पानी नहीं, प्रशासन की संवेदनशीलता बह रही है

पानी नहीं, प्रशासन की संवेदनशीलता बह रही है

देश भर में जल है तो कल है और हर बूंद कीमती है जैसे नारे गूंजते रहते हैं। सरकारी विज्ञापनों, भाषणों और अभियानों में जल संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन नारों की सच्चाई पर सवाल खड़े करती है। कर्नाटक के हुब्बल्ली शहर स्थित न्यू मेदर ओणी सर्किल इसका ताजा और शर्मनाक उदाहरण है। यहां बीते तीन वर्षों से पेयजल लाइन में लीकेज है। परिणाम यह कि लाखों लीटर शुद्ध पेयजल हर सप्ताह जमीन में समा रहा है। विडंबना यह है कि जिस इलाके में सप्ताह में केवल एक दिन गुरुवार को पानी की आपूर्ति होती है, उसी दिन पानी बर्बादी का रूप ले लेता है। सुबह से लेकर अगले दिन दोपहर तक अंडरग्राउंड दुकानों में पानी भरा रहता है।
इस जल बर्बादी का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक और छोटे व्यापारी उठा रहे हैं। हर सप्ताह वे अपनी दुकानों से पानी निकालने के लिए मोटर लगाते हैं। व्यापार प्रभावित होता है, बिजली खर्च बढ़ता है और हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। बारिश के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की संवेदनशीलता नहीं जागी। समस्या को लेकर संबंधित विभाग, जलापूर्ति की ठेकेदार कंपनी और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से कई बार शिकायत की गई। कहीं खुदाई हुई, कहीं जांच का नाटक हुआ, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकला। आश्वासन दिए गए, फाइलें चलीं और मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश जल संकट की ओर बढ़ रहा है, तब तीन साल तक लाखों लीटर पानी का यूं बहना किसकी जिम्मेदारी है? क्या ठेकेदार जवाबदेह नहीं है? क्या विभागीय लापरवाही पर कोई कार्रवाई होगी? या फिर आमजन की समस्या को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहेगा? यदि यही स्थिति किसी वीआईपी क्षेत्र में होती, तो समाधान में तीन दिन भी नहीं लगते। लेकिन जब पीड़ा आमजन की हो, तो सिस्टम खामोश रहता है। न्यू मेदर ओणी सर्किल की यह स्थिति चेतावनी है। पानी नहीं, प्रशासन की संवेदनशीलता बह रही है।

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