सोनीपत में प्राकृतिक खेती पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण शुरू:55 किसान शामिल; बिचौलियों से बचकर सीधी बिक्री पर जोर

सोनीपत में प्राकृतिक खेती पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण शुरू:55 किसान शामिल; बिचौलियों से बचकर सीधी बिक्री पर जोर

सोनीपत जिले के जैनपुर गांव में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 55 किसान भाग लेकर टिकाऊ और कम लागत वाली खेती की आधुनिक तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के उपकुलपति डॉ. बी.आर. कम्बोज के संरक्षण तथा विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. रमेश कुमार के निर्देशन में यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन कृषि विज्ञान केंद्र, सोनीपत और हरियाणा कृषि प्रबंधन एवं विस्तार प्रशिक्षण केंद्र, जींद के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। संयोजक डॉ. परमिंदर सिंह ने बताया कि जो किसान जींद या कुरुक्षेत्र में प्रशिक्षण नहीं ले सके, वे अब सोनीपत में इसका लाभ उठा सकते हैं। अनुदान के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य
प्रशिक्षण के दौरान स्पष्ट किया गया कि प्राकृतिक खेती के अंतर्गत मिलने वाले सरकारी अनुदान का लाभ लेने के लिए इस प्रशिक्षण में भाग लेना अनिवार्य है। किसानों को प्राकृतिक फसलों की सीधी बिक्री के विभिन्न मॉडल समझाए गए, ताकि वे बिचौलियों से बचकर सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी उपज पहुंचा सकें और अधिक लाभ अर्जित कर सकें।
मृदा स्वास्थ्य और केंचुआ खाद पर जोर
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से आए विशेषज्ञ डॉ. जयराम चौधरी ने मृदा स्वास्थ्य में सूक्ष्म जीवों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) बनाने की विधि विस्तार से समझाते हुए बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।
कीट एवं रोग प्रबंधन की जानकारी
डॉ. राकेश कुमार ने प्राकृतिक खेती में धान, गेहूं और सब्जियों में लगने वाले कीट एवं रोगों के प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी। विशेष रूप से सब्जियों में फल मक्खी की रोकथाम के लिए फेरोमोन ट्रैप के उपयोग पर जोर देते हुए इसे कम लागत और प्रभावी उपाय बताया गया।
किसानों की सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने विशेषज्ञों से सवाल पूछे और अपने अनुभव साझा किए। आगामी सत्रों में प्राकृतिक खेती की उन्नत तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, ताकि किसान आत्मनिर्भर बनकर टिकाऊ कृषि प्रणाली अपनाएं और अपनी आय में वृद्धि कर सकें।

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