विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंजा राजगीर:’बर्ड एवियरी’ में स्कारलेट, एलिगर, ब्लू एंड गोल्ड मकाउ की अठखेलियां; दूसरे राज्यों से भी पहुंच रहे पर्यटक

विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंजा राजगीर:’बर्ड एवियरी’ में स्कारलेट, एलिगर, ब्लू एंड गोल्ड मकाउ की अठखेलियां; दूसरे राज्यों से भी पहुंच रहे पर्यटक

राजगीर जू सफारी पर्यटकों के लिए सिर्फ शेरों और बाघों के रोमांच का केंद्र ही नहीं, बल्कि अब विदेशी पक्षियों के कलरव और उनकी मनमोहक उड़ान का भी एक प्रमुख ठिकाना बन गया है। सफारी के अंदर विकसित की गई ‘बर्ड एवियरी’ (पक्षी शाला) में इन दिनों न केवल देसी-विदेशी पक्षियों की अठखेलियां पर्यटकों को लुभा रही हैं, बल्कि यह जगह अब इन दुर्लभ विदेशी पक्षियों के एक सफल प्रजनन केंद्र के रूप में भी उभर कर सामने आ रही है। प्राकृतिक आवास से मिलते-जुलते माहौल में पक्षी यहां सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अंडे दे रहे हैं, जिससे सफारी प्रबंधन और वन्यजीव प्रेमियों में भारी उत्साह है। विशाल प्राकृतिक वातावरण राजगीर जू सफारी में निर्मित यह एवियरी बिहार की पहली ऐसी संरचना है, जहां विदेशी पक्षियों को पिंजरे में कैद करने के बजाय एक विशाल और प्राकृतिक वातावरण प्रदान किया गया है। यहां पेड़-पौधे, खुला आसमान और जलस्रोत बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे इन पक्षियों को उनके मूल निवास स्थान पर मिलते हैं। इस एवियरी में मुख्य रूप से स्कारलेट मकाउ, एलिगर मकाउ, ब्लू एंड गोल्ड मकाउ, सल्फर-क्रेस्टेड कॉकटू, बुडगेरिगर (बज्जी), कॉकटेल, मलार्ड डक, गोल्डन फिजेंट और सिल्वर फिजेंट जैसी रंग-बिरंगी विदेशी प्रजातियां रखी गई हैं।
एवियरी प्रजनन केंद्र के रूप में भी विकसित जू सफारी के डायरेक्टर राम सुंदर एम. ने बताया कि एवियरी में फिलहाल अलग-अलग प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं। सफारी प्रबंधन के लिए यह बेहद खुशी की बात है कि यह एवियरी अब धीरे-धीरे एक प्रजनन केंद्र के रूप में भी विकसित हो रही है। यहां मौजूद कई पक्षियों ने अंडे देने शुरू कर दिए हैं। प्रबंधन की प्राथमिकता यही रहती है कि पक्षी प्राकृतिक रूप से अपने अंडों को खुद ही सेहें और पालें। हालांकि, सुरक्षा और अंडों को खराब होने से बचाने के लिए तकनीकी इंतजाम भी किए गए हैं। मलार्ड डक (बत्तख) की संख्या में प्राकृतिक रूप से अच्छी-खासी वृद्धि हुई है और उनके अंडों से कई बच्चे (डकलिंग) भी सफलतापूर्वक निकले हैं। सुबह और शाम परोसा जाता है अलग-अलग प्रकार का भोजन इसके अलावा, कॉकटू और कॉकटेल जैसी प्रजातियों ने भी अंडे देना शुरू कर दिया है। इन अंडों को सुरक्षित रखने और सफल हैचिंग (अंडों से बच्चे निकलना) सुनिश्चित करने के लिए सफारी प्रबंधन ने ‘इनक्यूबेटर’ (अंडों को सेहने वाली कृत्रिम मशीन) की विशेष व्यवस्था की है। नवजात और छोटे पक्षियों को उचित तापमान प्रदान करने के लिए ‘हीटर यूनिट’ भी लगाए गए हैं। पक्षियों के भोजन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें सुबह और शाम अलग-अलग प्रकार का भोजन परोसा जाता है, जिसमें उनकी प्रजाति के अनुसार ताजे फल, सब्जियां, और विशेष प्रकार के बीज शामिल होते हैं। यह डाइट मौसम के अनुसार बदलती रहती है, ताकि पक्षियों को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें। एवियरी के किनारों पर लगी है खास प्रकार के पौधे एवियरी का आकर्षण