इटावा के चकरनगर ब्लॉक के सहसों, नदा, मिटहटी, गुपियाखार, कंधावली और कोटरा समेत कई गांव आज भी शुद्ध पेयजल के लिए जूझ रहे हैं। गांवों में दर्जनों हैंडपंप लगे होने के बावजूद उनसे खारा पानी निकल रहा है, जिससे ग्रामीणों को पीने का पानी दो से तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांवों या खेतों में लगे हैंडपंपों से लाना पड़ रहा है। गांव की महिलाएं सिर पर बाल्टी और डिब्बे रखकर लंबी दूरी तय करती हैं, जबकि युवक साइकिल और बाइक से पानी ढोने को मजबूर हैं। रोजाना पानी की यह जद्दोजहद ग्रामीणों की जिंदगी को और कठिन बना रही है। 150 से ज्यादा हैंडपंप, लेकिन पानी पीने लायक नहीं ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में लगे करीब 150 से अधिक हैंडपंपों से खारा पानी निकलता है। इस पानी को पीने से पेट दर्द जैसी गंभीर समस्याएं हो जाती हैं। खाना बनाने में भी दिक्कत आती है—दाल और सब्जी घंटों पकाने पर भी नहीं पकतीं, वहीं दूध और चाय फट जाती है। मजबूरी में इस पानी का इस्तेमाल केवल नहाने और कपड़े धोने तक सीमित है। जल जीवन मिशन की उम्मीद भी टूटी ग्रामीणों को जल जीवन मिशन के तहत शुद्ध पेयजल मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अब तक गांवों में पानी की टंकी का निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। लोगों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों को केवल चुनाव के समय ही उनकी समस्याएं याद आती हैं, चुनाव बीतते ही पेयजल संकट को नजरअंदाज कर दिया जाता है। हजारों खर्च कर मंगवाना पड़ता है टैंकर चकरनगर ब्लॉक की ग्राम पंचायत सहसों के गांव सहसों और उसके मजरा नदा की कुल आबादी करीब दो हजार है। सहसों गांव के लोग बिजलीघर जाकर पानी भरते हैं, जबकि नदा के ग्रामीणों को दो किलोमीटर दूर मिटहटी गांव तक पैदल या साइकिल से जाना पड़ता है। शादी-विवाह या अन्य आयोजनों में ग्रामीणों को हजारों रुपये खर्च कर टैंकर से पानी मंगवाना पड़ता है। यही हाल गुपियाखार गांव का भी है। इस मामले में खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) यदुवीर सिंह ने बताया कि गांवों के पानी की जांच कराई जाएगी। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।


