जिले के जीता का बास (घरडाना कलां) गांव में ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को कागजों से निकालकर धरातल पर उतारते हुए एक भव्य ‘शाही बिंदोरी’ निकाली गई। अवसर था महिला अधिकारिता विभाग में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत अल्का पूनियां के विवाह का, जहां दूल्हे की पारंपरिक रस्म को निभाते हुए बेटी ने घोड़ी पर सवार होकर पूरे गांव में घुमाया गया। यह आयोजन महिला अधिकारिता विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की ओर से आयोजित किया गया। डीजे की गूंजती धुन, रंग-बिरंगे परिधानों में थिरकती महिलाएं और ग्रामीणों के चेहरों पर गर्व का भाव इस बात का गवाह था कि समाज बदलाव को स्वीकार कर रहा है। परंपराओं का बदला स्वरूप: जब बेटी बनी ‘नारी शक्ति’ का प्रतीक
आमतौर पर बिंदोरी की रस्म में दूल्हा घोड़ी पर सवार होता है, लेकिन जीता का बास में इस रिवाज को उलट दिया गया। विभाग के इस नवाचार ने ग्रामीणों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अधिकार और सम्मान के मामले में बेटियां किसी भी स्तर पर बेटों से कम नहीं हैं।
अधिकारियों ने थामी कमान, बढ़ाया बेटी का मान
इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनने और विभाग की साथी कर्मचारी का उत्साहवर्धन करने के लिए उपनिदेशक विप्लव न्यौला स्वयं मौजूद रहे। उन्होंने इस पहल को केवल एक रस्म नहीं बल्कि एक सामाजिक क्रांति बताया। उनके साथ राजस्थान शिक्षण संस्थान चिड़ावा की चेयरमैन निकिता थालौर भी मौजूद रही। महिला अधिकारिता विभाग उपनिदेशक विप्लव न्यौला ने बताया कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आज अल्का ने घोड़ी पर सवार होकर यह साबित किया है कि बेटियां सक्षम हैं और हर सम्मान की हकदार हैं। यह नवाचार समाज को संकीर्ण सोच से बाहर निकालने में मदद करेगा।
भावुक पिता और गौरवान्वित बेटी बेटी के इस अनूठे सफर पर पिता रणजीत सिंह ने गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि समय के साथ पुरानी परंपराओं को बदलना जरूरी है। वहीं, सुपरवाइजर अल्का पूनियां ने इस मौके पर कहा, “आज मुझे महसूस हो रहा है कि समाज वाकई बदल रहा है। लड़कियों को बराबरी का दर्जा मिलना अब केवल नारा नहीं, हकीकत बन रहा है।
ये रहे मौजूद
नीतू न्यौला (शिक्षिका), पूजा कुमारी, मोनिका, सरिता, सुनीता, रतना, पूजा सामोता (सुपरवाइजर्स), मनोज स्वामी (सहायक प्रशासनिक अधिकारी), गोविंद सिंह (सहायक लेखाधिकारी) और राहुल जांगिड़ (कनिष्ठ सहायक) उपस्थित रहे।