सिर्फ विदेशी पक्षियों तक ही सीमित नहीं है। डायरेक्टर राम सुंदर एम. ने बताया कि एवियरी के चारों ओर और उसके किनारों पर जानबूझकर ऐसे पौधे और फूल लगाए गए हैं, जो तितलियों (बटरफ्लाई) को आकर्षित करते हैं। इसका परिणाम यह है कि यहां भारी संख्या में रंग-बिरंगी तितलियां आती हैं। इन तितलियों को देखने के लिए न केवल पर्यटक उत्साहित होते हैं, बल्कि इन तितलियों को खाने की तलाश में आसपास के जंगलों से कई देशी प्रजातियों के पक्षी भी यहां खींचे चले आते हैं। मोर और रोलर बर्ड जैसे देशी पक्षी अक्सर एवियरी के आसपास मंडराते देखे जा सकते हैं। प्रबंधन की यह सोच बेहद सफल रही है कि पर्यटक जब यहां आएं, तो वे सिर्फ जाली के अंदर के विदेशी पक्षियों को ही न देखें, बल्कि उन्हें बाहर के प्राकृतिक और देशी पक्षियों का भी दीदार हो सके। रोजाना पहुंच रहे 2 हजार पर्यटक सफारी में आने वाले पर्यटकों, विशेषकर स्कूली बच्चों के बीच यह बर्ड एवियरी सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है। जू सफारी में प्रतिदिन अधिकतम 2000 पर्यटकों के प्रवेश की अनुमति है। इनमें से लगभग हर पर्यटक एवियरी का दौरा जरूर करता है। बच्चे यहां घंटों बैठकर पक्षियों की रंग-बिरंगी दुनिया को निहारते हैं। इसके अलावा, बर्ड वॉचिंग (पक्षियों को देखने का शौक रखने वाले) और वन्यजीव फोटोग्राफी का शौक रखने वाले लोग भी अब नियमित रूप से राजगीर सफारी का रुख कर रहे हैं। आठ प्रकार के पक्षी हैं मौजूद वन रक्षी राज कुमार मंडल ने बताया कि यहां कुल आठ प्रकार के पक्षी हैं। यह पूरी तरह से एक ‘एक्जॉटिक एरिया’ है। यहां मकाउ की तीन प्रजातियां (स्कार्लेट, इलिगर, ब्लू एंड गोल्ड) मौजूद हैं। इसके अलावा, कॉकटू, कॉकटेल और फिजेंट (गोल्डन-सिल्वर) की प्रजातियां भी पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। एवियरी के अंदर का पूरा परिदृश्य (हैबिटेट) इन पक्षियों की प्राकृतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है। अंदर फलदार पेड़ लगाए गए हैं। ऐसे पौधे भी हैं जिनकी मदद से पक्षी प्राकृतिक रूप से अपनी चोंच (बीक) को ट्रिम (घिसकर नुकीला बनाना) कर सकते हैं। राज कुमार मंडल ने आगे कहा कि कॉकटू और सिल्वर फिजेंट ने अंडे दिए हैं। मलार्ड डक के बच्चे (डकलिंग) तो एवियरी के जलस्रोतों में तैरते हुए आम तौर पर देखे जा सकते हैं। जलस्रोतों की स्वच्छता बनाए रखने के लिए लगातार ‘वाटर साइक्लिंग’ (पानी का चक्रण) किया जाता है, जिससे बत्तखों को हमेशा साफ और ताजा पानी मिलता है। पक्षियों के स्वास्थ्य और उनके प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए उन्हें उनकी पसंद का भोजन, जैसे ताजी मछलियां और मौसमी फल दिए जाते हैं। पर्यटकों को भाह रहा एवियरी राजगीर जू सफारी का यह अनुभव पर्यटकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। पटना से आए पर्यटक रोहित कुमार ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह जगह प्रकृति के बेहद करीब महसूस होती है। यहां की व्यवस्था और मेंटेनेंस शानदार है। एवियरी के अंदर मकाउ और बत्तखों को देखना, और बाहर मोर को स्वतंत्र रूप से घूमते देखना एक अद्भुत अनुभव था। वहीं, राजस्थान के भरतपुर (जो स्वयं अपने प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य के लिए जाना जाता है) से राजगीर घूमने आए एक पर्यटक ने भी इस सफारी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि हम भरतपुर से आए हैं और यहां की व्यवस्था