां से भेजी जाने वाली रकम देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, ईरान में अस्थिरता और अफगानिस्तान के साथ तनाव पहले से ही पाकिस्तान के लिए चुनौती बने हुए हैं।
हालत अभी भी नाजुक बने हुए
हालांकि पाकिस्तान को इस कूटनीतिक सफलता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, लेकिन यह स्थिति अभी स्थिर नहीं है। सीजफायर अस्थायी है और इसके टूटने का खतरा बना हुआ है। अगर समझौता विफल होता है, तो इसका असर पाकिस्तान की साख पर भी पड़ सकता है। साथ ही, किसी एक पक्ष के खिलाफ झुकाव दिखाने से पाकिस्तान के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।


