आधुनिक विज्ञान को चुनौती देगा वेद:BHU में नासा सहित 6 देशों के विद्वान पहुंचे,बोले-ग्रंथों में न्यायाधीशों के गुणों का विस्तृत वर्णन

आधुनिक विज्ञान को चुनौती देगा वेद:BHU में नासा सहित 6 देशों के विद्वान पहुंचे,बोले-ग्रंथों में न्यायाधीशों के गुणों का विस्तृत वर्णन

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केंद्र में देश-विदेश के विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक विज्ञान और प्राचीन न्याय व्यवस्था पर शोध पत्र प्रस्तुत किया। इस आयोजन में छह देशों से लगभग 200 मूर्धन्य विद्वान, विज्ञानी, शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं विषय-विशेषज्ञ इनमें नासा के विज्ञानी भी शामिल हैं। प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने कहा – “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता बताई। उन्होंने ग्रामीण समाज में विद्यमान ज्योतिषीय ज्ञान को संरक्षित करने की बात कही। प्रो. सन्निधान सुदर्शन शर्मा ने कहा – प्राण और मानव शरीर की संरचना पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि हृदय से 101 नाड़ियाँ निकलती हैं, जिनकी अनेक उपनाड़ियाँ होती हैं। प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था पर विशेष चर्चा कार्यक्रम में भारतीय न्याय परंपरा पर भी विस्तार से विचार रखा गया। वक्ताओं ने बताया कि भारत में न्याय और निष्पक्षता की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। जहाँ पाश्चात्य विधि में प्राकृतिक न्याय को “जस नैचुरेल” से जोड़ा जाता है, वहीं भारतीय ग्रंथों में यह सिद्धांत पहले से विकसित रूप में मौजूद थे। बृहस्पति स्मृति और शुक्र नीति जैसे ग्रंथों में न्यायाधीशों के गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। न्यायाधीशों के लिए सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, धैर्य और समदृष्टि अनिवार्य मानी गई है। न्याय में पक्षपात के पाँच कारण—राग, लोभ, भय, द्वेष और निजी संपर्क—बताए गए हैं, जिनसे बचना आवश्यक है। तीन दिनों में होंगे 9 सत्र विनय पाण्डेय ने कहा – तीन दिनों के आयोजन में कुछ नौ सत्र होंगे, जिनमें वेदों में निहित विज्ञान के प्रमुख छह स्वरूपों यज्ञ विज्ञान, आयुर्विज्ञान, शब्दतत्त्व विज्ञान, गणित एवं भुवनकोश विज्ञान, पर्यावरण एवं जीवनदर्शन विज्ञान तथा विधि एवं प्रबंध विज्ञान विषयों पर चर्चा होगी। पहले के न्याय में स्पीडी ट्रायल होता था वक्ताओं ने यह भी बताया कि न्यायिक प्रक्रिया में त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल), निष्पक्ष अवसर और स्वतंत्र सलाहकार प्रणाली को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। यदि राजा अन्यायपूर्ण निर्णय लेने का प्रयास करता, तो सलाहकारों का कर्तव्य था कि वे उसका विरोध करें।

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