देखकर बहुत अच्छा लगा। यहां का टूरिस्ट स्पॉट, स्टाफ का व्यवहार और पक्षियों के लिए किया गया इंतजाम, सब कुछ बेहतरीन है। सफारी का अनुभव शानदार रहा। राजगीर सफारी के विदेशी मेहमानों की रोचक दुनिया राजगीर जू सफारी की एवियरी में मौजूद इन विदेशी पक्षियों की अपनी अलग और बेहद दिलचस्प खूबियां हैं, जो इन्हें प्रकृति का अद्भुत अजूबा बनाती हैं। अमेरिका के सदाबहार जंगलों में पाए जाने वाले स्कार्लेट मकाउ को दुनिया के सबसे बड़े तोतों में गिना जाता है। इनका शरीर 33 इंच तक लंबा हो सकता है, जिसमें इनकी लंबी पूंछ का हिस्सा शरीर की कुल लंबाई का लगभग एक तिहाई से आधा होता है। चमकदार लाल पंखों और नीले-पीले छटा वाले इन पक्षियों का औसत वजन एक किलोग्राम तक होता है। ये पक्षी इतनी गहरी और तेज आवाज निकालते हैं कि इन्हें काफी दूर तक आसानी से सुना जा सकता है। वहीं, मध्य और पूर्वी दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले इलिगर मकाउ को ‘मिनी-मकाउ’ भी कहा जाता है, जिनकी लंबाई 40 से 50 सेंटीमीटर के बीच होती है। इनका नामकरण जर्मन पक्षी विज्ञानी जोहान कार्ल विल्हेम इलिगर के सम्मान में किया गया है। इलिगर मकाउ को ‘संकटग्रस्त प्रजाति’ (Near Threatened) की श्रेणी में रखा गया है। इनके हरे पंख, नारंगी-लाल माथा और नीले रंग का मुकुट इनकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। ‘बर्ड एवियरी’ पहुंच रहे पर्यटक पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के समशीतोष्ण वर्षावनों के मूल निवासी ग्रेटर सल्फर-क्रेस्टेड कॉकटू अपनी लंबी पीली कलगी (क्रेस्ट) के कारण पर्यटकों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचते हैं। लगभग 50 सेंटीमीटर लंबे और सफेद शरीर वाले इन पक्षियों में नर और मादा बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं। केवल मादा की आंखों की पुतलियों का रंग गहरा भूरा-लाल होता है, जबकि नर की आंखें सिर्फ भूरी होती हैं। इनकी चोंच नीचे की ओर मुड़ी होती है, जो अक्सर इनके पंखों को संवारने के लिए निकलने वाले सफेद पाउडर के कारण भूरी दिखाई पड़ती है। ऑस्ट्रेलिया के ही मूल निवासी कॉकटेल और बुडगेरिगर (बज्जी) भी आकार में छोटे होने के बावजूद अपनी चहचहाहट से एवियरी को गुंजायमान रखते हैं। कॉकटेल लगभग 32 सेंटीमीटर के होते हैं, जिनके पीले चेहरे और नारंगी गाल बेहद आकर्षक लगते हैं। दूसरी ओर, बुडगेरिगर महज 18 से 20 सेंटीमीटर लंबे छोटे तोते होते हैं, जो सफेद और पीले रंग की मूल श्रृंखलाओं (नीला, ग्रे, हरा) में पाए जाते हैं। जलस्रोतों की शोभा बढ़ाने वाली मलार्ड डक (बत्तख) दुनिया भर में पाई जाने वाली एक अत्यंत अनुकूलनीय प्रजाति है। नर मलार्ड का सिर गहरे हरे रंग का होता है, जबकि मादा मुख्य रूप से चित्तीदार भूरे रंग की होती है। दोनों के पास एक सफेद बॉर्डर वाला नीला पंख होता है, जिसे ‘स्पेकुलम’ कहा जाता है, और यह तब सबसे ज्यादा नजर आता है जब बत्तख उड़ान भरती है। कुल मिलाकर, राजगीर जू सफारी की यह ‘बर्ड एवियरी’ न केवल बिहार के पर्यटन के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रही है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और दुर्लभ विदेशी पक्षियों के सफल प्रजनन के क्षेत्र में भी यह एक नई और सकारात्मक कहानी लिख रही है। