जयपुर। “डॉक्टर साहब, दवाइयां ले रहे हैं, कई वर्ष से थेरेपी चल रही है, फिर भी मन का बोझ कम नहीं हो रहा…” प्रदेश के मनोरोग विशेषज्ञों के पास रोजाना इस तरह के मामले आ रहे हैं। ऐसे मरीजों से सवाल पूछा जाता है..“आपकी जिंदगी में वह कौन सा रिश्ता है, जो आपको सबसे ज्यादा तनाव दे रहा है ?” यही सवाल अक्सर इलाज की असली दिशा तय कर देता है। विशेषज्ञों के अनुसार डिप्रेशन और एंग्जायटी को केवल “केमिकल लोचा” मान लेना अधूरा सच है। शोध बताते हैं कि 70 से 80 प्रतिशत मामलों में ‘इंटरपर्सनल स्ट्रेस’ यानी रिश्तों का तनाव मुख्य कारण होता है। जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, तो भावनात्मक असंतुलन सीधे दिमाग की केमिस्ट्री सेरोटोनिन और डोपामिन को प्रभावित करता है।
इंटरपर्सनल थेरेपी (आईपीटी) रिश्तों के जरिए इलाज की पद्धति है। इसमें मरीज को अपने जीवन के पांच अहम लोगों के नाम लिखकर हर रिश्ते को चार श्रेणियों में बांटने को कहा जाता है। सपोर्ट, न्यूट्रल, मोटिवेशन या तनाव। जिस नाम के आगे ‘तनाव’ लिखा है, वहीं से मानसिक ऊर्जा लीक हो रही है। दवाइयां तब तक पूरा असर नहीं दिखातीं, जब तक यह लीकेज बंद न हो।”
हर चौथे-पांचवे इंसान को अपनों से दर्द
क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन के आधार पर हर चौथे-पांचवे व्यक्ति की मानसिक परेशानी की जड़ किसी करीबी रिश्ते में छिपी होती है। पति-पत्नी के मतभेद, पीढ़ियों का टकराव, कार्यस्थल का दबाव या अनकहा शोक इसके सबसे प्रमुख कारण हैं
चार ‘गांठें’ बढ़ाती हैं डिप्रेशन
- अनकहा शोक : किसी अपने को खोने या धोखे का दर्द दबा लेना
- रोल डिस्प्यूट : तुम मुझे समझते नहीं..जैसे लगातार विवाद
- रोल ट्रांजिशन : नई जिम्मेदारियों या जीवन बदलाव से तालमेल न बैठा पाना।
- सोशल आइसोलेशन : अकेलापन और भावनात्मक दूरी
‘रिलेशनशिप हेल्थ चेक’
- किसी खास व्यक्ति का नाम लेते ही बेचैनी बढ़ती है ?
- आपने कोई बड़ा दुख दबा रखा है?
- संवाद में आरोप ज्यादा, जरूरत कम व्यक्त होती है ?
- आप खुद को भावनात्मक रूप से अकेला महसूस करते हैं ?
(इन सवालों का जवाब ‘हां’ है, तो समस्या दिमाग के केमिकल से ज्यादा रिश्तों की हो सकती है)
जब बहू से विवाद बना अवसाद
जयपुर की 42 वर्षीय गृहिणी पिछले दो साल से एंटीडिप्रेसेंट ले रही थीं, पर सुधार नहीं था। काउंसलिंग में सामने आया कि बहू के साथ लगातार टकराव और बेटे की चुप्पी उन्हें भीतर से तोड़ रही थी। आईपीटी के तहत संवाद शैली बदली गई, आरोपों की जगह जरूरतें व्यक्त करना सिखाया गया। तीन महीनों में दवाओं की मात्रा आधी हो गई और नींद सामान्य होने लगी। ऐसे मामले में दवा और थेरेपी दोनों जरूरी हैं, लेकिन केवल दवा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं। “रिश्तों की मरम्मत किए बिना मानसिक स्वास्थ्य अधूरा है।
डॉ.अनिल तांबी, मनोरोग विशेषज्ञ


