झालावाड़ के भवानीमंडी स्थित पचपहाड़ के महात्मा गांधी राजकीय स्कूल में पर्यावरण शिक्षा को रोचक बनाने के लिए एक नई पहल की गई है। “हर पेड़ कुछ कहता है” नामक इस अभिनव परियोजना के तहत, स्कूल परिसर में लगे लगभग 500 पेड़-पौधों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं। इन कोड्स को मोबाइल से स्कैन करने पर अब पौधे अपनी विशेषताओं, उपयोग और पर्यावरणीय महत्व के बारे में ऑडियो संदेश के माध्यम से जानकारी दे रहे हैं। पहले यह जानकारी केवल पीडीएफ के रूप में उपलब्ध थी। दो साल पहले शुरू की पहल स्कूल के प्रिंसिपल कृष्ण गोपाल वर्मा ने बताया कि इस परियोजना की पहल लगभग दो साल पहले हुई। तब क्यूआर कोड स्कैन करने पर पौधों की जानकारी पीडीएफ प्रारूप में खुलती थी। अब इस परियोजना को अपडेट कर ऑडियो आधारित बना दिया गया है, जिससे जानकारी सुनना और समझना आसान हो गया है। परियोजना के संयोजक और राज्य स्तरीय पुरस्कृत जीव विज्ञान व्याख्याता डॉ. दिव्येंदु सेन ने बताया कि अब क्यूआर कोड स्कैन करते ही संबंधित पौधे के बारे में ऑडियो संदेश सुनाई देता है। इस पहल की खास बात यह है कि इन ऑडियो संदेशों में छात्रों, विद्यालय स्टाफ और जिला अधिकारियों जैसे जिला कलेक्टर, उपखंड अधिकारी, मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, एबीईओ, डीईओ और स्कूल प्रिंसिपल ने अपनी आवाज दी है। कलेक्टर ने भी पेड़ को दी अपनी आवाज
डॉ. सेन ने बताया कि अनुरोध पर झालावाड़ कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ से भी कुपोषण से लड़ने में सहायक मोरिंगा (सहजन) के पेड़ को अपनी आवाज दी है। जिसे हमने “कलेक्टर ट्री” नाम दिया है।इस पेड़ पर लगाए गए QR कोड को स्कैन करने पर कलेक्टर की आवाज़ में पेड़ का संदेश सुनाई देता है, जो स्टूडेंट्स और आगंतुकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। स्टूडेंट्स जुटाते हैं पौधों की जानकारी
डॉ. सेन ने बताया कि यह पहल तकनीक और शैक्षिक मनोविज्ञान के मिलन पर आधारित है। इस परियोजना में स्टूडेंट्स की सक्रिय भागीदारी निर्धारित की गई है। स्टूडेंट्स ने स्वयं पौधों की जानकारी एकत्र की, स्क्रिप्ट तैयार की और ऑडियो रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया में भाग लिया। इससे स्टूडेंट्स की जिज्ञासा, स्मरण शक्ति और प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है।
स्थानीय भाषा में भी रिकॉर्डिंग
डॉ. सेन ने बताया कि इस पहल में कुछ पौधों के ऑडियो संदेश स्थानीय मालवी भाषा में भी रिकॉर्ड किए हैं, ताकि स्थानीय समुदाय भी पौधों के महत्व को समझ सके और इस पहल से जुड़ सके। पलाश और देशी बबूल जैसे पौधे स्थानीय भाषा में स्वयं अपनी कहानी सुनाते हैं, इससे यह परियोजना केवल स्कूल तक सीमित न रहकर समाज से भी जुड़ रही है। स्कूल परिसर में पीपल, बरगद, नीम, खेजड़ी, सागवान, अर्जुन, महुआ, जामुन, आम, अमरूद, पारिजात, पलाश, कचनार, बबूल, काजूरिना, यूकेलिप्टस, मोरिंगा सहित अनेक पौधों को इस परियोजना में शामिल किया गया है। कुछ पौधे अपनी विशेषताओं के साथ-साथ अपनी सीमाओं के बारे में भी बताते हैं, इससे स्टूडेंट्स को सही पौधा सही स्थान पर लगाने की जानकारी भी मिलती है। जिला शिक्षा अधिकारी सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण शिक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने वाला अभिनव प्रयास बताया।


