‘प्रॉपर्टी के लिए पूरे वंश को खत्म करना चाहा’:जज बोले- मामला रेयरेस्ट ऑफ द रेयर, मृत्युदंड सही, बेगूसराय में ट्रिपल मर्डर केस के आरोपी को सजा-ए-मौत

‘प्रॉपर्टी के लिए पूरे वंश को खत्म करना चाहा’:जज बोले- मामला रेयरेस्ट ऑफ द रेयर, मृत्युदंड सही, बेगूसराय में ट्रिपल मर्डर केस के आरोपी को सजा-ए-मौत

“मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में आता है। अपराध की प्रकृति, क्रूरता और आरोपी के आपराधिक इतिहास को देखते हुए मृत्युदंड ही सही दंड है। मामला दुर्लभतम मामलों में से एक है, ऐसे में मैं दोषी विकास कुमार को मौत की सजा देता हूं। दोषी विकास कुमार को तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए। ये प्रॉपर्टी के लिए पूरे वंश को खत्म करना चाहता था।” ये बातें एडीजे-3 ब्रजेश कुमार सिंह ने अपने आदेश में कहा है। बेगूसराय के चर्चित ट्रिपल मर्डर केस में कोर्ट ने दोषी विकास कुमार को मौत (फांसी) की सजा सुनाई है। सुरक्षा कारणों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हुई पेशी कोर्ट ने लगातार सुनवाई के बाद 6 फरवरी 2026 को विकास कुमार को भारतीय दंड संहिता की धारा- 302 के तहत दोषी ठहराया था। 11 फरवरी को सजा के बिंदु पर सुनवाई निर्धारित की थी। आरोपी को बेउर जेल पटना से पेश करने का आदेश दिया गया था। लेकिन 11 फरवरी को जेल प्रशासन ने अदालत को जानकारी दी कि पटना सिविल कोर्ट परिसर में फर्जी बम कॉल की सूचना के बाद सुरक्षा कारणों से पुलिस बल की तैनाती की गई थी। बेऊर जेल से हुई आरोपी की पेशी विकास को बेगूसराय लाने के लिए पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध नहीं था। सड़क मार्ग से लाना भी असुरक्षित माना गया। इसके बाद जेल प्रशासन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेशी की अनुमति मांगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को कानूनन शारीरिक उपस्थिति के बराबर दर्जा प्राप्त है और हाईकोर्ट के संशोधित नियम भी इसकी अनुमति देते हैं। इसके बाद बेउर जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोषी को प्रस्तुत किया गया और पूरी कार्यवाही हुई। अभियोजन ने कहा- आदतन हत्यारा समाज के लिए खतरा अपर लोक अभियोजक राम प्रकाश यादव ने न्यायालय के सामने दलील दी कि विकास कुमार एक आदतन हत्यारा है। अब तक वह चार हत्याओं में दोषी पाया जा चुका है, जिनमें इस मामले की तीन हत्याएं शामिल हैं। इसके अलावा चाची की हत्या का मामला बेगूसराय के एडीजे-4 की अदालत में विचाराधीन है। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी समाज के लिए गंभीर खतरा है। वह पहले भी हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट चुका है। लेकिन जेल से बाहर आने के बाद उसने दोबारा जघन्य अपराध किया। ऐसे में सुधार की संभावना नहीं दिखती और अधिकतम दंड ही न्यायसंगत है। बचाव पक्ष ने कहा- हजूर परिवार है, चार बेटियां भी है दोषी विकास के वकील ने न्यायालय से नरमी बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि विकास कुमार विवाहित है और उसकी एक युवा पत्नी और चार छोटी बेटियां हैं, जिनका भरण-पोषण उसी पर निर्भर है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि मृत्युदंड के बदले आजीवन कारावास पर्याप्त सजा हो सकती है। जिससे उसके परिवार का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो। लेकिन साक्ष्य के कारण उनकी दलील काम नहीं आई। नहीं हजूर जेल से निकलने पर फिर हत्या करेगा भतीजे शिवम के वकील एसआई रहमान ने तर्क दिया कि एक ही परिवार के तीन व्यक्तियों की हत्या की। शिवम के माता-पिता और छोटी बहन