मंडला। चौगान की मढ़िया में नवरात्रि के दौरान बोए गए जवारों का शनिवार को विधि-विधान से विसर्जन किया गया। हजारों की संख्या में श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण कर जवारों को सिर पर रखकर लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर नर्मदा तट रामनगर पहुंचे। यहां पूजा-अर्चना के बाद जवारों को नर्मदा नदी में विसर्जित किया गया। चौगान की मढ़िया, जिला मुख्यालय मंडला से लगभग 30 किलोमीटर दूर, गौड़ राजाओं की ऐतिहासिक नगरी रामनगर के समीप स्थित है। यह जनजातीय समाज का एक प्रमुख आस्था केंद्र है। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जवारे बोते हैं और नौ दिनों तक स्थानीय पंडा-पुजारियों के मार्गदर्शन में विधिवत पूजन करते हैं। नवरीत्रि के दूसरे दिन बोए जाते हैं जवारे इस स्थल की एक विशेष परंपरा है कि जहां सामान्यतः नवरात्रि के प्रथम दिन जवारे बोए जाते हैं, वहीं चौगान की मढ़िया में दूसरे दिन जवारों की बोआई की जाती है। इनका विसर्जन दशमी के दिन होता है। नौ दिनों तक श्रद्धालु सफेद वस्त्र पहनकर ही पूजा में शामिल होते हैं, जो इस परंपरा की खास पहचान है। ये है मान्यता मान्यता है कि यहां मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। इसी विश्वास के साथ वर्ष भर दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचकर मन्नतें मांगते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर वे जवारे बोते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। यहां के पंडा-पुजारियों के अनुसार, इस वर्ष कुल 3720 जवारे बोए गए थे। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे गुरुओं के निर्देश पर सहेज कर रखा गया है। शनिवार को आयोजित विसर्जन कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही, जिससे पूरा नर्मदा तट भक्ति और आस्था के रंग में सराबोर नजर आया। तस्वीरें देखिए…


