गोमती नगर स्थित संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में शनिवार शाम ऐतिहासिक नाटक ‘विजय-पर्व’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से संस्था ‘विजय बेला एक कदम खुशियों की ओर, लखनऊ’ ने इस प्रस्तुति का आयोजन किया। साहित्यकार डॉ. रामकुमार वर्मा की रचना और चंद्रभाष सिंह के निर्देशन ने नाटक को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। नाटक के प्रथम अंक में मौर्यकाल की राजनीतिक हलचलें जीवंत हो उठीं। अमात्य-मंडल द्वारा अशोक को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद उनके भाइयों सुसीम और सुगाम की महत्वाकांक्षा षड्यंत्र में बदल जाती है। सोन नदी के तट पर रची गई योजना और अशोक का धैर्यपूर्ण आत्मविश्वास यह दर्शाता है कि उनकी जीत केवल शौर्य की नहीं, बल्कि संयम और दृढ़ता की भी थी। अशोक की क्षमाशीलता को दिखाया गया द्वितीय अंक में उज्जयिनी और पश्चिम-चक्र की राजनीति के माध्यम से सुगाम की महत्वाकांक्षा को दर्शाया गया। कलिंग नरेश के साथ उसकी गुप्त संधि ने कहानी को नया मोड़ दिया। गुप्तचर विभाग की सतर्कता और अशोक की क्षमाशीलता ने उनके उदात्त चरित्र को मंचन में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। तलवार की विजय पर आत्मबोध की विजय भारी पड़ती नाटक का सबसे प्रभावशाली दृश्य 261 ईसा पूर्व के कलिंग युद्ध का रहा। प्रकाश और ध्वनि के सशक्त संयोजन के बीच युद्ध की भयावहता, घायल सैनिकों की कराह और एक शोकाकुल मां की वेदना ने सभागार को स्तब्ध कर दिया। यही वह क्षण था जब अशोक के भीतर करुणा का जन्म हुआ, और तलवार की विजय पर आत्मबोध की विजय भारी पड़ती दिखाई दी। निर्देशक ने इस ऐतिहासिक मोड़ को बेहद संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया। कलाकारों ने निभाए सशक्त किरदार जूही कुमारी, मुस्कान सोनी, नीलम मसीह, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, नरेंद्र पाठक, प्रणव श्रीवास्तव, मुकुल कुमार, गिरिराज किशोर शर्मा, मृत्युंजय प्रकाश, मो. आवेश, आयुष प्रजापति, कृष्ण कुमार पाण्डेय, उज्ज्वल सिंह और प्रेम कुमार सहित अन्य कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से पात्रों को सजीव कर दिया।