की मौत हो गई। वह और उसका भाई कम उम्र में ही अनाथ हो गए। इस बात की प्रबल संभावना है कि यदि दोषी विकास उम्रकैद की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आता है, तो वह मृतक भाई के बच्चों की हत्या सहित इसी तरह के अपराध फिर से कर सकता है। अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि मृतक कुणाल सिंह के बेटे दोषी के डर से पहले ही अपना गांव और घर छोड़ चुके हैं। दीपावली की रात रची गई थी खौफनाक साजिश दरअसल, साल 2019 में दीपावली की रात 27 अक्टूबर को विकास कुमार साजिश के तहत अपने सगे भाई के घर में घुसा। उस समय पूरा परिवार त्योहार मना रहा था। आरोप है कि संपत्ति हड़पने की नीयत से उसने अपने भाई कुणाल, भाभी कंचन और भतीजी सोनम पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। न्यायालय ने माना कि उसने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी जीवित नहीं बचे और तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। वह अपने भाई के बेटे की भी हत्या करना चाहता था, जिससे संपत्ति पर अकेले अधिकार जमा सके। घटना के बाद मृतक के बेटे को गांव छोड़ना पड़ा। पहले भी कर चुका है पारिवारिक हत्याएं न्यायालय ने अपने आदेश में आरोपी के आपराधिक इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया है। 2012 में विकास ने अपने चाचा अरुण कुमार सिंह की हत्या की थी, जिसमें उसे धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया और वह आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। इसके बाद 2017 में अपनी चाची मणि देवी की हत्या के मामले में भी वह आरोपी है, जिसका ट्रायल बेगूसराय की अदालत में चल रहा है। न्यायालय ने कहा कि आरोपी का एक स्पष्ट पैटर्न है, वह जमीन और संपत्ति के लालच में परिवार के सदस्यों की हत्या करता है और यह सुनिश्चित करता है कि कोई उत्तराधिकारी नहीं बचे। इससे उसके मनोवैज्ञानिक रुझान और अपराध की गंभीरता स्पष्ट होती है। कोर्ट की टिप्पणी- न सुधार की संभावना, न पछतावा फैसले में न्यायालय ने कहा है कि आरोपी को पहले आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी थी। लेकिन उसने दोबारा जघन्य अपराध किया। इससे स्पष्ट है कि सुधारात्मक सिद्धांत उस पर प्रभावी नहीं हुआ।आरोपी को अपने कृत्य पर न तो पछतावा है और न ही कानून का भय है। इस दोषी को अपनी हत्याओं के कृत्य पर कोई पछतावा या ग्लानि नहीं है। पूरे वंश को खत्म करने की सोच ही दोषी के मनोवैज्ञानिक झुकाव को दर्शाती है। यहां तक कि यह दोषी अपने सगे भाई के बेटे की भी हत्या करना चाहता था। जिससे वह अपने मृतक भाई की संपत्ति को स्वयं के फायदे के लिए हड़प सके। इस तरह के अपराध समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों और मामले की सभी परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद न्यायालय ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए विकास कुमार को फांसी की सजा सुनाई। आदेश में कहा गया है कि दोषी को तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। हालांकि, जब तक हाईकोर्ट से मंजूरी नहीं मिलती, तब तक फांसी की सजा पर अमल नहीं होगा। पीड़ित बच्चों को मिलेगा मुआवजा न्यायालय ने यह भी माना कि इस हत्याकांड के कारण सूचक शिवम कुमार और उसके भाई सत्यम कुमार ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया है। पीड़ित मुआवजा योजना के तहत निर्धारित उचित मुआवजा देकर, उन्हें पर्याप्त रूप से क्षतिपूर्ति करना राज्य की जिम्मेदारी है। राज्य की जिम्मेदारी तय करते हुए न्यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA) बेगूसराय