ऐतिहासिक राजगीर की पहचान 22 कुंड और 52 धाराओं पर अस्तित्व का संकट गहरा गया है। आमतौर पर मई-जून की तपती गर्मी में सूखने वाले गंगा-जमुना कुंड की गर्म जलधाराएं इस बार जनवरी की भीषण ठंड में ही सूख गई है। राजगीर के इतिहास में पहली बार हुई इस घटना से पंडा समाज और स्थानीय लोग हैरान हैं। सबसे बड़ी चिंता आगामी 17 मई से शुरू होने वाले विश्व प्रसिद्ध मलमास मेले को लेकर है, जब करोड़ों श्रद्धालु यहां शाही स्नान के लिए पहुंचेंगे। अंधाधुंध बोरिंग बनी मुसीबत राजगीर ब्रह्मकुंड पंडा कमेटी के सचिव विकास उपाध्याय ने बताया कि सौंदर्यीकरण के नाम पर पांडू पोखर क्षेत्र में सात बोरिंग कराई गई है। इसके अलावा वैभारगिरी पर्वत के आसपास व्यावसायिक गतिविधियों के लिए डीप बोरिंग की जा रही है। इसी का नतीजा है कि कुंड का जलस्तर तेजी से नीचे चला गया है। पर्वत के इर्द-गिर्द हो रही बोरिंग पर तत्काल रोक लगाई जाए, ताकि राजगीर की यह प्राकृतिक पहचान बची रहे। मलमास मेले की तैयारियों को झटका आगामी 17 मई से राजगीर में एक माह का मलमास मेला शुरू होने वाला है। मान्यता है कि इस दौरान यहां 33 कोटि देवी-देवता निवास करते हैं। पुजारी राकेश कुमार ने चिंता जताई कि अगर जनवरी में ये हाल है तो मई-जून की गर्मी में स्थिति और भयावह हो सकती है। अगर पानी नहीं रहा, तो श्रद्धालु स्नान और पूजा-पाठ कैसे करेंगे। यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। व्यास कुंड पिछले तीन साल से सूखा है। अब गंगा-जमुना कुंड भी सूख गए हैं। हालांकि ब्रह्मकुंड में सप्त धारा से जल प्रवाह हो रही है। जिससे थोड़ी राहत जरूर है। इंद्र की नाराजगी या मानवीय भूल पुजारी अजित पंडा का मानना है कि तीर्थ क्षेत्र में अनियंत्रित कमर्शियल विकास ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ा है। इंद्र भगवान की नाराजगी (बारिश की कमी) और 1971 में तय किए गए नियमों की अनदेखी इसका मुख्य कारण है। मरकंडे कुंड में भी पानी न के बराबर है। केंद्रीय टीम की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में जानकारों का कहना है कि वर्ष 2010 में एक केंद्रीय टीम ने कुंड के जल स्रोतों का अध्ययन किया था। टीम ने जल स्रोतों की सफाई और संरचनाओं के संरक्षण की अनुशंसा की थी, लेकिन उस पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। उच्चप्रवाही बोरिंग के कारण बरसात का पानी पहाड़ में रुकने के बजाय भू-गर्भ में चला जाता है, जिससे यह संकट पैदा हुआ है। वरीय अधिकारियों को सूचना दी गई है राजगीर एसडीओ सूरज प्रसाद गुप्ता ने बताया कि गर्म जल धाराएं जो सूख चुकी हैं, उसके संदर्भ में वरीय अधिकारियों का मार्गदर्शन मांगा गया है। जल स्रोत के आसपास कही बोरिंग अभी भी क्रियाशील अवस्था में है या नहीं इसकी भी जांच की जा रही है। स्थानीय लोगों से सुझाव प्राप्त कर आगे का कार्य किया जाएगा। ऐतिहासिक राजगीर की पहचान 22 कुंड और 52 धाराओं पर अस्तित्व का संकट गहरा गया है। आमतौर पर मई-जून की तपती गर्मी में सूखने वाले गंगा-जमुना कुंड की गर्म जलधाराएं इस बार जनवरी की भीषण ठंड में ही सूख गई है। राजगीर के इतिहास में पहली बार हुई इस घटना से पंडा समाज और स्थानीय लोग हैरान हैं। सबसे बड़ी चिंता आगामी 17 मई से शुरू होने वाले विश्व प्रसिद्ध मलमास मेले को लेकर है, जब करोड़ों श्रद्धालु यहां शाही स्नान के लिए पहुंचेंगे। अंधाधुंध बोरिंग बनी मुसीबत राजगीर ब्रह्मकुंड पंडा कमेटी के सचिव विकास उपाध्याय ने बताया कि सौंदर्यीकरण के नाम पर पांडू पोखर क्षेत्र में सात बोरिंग कराई गई है। इसके अलावा वैभारगिरी पर्वत के आसपास व्यावसायिक गतिविधियों के लिए डीप बोरिंग की जा रही है। इसी का नतीजा है कि कुंड का जलस्तर तेजी से नीचे चला गया है। पर्वत के इर्द-गिर्द हो रही बोरिंग पर तत्काल रोक लगाई जाए, ताकि राजगीर की यह प्राकृतिक पहचान बची रहे। मलमास मेले की तैयारियों को झटका आगामी 17 मई से राजगीर में एक माह का मलमास मेला शुरू होने वाला है। मान्यता है कि इस दौरान यहां 33 कोटि देवी-देवता निवास करते हैं। पुजारी राकेश कुमार ने चिंता जताई कि अगर जनवरी में ये हाल है तो मई-जून की गर्मी में स्थिति और भयावह हो सकती है। अगर पानी नहीं रहा, तो श्रद्धालु स्नान और पूजा-पाठ कैसे करेंगे। यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। व्यास कुंड पिछले तीन साल से सूखा है। अब गंगा-जमुना कुंड भी सूख गए हैं। हालांकि ब्रह्मकुंड में सप्त धारा से जल प्रवाह हो रही है। जिससे थोड़ी राहत जरूर है। इंद्र की नाराजगी या मानवीय भूल पुजारी अजित पंडा का मानना है कि तीर्थ क्षेत्र में अनियंत्रित कमर्शियल विकास ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ा है। इंद्र भगवान की नाराजगी (बारिश की कमी) और 1971 में तय किए गए नियमों की अनदेखी इसका मुख्य कारण है। मरकंडे कुंड में भी पानी न के बराबर है। केंद्रीय टीम की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में जानकारों का कहना है कि वर्ष 2010 में एक केंद्रीय टीम ने कुंड के जल स्रोतों का अध्ययन किया था। टीम ने जल स्रोतों की सफाई और संरचनाओं के संरक्षण की अनुशंसा की थी, लेकिन उस पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। उच्चप्रवाही बोरिंग के कारण बरसात का पानी पहाड़ में रुकने के बजाय भू-गर्भ में चला जाता है, जिससे यह संकट पैदा हुआ है। वरीय अधिकारियों को सूचना दी गई है राजगीर एसडीओ सूरज प्रसाद गुप्ता ने बताया कि गर्म जल धाराएं जो सूख चुकी हैं, उसके संदर्भ में वरीय अधिकारियों का मार्गदर्शन मांगा गया है। जल स्रोत के आसपास कही बोरिंग अभी भी क्रियाशील अवस्था में है या नहीं इसकी भी जांच की जा रही है। स्थानीय लोगों से सुझाव प्राप्त कर आगे का कार्य किया जाएगा।


