…जब ‘लाट साहब’ ने मांगा साल भर का लेखा-जोखा, कोतवाल ने खुद अपने हाथों से थमा दिए शराब और रुपए

…जब ‘लाट साहब’ ने मांगा साल भर का लेखा-जोखा, कोतवाल ने खुद अपने हाथों से थमा दिए शराब और रुपए

होली के मौके पर शाहजहांपुर में निकलने वाला ऐतिहासिक और अनोखा ‘लाट साहब’ का जुलूस इस बार कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। परंपरा के अनुसार हुरियारे ‘लाट साहब की जय’ के नारे लगाते हुए उन्हें जूतों से मारते रहे, जबकि लाट साहब पुलिस और पीएसी के सुरक्षा घेरे में रहे।

जुलूस की शुरुआत परंपरागत रूप से फूलमती देवी मंदिर से हुई, जहां लाट साहब ने माथा टेका। इसके बाद जुलूस कोतवाली पहुंचा, जहां कोतवाल ने उन्हें सलामी दी। इसी दौरान वर्षों से चली आ रही रस्म के तहत लाट साहब ने कोतवाल से साल भर के अपराधों का लेखा-जोखा मांगा। परंपरा के मुताबिक कोतवाल ने उन्हें नगद धनराशि और शराब की बोतल भेंट कर रिपोर्ट से इति श्री कर ली।

लाट साहब के लिए बना था सिंहासन

पूरे मार्ग में हुरियारे जयकारे लगाते हुए लाट साहब को जूते मारते रहे। बैलगाड़ी पर तख्त रखकर और उस पर कुर्सी सजाकर लाट साहब का आसन बनाया गया था। सुरक्षा के लिहाज से उनके सिर पर हेलमेट लगाया गया था और चारों ओर पुलिस व पीएसी के जवान तैनात रहे। जुलूस चार खंबा और टाउन हॉल से होते हुए लगभग आठ किलोमीटर का सफर तय कर पुनः मंदिर पहुंचकर समाप्त हुआ। इसी तरह ‘छोटे लाट साहब’ का जुलूस भी सौहार्दपूर्ण माहौल में निकला।

जुलूस के दौरान ढकी गईं मस्जिदें

जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 48 मस्जिदों और मजारों को मोटी प्लास्टिक से ढका गया था। साथ ही 148 गलियों में बैरीकेडिंग कर भीड़ नियंत्रण के इंतजाम किए गए। पूरे आयोजन को सात जोन में बांटकर 136 मजिस्ट्रेट तैनात किए गए थे।

पुलिस अधीक्षक राजेश द्विवेदी के अनुसार जुलूस की सुरक्षा में चार अपर पुलिस अधीक्षक, 13 क्षेत्राधिकारी, 310 दारोगा, 1200 सिपाही, 500 होमगार्ड्स, चार कंपनी पीएसी, चार कंपनी रैपिड एक्शन फोर्स और एनडीआरएफ की टीम तैनात रही।

क्या है ‘लाट साहब’ जुलूस की परंपरा?

स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत 1728 में हुई थी, जब नवाब अब्दुल्ला खान होली के दिन शहर लौटे और हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने उनके साथ मिलकर उत्सव मनाया।

1859 में अंग्रेजों के दोबारा कब्जे के बाद जिला प्रशासन इस जुलूस का आयोजन करने लगा। वर्ष 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम ‘लाट साहब’ का जुलूस कर दिया। समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया और जूते-चप्पलों से मारने की परंपरा जुड़ गई। 1990 में इसे रोकने के लिए याचिका दायर की गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *