नक्सल कमांडर का फरमान- ‘सरकार के लिए काम करती है ये औरत। इस जुर्म की सजा मौत है। मार डालो।’ इतना सुनते ही 4-5 जवान आगे बढ़े, महिला तो तब तक लात मारा, जब तक सांसें न थम गईं। फिर AK-47 से भून दिया। नक्सली का फरमान- ‘तुमने अपनी बेटी के प्रेमी की हत्या पत्थर से सिर कुचलकर की। अब वही पत्थर उठाओ और अपनी बेटी को मार डालो।’ पिता ने ऐसा करने से मना किया तो नक्सली ने कहा, इसे खत्म कर दो। फिर चंद जवान आगे बढ़े, पत्थर से मारकर हत्या के आरोपी की जान ले ली। ये सिर्फ दो घटनाएं नहीं। उन हजारों दर्दनाक वारदातों की बानगी हैं, जो बताती हैं कि नक्सली अपने असर वाले इलाके में लोगों पर किस कदर जुल्म ढाते थे। नक्सली आम लोगों पर किस तरह जुल्म ढाते थे? कैसे जन अदालत लगाकर लाचार लोगों को मनमानी सजा देते थे? जानने के लिए संडे बिग स्टोरी में पढ़ें बिहार में नक्सल मुक्त हुए जमुई जिले के चोरमारा गांव से रिपोर्ट। पहले जानिए चोरमारा गांव का लोकेशन, जहां चलता था नक्सलियों का राज गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि, 31 मार्च 2026 तक बिहार नक्सल मुक्त होगा। पुलिस के अनुसार अभी राज्य का कोई जिला नक्सल प्रभावित नहीं है। जमुई सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से एक रहा है। अभी भी जिले के कुछ हिस्सों से नक्सली गतिविधियों की रिपोर्टें आती हैं। नक्सली किस तरह अपने असर वाले इलाके में लोगों पर अत्याचार करते थे? यह जानने के लिए हम जमुई के बरहट थाना क्षेत्र के चोरमारा गांव पहुंचे। यह गांव जिला मुख्यालय से 65 km और थाना से 20 km दूर है। चोरमारा आदिवासियों का गांव है। चारों तरफ से पहाड़ और घने जंगल से घिरा है। गांव में 10 टोला हैं, जो 200-400 मीटर की दूरी पर बसे हैं। इसके आसपास के करीब एक दर्जन गांव भी नक्सल प्रभावित थे। चोरमारा गांव के 3 कुख्यात नक्सली थे सुरेंद्र कोड़ा, अर्जुन कोड़ा और बालेश्वर कोड़ा। तीनों सरेंडर कर चुके हैं। 2 फरवरी 2022 को यहां CRPF कैंप बना। इसके बाद से गांव में नक्सली घटना घट गई। इससे पहले यहां नक्सलियों का राज चलता था। चोरमारा पहुंचकर हमने यहां के लोगों से बात की। आगे पढ़ें गांव के लोगों की जुबानी… पूरे गांव के सामने शारदा को पीट-पीटकर मार डाला हमने ग्रामीण नागेश्वर कोड़ा से बात की। उन्होंने गांव की शारदा देवी की कहानी बताई, जिसे नक्सलियों ने जन अदालत लगाकर मार डाला था। कहा… गांव का कोई आदमी सरकारी योजना का लाभ लेता या सरकारी नौकरी की बात करता तो नक्सली कहते कि यह मुखबिरी कर रहा है। हमारी जानकारी पुलिस को दे रहा है। शारदा देवी आशा कार्यकर्ता थीं। नक्सली कहने लगे कि वह पुलिस से मिली हुई है। हमारी जानकारी दे रही है। इसलिए उसको पूरे गांव के बीच मारा। मारने में शारदा देवी के पति का बड़ा भाई सुरेंद्र भी शामिल था। नक्सलियों ने शारदा से पहले कहा था कि सरकार के लिए काम नहीं करो। शारदा ने समझाया कि बिना हॉस्पिटल के घर पर बच्चे को जन्म देने में काफी खतरा है। महिलाओं की मौत इलाज के अभाव में हो जाती है। हॉस्पिटल जाएंगे तो बच्चा और उसकी मां की जान खतरे में नहीं पड़ेगी। वह घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करती थी। नक्सलियों को यह रास नहीं आया। समझाने पर भी शारदा ने बात नहीं मानी तो एक दिन जन अदालत लगवाई। जन अदालत के दिन शाम को गांव में घूम-घूमकर ऐलान किया गया कि 7 बजे सभी को जन अदालत में आना है। नक्सली गांव के सभी लोगों को बुलाते। कोई नहीं जाता तो उसे घर से निकालकर पीटते थे। शाम के 7 बजे गांव के लोग इकट्ठा हुए। जो लोग नहीं आए उन्हें घर से खींचकर लाया गया। इसके बाद शारदा देवी और उनके पति मदन कोड़ा को बुलाया गया। 50 से अधिक नक्सली आए थे। कमांडर एक चबूतरे पर बैठ गया। उसके बगल में हथियार लिए नक्सली बैठे। कमांडर ने फैसला सुनाया कि शारदा देवी ने बहुत बड़ा अपराध किया है। मना करने के बाद भी सरकार का काम करती है। सरकार से पैसा लेती है। इसे पीट-पीट कर मार डाला जाए। इसके बाद एक नक्सली आगे बढ़ा। उसने बाल पकड़े और शारदा को जमीन पर पटक दिया। शारदा जोर से चीखी। इसके बाद दूसरे नक्सली उसके नजदीक आए। उसे जूते से मारने लगे। पेट और सिर पर लात मारे। शारदा दर्द से चिल्ला रही थी। उनके पति सभी के सामने हाथ जोड़कर माफी मांग रहे थे। कह रहे थे कि छोड़ दीजिए, लेकिन कोई उनकी गुहार सुनने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपने बड़े भाई सुरेंद्र के सामने हाथ जोड़कर पत्नी की जान की भीख मांगी, लेकिन उसने भी लात मारना शुरू कर दिया। सीएम नीतीश के कार्यक्रम में गया तो नक्सलियों ने पीटा नागेश्वर कोड़ा ने अपनी कहानी बतायी। कहा, मैं राजमिस्त्री हूं। नक्सलियों के डर से 2017 में महाराष्ट्र चला गया था। 2023 में वापस आया हूं। इस गांव में नक्सलियों का कानून चलता था। उनकी जन अदालत लगती थी। वे जो फैसला सुनाते, उसे गांव वालों को मानना पड़ता था। इनकार करने पर सरेआम गोली मार दी जाती थी। कहते थे कि किसी सरकारी योजना का फायदा लिया तो गोली मार देंगे। गांव के स्कूल को बम से उड़ा दिया था। इलाके के नक्सली आसपास के जंगलों में रहते थे। गांव में आकर खाना खाते थे। अचानक शाम को गांव में घुसते और किसी के घर वाले को बुलाकर कहते थे कि आज हम सभी तुम्हारे घर खाना खाएंगे। हर किसी की हालत एक साथ 80-100 लोगों को खिलाने लायक नहीं होती थी। खिलाने से इनकार करने पर पिटाई करते थे। एक बार सीएम नीतीश कुमार भीम बांध आए थे। गांव के 5 लोग उनके कार्यक्रम में गए। मैं भी गया था। वन विभाग के अधिकारियों ने हमें बुलाया था। खेती-बाड़ी के बारे में बताया गया। मैं जैसे ही घर लौटा, नक्सली आ गए। मुझे पकड़ लिया। कहने लगे कि सरकारी नौकरी के लिए गया था। मैंने कहा कि पढ़ा लिखा नहीं हूं। कोई काम करने नहीं आता। नौकरी कैसे करूंगा। वे लोग मेरी बात सुनने को तैयार नहीं थे। एक ही रट लगाए थे कि नौकरी के लिए गया था। नक्सली सरकारी नौकरी के सख्त खिलाफ थे। कहते थे कि सरकार की तरफ नहीं जाओ, न उनकी बातें सुनो। सिर्फ हमारी बात सुनो। हमारा कहना मानो। नक्सलियों ने मुझे पीटा। मुझे भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। मैं इतना परेशान हुआ कि गांव छोड़कर चला गया। बेटी के प्रेमी की हत्या की, अब खुद अपनी संतान को मार डालो फुलेना नाम की महिला ने हमें गांव के पुना कोड़ा और धर्मेंद्र कोड़ा की हत्या की कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, धर्मेंद्र कोड़ा पुना कोड़ा की बेटी से प्यार करता था। इस बात से नाराज पुना कोड़ा ने पत्थर से कुचलकर धर्मेंद्र कोड़ा की हत्या कर दी। नक्सलियों ने जन अदालत लगाया। पुना कोड़ा को फरमान सुनाया गया कि जिस तरह तुमने धर्मेंद्र की हत्या की उसी तरह पत्थर से कुचलकर अपनी बेटी को भी मार डालो। पुना ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद नक्सली कमांडर ने फरमान सुनाया कि पुना की हत्या पत्थर से कुचलकर की जाए। इतना सुनते ही उसके साथ आए नक्सलियों ने पत्थर मारकर पुना की जान ले ली। भतीजे ने बच्चों को पढ़ाया तो पेड़ से बांधकर मारा रघुनाथ कोड़ा ने अपनी कहानी बताई। उन्होंने कहा, नक्सली गांव में किसी को पढ़ने नहीं देते थे। मेरे भतीजे ने गांव से बाहर जाकर पढ़ाई की। लौटकर गांव आया तो यहां के बच्चों को पढ़ाने लगा। नक्सली कहने लगे कि इसने सरकार से पैसे लिए हैं। सरकार के लिए काम कर रहा है। हमारी जानकारी पुलिस को देता है। नक्सल कमांडर का फरमान- ‘सरकार के लिए काम करती है ये औरत। इस जुर्म की सजा मौत है। मार डालो।’ इतना सुनते ही 4-5 जवान आगे बढ़े, महिला तो तब तक लात मारा, जब तक सांसें न थम गईं। फिर AK-47 से भून दिया। नक्सली का फरमान- ‘तुमने अपनी बेटी के प्रेमी की हत्या पत्थर से सिर कुचलकर की। अब वही पत्थर उठाओ और अपनी बेटी को मार डालो।’ पिता ने ऐसा करने से मना किया तो नक्सली ने कहा, इसे खत्म कर दो। फिर चंद जवान आगे बढ़े, पत्थर से मारकर हत्या के आरोपी की जान ले ली। ये सिर्फ दो घटनाएं नहीं। उन हजारों दर्दनाक वारदातों की बानगी हैं, जो बताती हैं कि नक्सली अपने असर वाले इलाके में लोगों पर किस कदर जुल्म ढाते थे। नक्सली आम लोगों पर किस तरह जुल्म ढाते थे? कैसे जन अदालत लगाकर लाचार लोगों को मनमानी सजा देते थे? जानने के लिए संडे बिग स्टोरी में पढ़ें बिहार में नक्सल मुक्त हुए जमुई जिले के चोरमारा गांव से रिपोर्ट। पहले जानिए चोरमारा गांव का लोकेशन, जहां चलता था नक्सलियों का राज गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि, 31 मार्च 2026 तक बिहार नक्सल मुक्त होगा। पुलिस के अनुसार अभी राज्य का कोई जिला नक्सल प्रभावित नहीं है। जमुई सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से एक रहा है। अभी भी जिले के कुछ हिस्सों से नक्सली गतिविधियों की रिपोर्टें आती हैं। नक्सली किस तरह अपने असर वाले इलाके में लोगों पर अत्याचार करते थे? यह जानने के लिए हम जमुई के बरहट थाना क्षेत्र के चोरमारा गांव पहुंचे। यह गांव जिला मुख्यालय से 65 km और थाना से 20 km दूर है। चोरमारा आदिवासियों का गांव है। चारों तरफ से पहाड़ और घने जंगल से घिरा है। गांव में 10 टोला हैं, जो 200-400 मीटर की दूरी पर बसे हैं। इसके आसपास के करीब एक दर्जन गांव भी नक्सल प्रभावित थे। चोरमारा गांव के 3 कुख्यात नक्सली थे सुरेंद्र कोड़ा, अर्जुन कोड़ा और बालेश्वर कोड़ा। तीनों सरेंडर कर चुके हैं। 2 फरवरी 2022 को यहां CRPF कैंप बना। इसके बाद से गांव में नक्सली घटना घट गई। इससे पहले यहां नक्सलियों का राज चलता था। चोरमारा पहुंचकर हमने यहां के लोगों से बात की। आगे पढ़ें गांव के लोगों की जुबानी… पूरे गांव के सामने शारदा को पीट-पीटकर मार डाला हमने ग्रामीण नागेश्वर कोड़ा से बात की। उन्होंने गांव की शारदा देवी की कहानी बताई, जिसे नक्सलियों ने जन अदालत लगाकर मार डाला था। कहा… गांव का कोई आदमी सरकारी योजना का लाभ लेता या सरकारी नौकरी की बात करता तो नक्सली कहते कि यह मुखबिरी कर रहा है। हमारी जानकारी पुलिस को दे रहा है। शारदा देवी आशा कार्यकर्ता थीं। नक्सली कहने लगे कि वह पुलिस से मिली हुई है। हमारी जानकारी दे रही है। इसलिए उसको पूरे गांव के बीच मारा। मारने में शारदा देवी के पति का बड़ा भाई सुरेंद्र भी शामिल था। नक्सलियों ने शारदा से पहले कहा था कि सरकार के लिए काम नहीं करो। शारदा ने समझाया कि बिना हॉस्पिटल के घर पर बच्चे को जन्म देने में काफी खतरा है। महिलाओं की मौत इलाज के अभाव में हो जाती है। हॉस्पिटल जाएंगे तो बच्चा और उसकी मां की जान खतरे में नहीं पड़ेगी। वह घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करती थी। नक्सलियों को यह रास नहीं आया। समझाने पर भी शारदा ने बात नहीं मानी तो एक दिन जन अदालत लगवाई। जन अदालत के दिन शाम को गांव में घूम-घूमकर ऐलान किया गया कि 7 बजे सभी को जन अदालत में आना है। नक्सली गांव के सभी लोगों को बुलाते। कोई नहीं जाता तो उसे घर से निकालकर पीटते थे। शाम के 7 बजे गांव के लोग इकट्ठा हुए। जो लोग नहीं आए उन्हें घर से खींचकर लाया गया। इसके बाद शारदा देवी और उनके पति मदन कोड़ा को बुलाया गया। 50 से अधिक नक्सली आए थे। कमांडर एक चबूतरे पर बैठ गया। उसके बगल में हथियार लिए नक्सली बैठे। कमांडर ने फैसला सुनाया कि शारदा देवी ने बहुत बड़ा अपराध किया है। मना करने के बाद भी सरकार का काम करती है। सरकार से पैसा लेती है। इसे पीट-पीट कर मार डाला जाए। इसके बाद एक नक्सली आगे बढ़ा। उसने बाल पकड़े और शारदा को जमीन पर पटक दिया। शारदा जोर से चीखी। इसके बाद दूसरे नक्सली उसके नजदीक आए। उसे जूते से मारने लगे। पेट और सिर पर लात मारे। शारदा दर्द से चिल्ला रही थी। उनके पति सभी के सामने हाथ जोड़कर माफी मांग रहे थे। कह रहे थे कि छोड़ दीजिए, लेकिन कोई उनकी गुहार सुनने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपने बड़े भाई सुरेंद्र के सामने हाथ जोड़कर पत्नी की जान की भीख मांगी, लेकिन उसने भी लात मारना शुरू कर दिया। सीएम नीतीश के कार्यक्रम में गया तो नक्सलियों ने पीटा नागेश्वर कोड़ा ने अपनी कहानी बतायी। कहा, मैं राजमिस्त्री हूं। नक्सलियों के डर से 2017 में महाराष्ट्र चला गया था। 