आपकी बात: अकेले रह रहे बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए क्या विशेष कदम उठाए जाने चाहिए?

आपकी बात: अकेले रह रहे बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए क्या विशेष कदम उठाए जाने चाहिए?

एकीकृत ‘नेशनल एल्डर सेफ्टी नेटवर्क’ की आवश्यकता

भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लॉन्जिट्यूडल एजिंग स्टडी इन इंडिया (2017-18) के अनुसार करीब 6% वरिष्ठ नागरिक अकेले रहते हैं, जिनकी संख्या 80-90 लाख तक है। शहरीकरण और पलायन से उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां बढ़ रही हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार को जोड़ने वाला एक डिजिटल नेटवर्क शुरू करना चाहिए। इसमें जीपीएस डिवाइस, टेलीमेडिसिन, नियमित पुलिस विजिट और साइबर सुरक्षा जागरूकता को शामिल किया जाना जरूरी है। – डॉ. नयन प्रकाश गांधी, मुंबई

अकेले बुजुर्गों के लिए केयरटेकर व्यवस्था जरूरी

जो बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं या जिनके बच्चे उनकी देखभाल नहीं कर रहे, उनके लिए सरकारी स्तर पर केयरटेकर की व्यवस्था की जानी चाहिए। यह व्यवस्था उनके दैनिक जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा को बेहतर बना सकती है। यदि समय रहते यह कदम नहीं उठाए गए तो कई बुजुर्गों का जीवन बेहद कठिन और असुरक्षित हो सकता है। – प्रियव्रत चारण, जोधपुर

घरेलू सहयोग और निगरानी से बढ़ेगी सुरक्षा

अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए उनके घरों में 24×7 निगरानी व्यवस्था जरूरी है। इसके तहत सीसीटीवी कैमरे लगाना, विश्वसनीय घरेलू सहायकों की नियुक्ति और बच्चों से उचित भरण-पोषण सुनिश्चित करना अहम है। साथ ही, उन्हें मुफ्त या सस्ती चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि उनका जीवन सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके। – वसंत बापट, भोपाल

तकनीक के साथ मानवीय संवाद भी जरूरी

बुजुर्गों की सुरक्षा केवल तकनीकी उपायों से सुनिश्चित नहीं हो सकती। घर में मजबूत ग्रिल, डिजिटल लॉक और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, साथ ही काम करने वाले लोगों का पूरा सत्यापन हो। बुजुर्गों के पास एसओएस अलर्ट सिस्टम होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है कि परिवार उनके साथ नियमित संवाद बनाए रखे, ताकि वे सुरक्षित और भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करें। – मोदिता सनाढ्य, उदयपुर

पारिवारिक सहयोग और सामाजिक पहल का महत्व

वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए निजी सहायक रखना उपयोगी हो सकता है, जो उनकी दिन-रात सेवा करे। परिवार के सदस्य नियमित रूप से उनसे संवाद करें, चाहे वीडियो कॉल के माध्यम से ही क्यों न हो। सामाजिक स्तर पर भी पिकनिक, बैठक और हेल्पलाइन जैसी पहलें शुरू की जानी चाहिए। इससे बुजुर्गों को अपनापन और सुरक्षा का अहसास मिलता है। – मुकेश सोनी, जयपुर

तकनीक और स्वयंसेवी संस्थाओं का समन्वय

बुजुर्गों में अकेलापन और अवसाद एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसके समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं के बीच समन्वय जरूरी है। एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जाए, जो जरूरत पड़ने पर तुरंत संबंधित एनजीओ को सूचना दे सके। स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित कर और उन्हें प्रोत्साहित कर इस कार्य में युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। – अशोक रायजादा, जोधपुर

स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक समर्थन की जरूरत

अकेले रह रहे बुजुर्गों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, सुरक्षा सेवाएं और सामाजिक संपर्क बेहद जरूरी हैं। सरकार और समाज को मिलकर ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए, जो उनके जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकें। सुरक्षित आवास और देखभाल की समुचित व्यवस्था भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। – विजेंद्र कुमार जांगीड़, जयपुर

रिश्तों में संवाद ही सबसे बड़ी सुरक्षा

बदलते सामाजिक ढांचे में बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है, जिससे वे मानसिक तनाव और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी है कि परिवार के लोग उनसे नियमित संवाद करें, उन्हें बोझ न समझें और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखें। भावनात्मक सहयोग ही उनके जीवन को सुरक्षित और संतुलित बना सकता है। – शिवजी लाल मीना, जयपुर

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