बसंत पंचमी का पर्व देश भर में विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के रूप में मनाया जाता है, लेकिन देवघर के विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर में बसंत पंचमी का दिन बाबा बैद्यनाथ के तिलकोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। इसी को लेकर शुक्रवार को आस्था का हुजूम देखने को मिल रहा है। तिलक की इस रस्म को अदा करने के लिए बाबा के ससुराल यानी मिथिलांचल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग तरह का कांवर लेकर बाबा धाम पहुंचे हैं। वो दो दिनों पहले ही देवघर आ चुके हैं। बाबा को तिलक चढ़ाने के साथ ही इनकी होली की शुरुआत हो जाती है। अबीर-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई दी मिथिलांचल के लोगों ने बसंत पंचमी को बाबा का तिलकोत्सव कर अबीर-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई दी और शिवरात्रि के अवसर पर शिव विवाह में शामिल होने का संकल्प लेकर वापस लौटे। प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन मिथिलांचल के निवासी बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने भक्त देवघर आते हैं। विशेष प्रकार के कांवर, वेशभूषा और भाषा से अलग पहचान रखने वाले ये मिथिलावासी खुद को बाबा का संबंधी मानते हैं। तिलकोत्सव मनाने की परंपरा काफी पहले से चली आ रही इसी नाते बसंत पंचमी के दिन बाबा के तिलकोत्सव में शामिल होने देवघर आते हैं। इन्हें तिलकहरु कहते हैं। तिलकोत्सव मनाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। मिथलावासियों का मानना है कि माता पार्वती, सती, एवं माता सीता हिमालय पर्वत की सीमा की थीं और मिथिला हिमालय की सीमा में है। इसलिए माता पार्वती मिथिला की बेटी है। इसलिए मिथिलावासी लड़की पक्ष की तरफ से आते हुए तिलकोत्सव मनाते हैं। कई टोलियों में आए ये मिथिलावासी शहर के कई जगहों पर खुले आसमान में स्कूलों मैदाने में इकठ्ठा होते हैं। मिथिलावासी बड़ी श्रद्धा से पूजा-पाठ, पारंपरिक भजन-कीर्तन कर बसंत पंचमी के दिन बाबा का तिलकोत्सव मनाते हैं। जिला प्रशासन ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की इसी खुशी में आपस में अबीर-गुलाल खेल कर खुशियां बांटते हैं और एक दूसरे को बधाइयां देते हैं। इधर, जिला प्रशासन ने सुगमता के साथ लोगों को जलाभिषेक करने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की है। बैरिकेडिंग लगाई गई है। लोग कतारबद्ध होकर बाबा बैद्यनाथ की जल अर्पण कर रहे हैं


