भागलपुर शहर के ऐतिहासिक तिलकामांझी चौक पर आदिवासी समाज की ओर से कार्यक्रम हुआ। महान स्वतंत्रता सेनानी शहीद तिलकामांझी की 276वीं जयंती श्रद्धा, सम्मान और गरिमा के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग उपस्थित रहे। सभी ने शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया। समारोह में भागलपुर नगर निगम के उपमहापौर सलाउद्दीन हसन, सामाजिक कार्यकर्ता कमल जायसवाल, ईशान सिन्हा सहित कई गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने अतिथियों का पारंपरिक रूप से स्वागत करते हुए उन्हें पुष्पगुच्छ भेंट किया। पूरे चौक को झंडे, बैनर और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान से सजाया गया था, जिससे कार्यक्रम का वातावरण उत्साहपूर्ण बना रहा। पारंपरिक संथाली नृत्य प्रस्तुत किया आदिवासी कलाकारों की ओर से पारंपरिक संथाली नृत्य प्रस्तुत किया गया। ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों की धुन पर कलाकारों ने मनमोहक प्रस्तुति दी, जिससे उपस्थित लोग भावविभोर हो उठे। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि शहीद तिलकामांझी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित कर स्वतंत्रता की पहली लौ प्रज्वलित की थी। उनका जीवन संघर्ष, साहस और बलिदान की अनुपम मिसाल है। उन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। वक्ताओं ने युवाओं से आह्वान किया कि वे शहीद तिलकामांझी के आदर्शों को आत्मसात करें और समाज और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। भागलपुर शहर के ऐतिहासिक तिलकामांझी चौक पर आदिवासी समाज की ओर से कार्यक्रम हुआ। महान स्वतंत्रता सेनानी शहीद तिलकामांझी की 276वीं जयंती श्रद्धा, सम्मान और गरिमा के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग उपस्थित रहे। सभी ने शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया। समारोह में भागलपुर नगर निगम के उपमहापौर सलाउद्दीन हसन, सामाजिक कार्यकर्ता कमल जायसवाल, ईशान सिन्हा सहित कई गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने अतिथियों का पारंपरिक रूप से स्वागत करते हुए उन्हें पुष्पगुच्छ भेंट किया। पूरे चौक को झंडे, बैनर और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान से सजाया गया था, जिससे कार्यक्रम का वातावरण उत्साहपूर्ण बना रहा। पारंपरिक संथाली नृत्य प्रस्तुत किया आदिवासी कलाकारों की ओर से पारंपरिक संथाली नृत्य प्रस्तुत किया गया। ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों की धुन पर कलाकारों ने मनमोहक प्रस्तुति दी, जिससे उपस्थित लोग भावविभोर हो उठे। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि शहीद तिलकामांझी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित कर स्वतंत्रता की पहली लौ प्रज्वलित की थी। उनका जीवन संघर्ष, साहस और बलिदान की अनुपम मिसाल है। उन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। वक्ताओं ने युवाओं से आह्वान किया कि वे शहीद तिलकामांझी के आदर्शों को आत्मसात करें और समाज और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