को निर्देश दिया है कि पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत दोनों भाइयों को उचित मुआवजा दिया जाए। “मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में आता है। अपराध की प्रकृति, क्रूरता और आरोपी के आपराधिक इतिहास को देखते हुए मृत्युदंड ही सही दंड है। मामला दुर्लभतम मामलों में से एक है, ऐसे में मैं दोषी विकास कुमार को मौत की सजा देता हूं। दोषी विकास कुमार को तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए। ये प्रॉपर्टी के लिए पूरे वंश को खत्म करना चाहता था।” ये बातें एडीजे-3 ब्रजेश कुमार सिंह ने अपने आदेश में कहा है। बेगूसराय के चर्चित ट्रिपल मर्डर केस में कोर्ट ने दोषी विकास कुमार को मौत (फांसी) की सजा सुनाई है। सुरक्षा कारणों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हुई पेशी कोर्ट ने लगातार सुनवाई के बाद 6 फरवरी 2026 को विकास कुमार को भारतीय दंड संहिता की धारा- 302 के तहत दोषी ठहराया था। 11 फरवरी को सजा के बिंदु पर सुनवाई निर्धारित की थी। आरोपी को बेउर जेल पटना से पेश करने का आदेश दिया गया था। लेकिन 11 फरवरी को जेल प्रशासन ने अदालत को जानकारी दी कि पटना सिविल कोर्ट परिसर में फर्जी बम कॉल की सूचना के बाद सुरक्षा कारणों से पुलिस बल की तैनाती की गई थी। बेऊर जेल से हुई आरोपी की पेशी विकास को बेगूसराय लाने के लिए पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध नहीं था। सड़क मार्ग से लाना भी असुरक्षित माना गया। इसके बाद जेल प्रशासन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेशी की अनुमति मांगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को कानूनन शारीरिक उपस्थिति के बराबर दर्जा प्राप्त है और हाईकोर्ट के संशोधित नियम भी इसकी अनुमति देते हैं। इसके बाद बेउर जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोषी को प्रस्तुत किया गया और पूरी कार्यवाही हुई। अभियोजन ने कहा- आदतन हत्यारा समाज के लिए खतरा अपर लोक अभियोजक राम प्रकाश यादव ने न्यायालय के सामने दलील दी कि विकास कुमार एक आदतन हत्यारा है। अब तक वह चार हत्याओं में दोषी पाया जा चुका है, जिनमें इस मामले की तीन हत्याएं शामिल हैं। इसके अलावा चाची की हत्या का मामला बेगूसराय के एडीजे-4 की अदालत में विचाराधीन है। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी समाज के लिए गंभीर खतरा है। वह पहले भी हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट चुका है। लेकिन जेल से बाहर आने के बाद उसने दोबारा जघन्य अपराध किया। ऐसे में सुधार की संभावना नहीं दिखती और अधिकतम दंड ही न्यायसंगत है। बचाव पक्ष ने कहा- हजूर परिवार है, चार बेटियां भी है दोषी विकास के वकील ने न्यायालय से नरमी बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि विकास कुमार विवाहित है और उसकी एक युवा पत्नी और चार छोटी बेटियां हैं, जिनका भरण-पोषण उसी पर निर्भर है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि मृत्युदंड के बदले आजीवन कारावास पर्याप्त सजा हो सकती है। जिससे उसके परिवार का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो। लेकिन साक्ष्य के कारण उनकी दलील काम नहीं आई। नहीं हजूर जेल से निकलने पर फिर हत्या करेगा भतीजे शिवम के वकील एसआई रहमान ने तर्क दिया कि एक ही परिवार के तीन व्यक्तियों की हत्या की। शिवम के माता-पिता और छोटी बहन की मौत हो गई। वह और उसका भाई कम उम्र में ही अनाथ हो गए। इस बात की प्रबल संभावना है कि यदि दोषी विकास उम्रकैद की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आता है, तो वह