बनारस के पत्थरों में बसती परंपरा, बाणगंगा मेले में आज भी रास आ रहे सिलवट्टे

बनारस के पत्थरों में बसती परंपरा, बाणगंगा मेले में आज भी रास आ रहे सिलवट्टे

सतना के आदिवासी परिवार 15-16 वर्षों से संभाले हुए हैं पत्थर तराशने की विरासत
100 रुपए का पत्थर, दो घंटे की मेहनत और 300-400 रुपए की कमाई

शहडोल। आधुनिक मशीनों और मिक्सर-ग्राइंडर के इस दौर में भी पत्थर से बने सिलवट्टों की मांग कम नहीं हुई है। नगर के ऐतिहासिक बाणगंगा मेले में बनारस के गहुंआ पत्थर से तैयार किए गए सिलवट्टे आज भी खास तौर पर ग्रामीण अंचल से आने वाले लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। मेले के मुय मार्ग के किनारे सजी सिलबट्टों की दुकानें दूर से ही लोगों का ध्यान खींच लेती हैं। मेला घूमने आए लोग चाहे खरीदारी करें या नहीं, लेकिन इन दुकानों पर रुककर सिलवट्टों को निहारना, छूकर देखना और दाम पूछना लगभग हर कोई जरूरी समझता है। कई लोगों के लिए तो यहीं से मेले की खरीदारी की शुरुआत भी हो जाती है।

पूरा परिवार बहाता है पसीना :

उतैली (सतना) के रहने वाले आदिवासी परिवार पिछले 15-16 वर्षों से बाणगंगा मेले में सिलवट्टे की दुकान लगा रहे हैं। यह काम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा परिवार मिलकर करता है। मेला शुरू होने से दो दिन पहले ही ये लोग पत्थर लेकर शहडोल पहुंच जाते हैं। वर्षों से मेले में दुकान लगाने के कारण इनका बाणगंगा मेले से एक खास रिश्ता बन गया है। मकर संक्रांति से पहले ही परिवार तैयारी में जुट जाता है।

बनारस से ट्रक में आता है पत्थर :

कारीगरों के अनुसार, सिलवट्टे के लिए इस्तेमाल होने वाला पत्थर बनारस से खरीदा जाता है। एक पत्थर की कीमत लगभग 100 रुपए होती है। सभी कारीगर मिलकर ट्रक भर पत्थर खरीदते हैं। भाड़ा जोडऩे के बाद शहडोल पहुंचते-पहुंचते एक पत्थर की लागत करीब 200 रुपए पड़ती है। इसके बाद छेनी और हथौड़ी से लगभग दो घंटे की मेहनत के बाद एक सिलवट्टा तैयार होता है। इसे 300 से 400 रुपए में बेचा जाता है। यानी दो घंटे की मेहनत के बाद मुनाफा महज 100-150 रुपए ही रह जाता है।

इनका कहना है

बनारस से पत्थर लाते हैं। एक पत्थर 100 रुपए में पड़ता है। सब लोग मिलकर ट्रक खरीदते हैं। यहां आकर सिलवट्टा और दूसरी सामग्री बनाकर बेचते हैं।
चंदन गोंड़, उतैली (सतना)

काफी वर्षों से बाणगंगा मेले में दुकान लगा रहे हैं। इस बार 14 से ज्यादा दुकानें लगी हैं। ग्रामीण इलाकों से आए लोग ज्यादा पूछताछ करते हैं, लेकिन इस साल बिक्री कुछ कम रही।
— राजा आदिवासी, उतैली (सतना)

15-16 वर्षों से बाणगंगा मेले में दुकान लगा रहे हैं। एक पत्थर को तराशने में कम से कम दो घंटे लगते हैं। सुबह से देर शाम तक पूरा परिवार इसी काम में जुटा रहता है।”
— सुनीता गोंड़, उतैली (सतना)

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