अर्थव्यवस्थाओं को संकट की ओर धकेल रहा युद्ध

डॉ. रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

आज की दुनिया को देखकर न जाने क्यों यह लगने लगता है कि एक दुनिया मर रही है और जो कुछ भी नया जन्म ले रहा है, वह दुनिया के लिए अपेक्षित तो नहीं है। मैं बात उन युद्धों की कर रहा हूं जो दुनिया को धीरे-धीरे करके मार रहे हैं और किसलिए? सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं और अहमन्यताओं के लिए? ये युद्ध भले ही रूस व यूक्रेन या फिर ईरान व अमरीका-इजराइल के बीच दिख रहे हों लेकिन इनसे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। कोई भी युद्ध अब युद्ध के मैदान में नहीं लड़ा जाता है, बल्कि वह शहरों से कस्बों और कस्बों से जिंदगियों के बीच भी लड़ा जाता है। उसमें क्षति केवल संसाधनों की नहीं होती है बल्कि जिंदगियों की भी होती है। रूस और यूक्रेन युद्ध से प्रभावित दुनिया अब ईरान केंद्रित अमरीका-इजराइल युद्ध का सामना कर रही है जिसे लेकर अर्थव्यवस्था और लोगों पर पडऩे वाले प्रभाव की चिंताएं हर तरफ दिखने लगी हैं। ऊपरी तौर पर तो इस प्रभाव को तेल और गैस संकट तक सीमित कर देखा जा रहा है लेकिन यह खाद (फर्टिलाइजर) और खाद्यान्न तक जाएगा जिससे न केवल उत्पादन की लागतें बढ़ेंगी बल्कि जिंदगियों को जीने का खर्च भी बढ़ जाएगा।

ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से गायब होते तेल और एलएनजी टैंकरों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। कारण यह कि ईरान और ओमान के बीच मौजूद इस संकरे समुद्री मार्ग से होकर दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी गुजरती है। अब इस ऊर्जा संकट के साथ-साथ युद्ध के आइने से उन जहाजों पर नजर भी गड़ाइए जिनमें खेती के लिए खाद और लोगों के लिए भोजन लदा हुआ होता है। यदि यह रास्ता बंद कर दिया जाए तो? जैसा कि अभी है। तो उन देशों की तो पहले रफ्तार रुकेगी जो इन देशों पर तेल और गैस के लिए निर्भर हैं लेकिन संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन अरब जैसे खाड़ी देशों की सांसें भी रुकने लगेंगी क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य होकर गुजरने वाला समुद्री रास्ता इन देशों के लिए जीवन रेखा है।

मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनियों और ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के अनुसार दुनिया में आयात और निर्यात की जाने वाले प्रमुख फर्टिलाइजर्स जैसे अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है। यही नहीं यूरिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है जिसमें कतर सबसे आगे है। पिछले दिनों ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हब ‘रास लफ्फान’ (कतर) पर हमला किया था जिसके कारण कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा। इसका असर यह हुआ कि लाखों टन जरूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाला कच्चा माल जहां का तहां ही रुक गया। विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी’ के मुताबिक, हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है। इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया खाद संकट की चपेट में आ जाएगी। इसका सीधा असर फसलों की उत्पादकता पर पड़ेगा और उत्पादक की कमी कई अन्य प्रभाव डालेगी, जैसे-सप्लाई चेन को कमजोर करेगी, रोजगार घटाएगी, प्रतिव्यक्ति आय में कमी लाएगी और जीडीपी को नकारात्मक दिशा में ले जाएगी।

तेल और गैस केवल ट्रांसपोर्टेशन पर ही प्रभाव नहीं डालते, भोजन और उसकी कीमतों को तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर वह चाहे खेतों पर चलने वाले ट्रैक्टर हों या खाद्यान्न परिवहन के लिए ट्रक, फसलों को खाने योग्य बनाने वाले प्रोसेसिंग प्लांट और कोल्ड स्टोरेज हों या इन जैसी अन्य इकाइयां। वर्तमान आर्थिक परिदृश्य को देखें तो चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल खाड़ी देशों से मंगाती हैं, वहां ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। यद्यपि भारत सरकार ने अभी तक डीजल और पेट्रोल की कीमतें नहीं बढ़ाई हैं, लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रह पाएगी। भारत अपनी जरूरत की दो-तिहाई नाइट्रोजन खाद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है इसलिए इस दृष्टि से भारत गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है, यदि विकल्प नहीं तलाशे गए तो। यही स्थिति ब्राजील सहित अन्य ब्रिक्स देशों की भी होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि उप-सहारा अफ्रीका के क्षेत्र जो पहले से ही भुखमरी की समस्या से जूझ रहे हैं, वहां यह संकट और गहरा जाएगा। चीन को आज दुनिया के कारखाने के तौर पर देखा जाता है। स्वाभाविक है कि उसकी ग्लोबल सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

फिलहाल अमरीका ने यह युद्ध शायद इसलिए छेड़ा था ताकि होर्मुज पर कब्जा कर खाड़ी क्षेत्र का गेम प्लेयर बन सके लेकिन अब इसके प्रभाव दूरगामी दिख रहे हैं। गोल्डमैन सैच्स का अनुमान है कि अगर सप्लाई बाधित हुई तो ग्लोबल जीडीपी में 0.4 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। लेकिन वह यह भी शंका जाहिर करता है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद रहा और खाड़ी में तेल व गैस का उत्पादन ठप रहा तो ग्लोबल जीडीपी पर प्रभाव एकरेखीय नहीं होगा, बल्कि घातीय होगा। यह युद्ध एक ऐसी नाजुक स्थिति का निर्माण कर चुका है जिससे दुनिया के देशों के बाजार और अर्थव्यवस्थाएं किसी नए झटके को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होगी। वर्तमान स्थिति यह है कि दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाएं संवेदनशील परिस्थितियों से गुजरती हुई दिख रही हैं और यूरोप लडख़ड़ाता हुआ, यदि युद्ध लंबा खिंचा तो ये किधर जाएंगी?

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