चित्रकूट में सामने आए कोषागार घोटाले की परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। जांच में सामने आया है कि विभागीय कर्मचारियों ने पेंशनरों के वास्तविक बैंक खातों के स्थान पर फर्जी अथवा अन्य व्यक्तियों के खाता नंबर सिस्टम में दर्ज कर दिए। इसके चलते पेंशनरों के नाम से जारी एरियर और अन्य भुगतान की राशि सीधे गलत खातों में पहुंच गई, जिसे बाद में निकालकर हड़प लिया गया। सूत्रों के मुताबिक, कोषागार में तैनात कुछ कर्मचारियों ने मृतक पेंशनरों के रिकॉर्ड में हेरफेर किया। वास्तविक खातों की जगह बिचौलियों या अपने करीबी लोगों के खातों का विवरण अपडेट कर दिया गया। इसके बाद एरियर सहित अन्य देय धनराशि इन्हीं खातों में ट्रांसफर होती रही और रकम आते ही निकाल ली गई। अनियमितता कई वर्षों से चल रही बताया जा रहा है कि यह अनियमितता एक-दो दिन नहीं, बल्कि कई वर्षों से चल रही थी। इतने लंबे समय तक घोटाले का सामने न आना विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, कोषागार कर्मचारियों और बाहरी बिचौलियों की भूमिका स्पष्ट होती जा रही है। कुछ कर्मचारियों पर सीधे तौर पर मिलीभगत के आरोप भी सामने आए हैं। मामले के उजागर होने के बाद कोषागार कार्यालय में गहमागहमी का माहौल है। पूछताछ के दौरान कई कर्मचारी टिप्पणी करने से बचते नजर आए। वहीं, अब बैंकों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं कि बिना समुचित सत्यापन के इतनी बड़ी धनराशि आखिर कैसे खातों में भेजी गई और निकाली भी गई। आईएफएससी कोड के आधार पर ही लेनदेन लीड बैंक मैनेजर (एलडीएम) अनुराग शर्मा ने बताया कि सामान्य प्रक्रिया के तहत किसी भी खाते में भुगतान से पहले आईएफएससी कोड, खाता नंबर और खाताधारक के नाम का मिलान किया जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ बैंकों में केवल नाम और आईएफएससी कोड के आधार पर ही लेनदेन हो जाता है, जो जोखिमपूर्ण है। एलडीएम ने कहा कि विभाग से भुगतान भेजने के लिए पहले से ही कमांड निर्धारित रहती है, ऐसे में बिना पूर्ण जांच-पड़ताल के इतनी बड़ी रकम का ट्रांसफर और निकासी होना गंभीर जांच का विषय है। फिलहाल मामले की विस्तृत जांच जारी है और आगे और खुलासों की संभावना जताई जा रही है।