2023 में वापस आया हूं। इस गांव में नक्सलियों का कानून चलता था। उनकी जन अदालत लगती थी। वे जो फैसला सुनाते, उसे गांव वालों को मानना पड़ता था। इनकार करने पर सरेआम गोली मार दी जाती थी। कहते थे कि किसी सरकारी योजना का फायदा लिया तो गोली मार देंगे। गांव के स्कूल को बम से उड़ा दिया था। इलाके के नक्सली आसपास के जंगलों में रहते थे। गांव में आकर खाना खाते थे। अचानक शाम को गांव में घुसते और किसी के घर वाले को बुलाकर कहते थे कि आज हम सभी तुम्हारे घर खाना खाएंगे। हर किसी की हालत एक साथ 80-100 लोगों को खिलाने लायक नहीं होती थी। खिलाने से इनकार करने पर पिटाई करते थे। एक बार सीएम नीतीश कुमार भीम बांध आए थे। गांव के 5 लोग उनके कार्यक्रम में गए। मैं भी गया था। वन विभाग के अधिकारियों ने हमें बुलाया था। खेती-बाड़ी के बारे में बताया गया। मैं जैसे ही घर लौटा, नक्सली आ गए। मुझे पकड़ लिया। कहने लगे कि सरकारी नौकरी के लिए गया था। मैंने कहा कि पढ़ा लिखा नहीं हूं। कोई काम करने नहीं आता। नौकरी कैसे करूंगा। वे लोग मेरी बात सुनने को तैयार नहीं थे। एक ही रट लगाए थे कि नौकरी के लिए गया था। नक्सली सरकारी नौकरी के सख्त खिलाफ थे। कहते थे कि सरकार की तरफ नहीं जाओ, न उनकी बातें सुनो। सिर्फ हमारी बात सुनो। हमारा कहना मानो। नक्सलियों ने मुझे पीटा। मुझे भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। मैं इतना परेशान हुआ कि गांव छोड़कर चला गया। बेटी के प्रेमी की हत्या की, अब खुद अपनी संतान को मार डालो फुलेना नाम की महिला ने हमें गांव के पुना कोड़ा और धर्मेंद्र कोड़ा की हत्या की कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, धर्मेंद्र कोड़ा पुना कोड़ा की बेटी से प्यार करता था। इस बात से नाराज पुना कोड़ा ने पत्थर से कुचलकर धर्मेंद्र कोड़ा की हत्या कर दी। नक्सलियों ने जन अदालत लगाया। पुना कोड़ा को फरमान सुनाया गया कि जिस तरह तुमने धर्मेंद्र की हत्या की उसी तरह पत्थर से कुचलकर अपनी बेटी को भी मार डालो। पुना ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद नक्सली कमांडर ने फरमान सुनाया कि पुना की हत्या पत्थर से कुचलकर की जाए। इतना सुनते ही उसके साथ आए नक्सलियों ने पत्थर मारकर पुना की जान ले ली। भतीजे ने बच्चों को पढ़ाया तो पेड़ से बांधकर मारा रघुनाथ कोड़ा ने अपनी कहानी बताई। उन्होंने कहा, नक्सली गांव में किसी को पढ़ने नहीं देते थे। मेरे भतीजे ने गांव से बाहर जाकर पढ़ाई की। लौटकर गांव आया तो यहां के बच्चों को पढ़ाने लगा। नक्सली कहने लगे कि इसने सरकार से पैसे लिए हैं। सरकार के लिए काम कर रहा है। हमारी जानकारी पुलिस को देता है।