मृतक भाई के बच्चों की हत्या सहित इसी तरह के अपराध फिर से कर सकता है। अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि मृतक कुणाल सिंह के बेटे दोषी के डर से पहले ही अपना गांव और घर छोड़ चुके हैं। दीपावली की रात रची गई थी खौफनाक साजिश दरअसल, साल 2019 में दीपावली की रात 27 अक्टूबर को विकास कुमार साजिश के तहत अपने सगे भाई के घर में घुसा। उस समय पूरा परिवार त्योहार मना रहा था। आरोप है कि संपत्ति हड़पने की नीयत से उसने अपने भाई कुणाल, भाभी कंचन और भतीजी सोनम पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। न्यायालय ने माना कि उसने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी जीवित नहीं बचे और तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। वह अपने भाई के बेटे की भी हत्या करना चाहता था, जिससे संपत्ति पर अकेले अधिकार जमा सके। घटना के बाद मृतक के बेटे को गांव छोड़ना पड़ा। पहले भी कर चुका है पारिवारिक हत्याएं न्यायालय ने अपने आदेश में आरोपी के आपराधिक इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया है। 2012 में विकास ने अपने चाचा अरुण कुमार सिंह की हत्या की थी, जिसमें उसे धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया और वह आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। इसके बाद 2017 में अपनी चाची मणि देवी की हत्या के मामले में भी वह आरोपी है, जिसका ट्रायल बेगूसराय की अदालत में चल रहा है। न्यायालय ने कहा कि आरोपी का एक स्पष्ट पैटर्न है, वह जमीन और संपत्ति के लालच में परिवार के सदस्यों की हत्या करता है और यह सुनिश्चित करता है कि कोई उत्तराधिकारी नहीं बचे। इससे उसके मनोवैज्ञानिक रुझान और अपराध की गंभीरता स्पष्ट होती है। कोर्ट की टिप्पणी- न सुधार की संभावना, न पछतावा फैसले में न्यायालय ने कहा है कि आरोपी को पहले आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी थी। लेकिन उसने दोबारा जघन्य अपराध किया। इससे स्पष्ट है कि सुधारात्मक सिद्धांत उस पर प्रभावी नहीं हुआ।आरोपी को अपने कृत्य पर न तो पछतावा है और न ही कानून का भय है। इस दोषी को अपनी हत्याओं के कृत्य पर कोई पछतावा या ग्लानि नहीं है। पूरे वंश को खत्म करने की सोच ही दोषी के मनोवैज्ञानिक झुकाव को दर्शाती है। यहां तक कि यह दोषी अपने सगे भाई के बेटे की भी हत्या करना चाहता था। जिससे वह अपने मृतक भाई की संपत्ति को स्वयं के फायदे के लिए हड़प सके। इस तरह के अपराध समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों और मामले की सभी परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद न्यायालय ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए विकास कुमार को फांसी की सजा सुनाई। आदेश में कहा गया है कि दोषी को तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। हालांकि, जब तक हाईकोर्ट से मंजूरी नहीं मिलती, तब तक फांसी की सजा पर अमल नहीं होगा। पीड़ित बच्चों को मिलेगा मुआवजा न्यायालय ने यह भी माना कि इस हत्याकांड के कारण सूचक शिवम कुमार और उसके भाई सत्यम कुमार ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया है। पीड़ित मुआवजा योजना के तहत निर्धारित उचित मुआवजा देकर, उन्हें पर्याप्त रूप से क्षतिपूर्ति करना राज्य की जिम्मेदारी है। राज्य की जिम्मेदारी तय करते हुए न्यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA) बेगूसराय को निर्देश दिया है कि पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत दोनों भाइयों को उचित मुआवजा दिया जाए।  

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