Unique Holi Bikaner: होलाष्टक के दौरान हर गली-नुक्कड़ पर चंग की धमाल, रम्मतों का मंचन और डोलची का वार बीकानेर की होली की पहचान है। इन्हीं रंगों के बीच धुलंडी के दिन निकलने वाली विष्णुरूपी दूल्हे की बारात बीकानेर शहर की एक अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा है, जो रियासतकाल से चली आ रही है।
मांगलिक गीतों के बीच दूल्हे की यह बारात निकाली जाती है, जिसमें युवक के परिवारजन, जाति और समाज के लोग बाराती बनकर शामिल होते हैं। इस वर्ष यह अनूठी बारात 3 मार्च को निकलेगी।
आपसी प्रेम और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक
पुष्करणा समाज की हर्ष जाति के वरिष्ठ नागरिक एडवोकेट हीरालाल हर्ष के अनुसार, धुलंडी के दिन हर्ष जाति के कुंवारे युवक की निकाली जाने वाली यह बारात विभिन्न जातियों के बीच आपसी प्रेम, घनिष्ठ संबंध और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। शहरवासी इस परंपरा का पूरे वर्ष इंतजार करते हैं।
तीन शताब्दियों से निभाई जा रही परंपरा
वरिष्ठ नागरिक राधाकिशन हर्ष बताते हैं कि यह परंपरा तीन शताब्दियों से भी अधिक पुरानी है। विष्णुरूपी दूल्हा निर्धारित आठ मकानों तक पहुंचता है। प्रत्येक मकान के आगे महिलाएं पोखने की रस्म निभाती हैं और विवाह गीत गाती हैं। बारातियों की मनुहार की जाती है तथा नारियल और नकद राशि भेंट की जाती है।
‘तू मत डरपे हो लाडला’ से गूंजता है माहौल
हर्ष समाज के गिरिराज हर्ष के अनुसार, जब पूरा शहर गुलाल और रंगों में सराबोर रहता है, तब कुछ मोहल्लों में विवाह का माहौल सजीव हो उठता है। सिर पर खिड़किया पाग, ललाट पर चंदन-कुमकुम अक्षत तिलक, गुलाबी बनियान, गले में पुष्पहार और पीतांबर धारण किए विष्णुरूपी दूल्हे की बारात जब निकलती है, तो ‘तू मत डरपे हो लाडला’ और ‘केसरियो लाडो’ जैसे विवाह गीतों से वातावरण उल्लासित हो उठता है।
बिना दुल्हन लौट आता है दूल्हा
धुलंडी के दिन दूल्हा कई मकानों के आगे पहुंचता है, लेकिन किसी भी मकान के भीतर प्रवेश नहीं करता। रस्में पूरी होने के बाद वह बिना फेरे, बिना विवाह और बिना दुल्हन लिए पुनः मोहता चौक लौट आता है। यही इस परंपरा की सबसे अनोखी विशेषता है एक ऐसी बारात, जो विवाह की पूरी रस्मों के माहौल के बीच निकलती है, लेकिन दूल्हा बिना दुल्हन लौट आता है।