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है। राजगीर जू सफारी पर्यटकों के लिए सिर्फ शेरों और बाघों के रोमांच का केंद्र ही नहीं, बल्कि अब विदेशी पक्षियों के कलरव और उनकी मनमोहक उड़ान का भी एक प्रमुख ठिकाना बन गया है। सफारी के अंदर विकसित की गई ‘बर्ड एवियरी’ (पक्षी शाला) में इन दिनों न केवल देसी-विदेशी पक्षियों की अठखेलियां पर्यटकों को लुभा रही हैं, बल्कि यह जगह अब इन दुर्लभ विदेशी पक्षियों के एक सफल प्रजनन केंद्र के रूप में भी उभर कर सामने आ रही है। प्राकृतिक आवास से मिलते-जुलते माहौल में पक्षी यहां सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अंडे दे रहे हैं, जिससे सफारी प्रबंधन और वन्यजीव प्रेमियों में भारी उत्साह है। विशाल प्राकृतिक वातावरण राजगीर जू सफारी में निर्मित यह एवियरी बिहार की पहली ऐसी संरचना है, जहां विदेशी पक्षियों को पिंजरे में कैद करने के बजाय एक विशाल और प्राकृतिक वातावरण प्रदान किया गया है। यहां पेड़-पौधे, खुला आसमान और जलस्रोत बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे इन पक्षियों को उनके मूल निवास स्थान पर मिलते हैं। इस एवियरी में मुख्य रूप से स्कारलेट मकाउ, एलिगर मकाउ, ब्लू एंड गोल्ड मकाउ, सल्फर-क्रेस्टेड कॉकटू, बुडगेरिगर (बज्जी), कॉकटेल, मलार्ड डक, गोल्डन फिजेंट और सिल्वर फिजेंट जैसी रंग-बिरंगी विदेशी प्रजातियां रखी गई हैं।
एवियरी प्रजनन केंद्र के रूप में भी विकसित जू सफारी के डायरेक्टर राम सुंदर एम. ने बताया कि एवियरी में फिलहाल अलग-अलग प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं। सफारी प्रबंधन के लिए यह बेहद खुशी की बात है कि यह एवियरी अब धीरे-धीरे एक प्रजनन केंद्र के रूप में भी विकसित हो रही है। यहां मौजूद कई पक्षियों ने अंडे देने शुरू कर दिए हैं। प्रबंधन की प्राथमिकता यही रहती है कि पक्षी प्राकृतिक रूप से अपने अंडों को खुद ही सेहें और पालें। हालांकि, सुरक्षा और अंडों को खराब होने से बचाने के लिए तकनीकी इंतजाम भी किए गए हैं। मलार्ड डक (बत्तख) की संख्या में प्राकृतिक रूप से अच्छी-खासी वृद्धि हुई है और उनके अंडों से कई बच्चे (डकलिंग) भी सफलतापूर्वक निकले हैं। सुबह और शाम परोसा जाता है अलग-अलग प्रकार का भोजन इसके अलावा, कॉकटू और कॉकटेल जैसी प्रजातियों ने भी अंडे देना शुरू कर दिया है। इन अंडों को सुरक्षित रखने और सफल हैचिंग (अंडों से बच्चे निकलना) सुनिश्चित करने के लिए सफारी प्रबंधन ने ‘इनक्यूबेटर’ (अंडों को सेहने वाली कृत्रिम मशीन) की विशेष व्यवस्था की है। नवजात और छोटे पक्षियों को उचित तापमान प्रदान करने के लिए ‘हीटर यूनिट’ भी लगाए गए हैं। पक्षियों के भोजन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें सुबह और शाम अलग-अलग प्रकार का भोजन परोसा जाता है, जिसमें उनकी प्रजाति के अनुसार ताजे फल, सब्जियां, और विशेष प्रकार के बीज शामिल होते हैं। यह डाइट मौसम के अनुसार बदलती रहती है, ताकि पक्षियों को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें। एवियरी के किनारों पर लगी है खास प्रकार के पौधे एवियरी का आकर्षण सिर्फ विदेशी पक्षियों तक ही सीमित नहीं है। डायरेक्टर राम सुंदर एम. ने बताया कि एवियरी के चारों ओर और उसके किनारों पर जानबूझकर ऐसे पौधे और फूल लगाए गए हैं, जो तितलियों (बटरफ्लाई) को आकर्षित करते हैं। इसका परिणाम यह है कि यहां भारी संख्या में रंग-बिरंगी तितलियां आती हैं। इन तितलियों को देखने के लिए न केवल पर्यटक उत्साहित होते हैं, बल्कि इन तितलियों को खाने की तलाश में आसपास के जंगलों से कई देशी प्रजातियों के पक्षी भी यहां खींचे चले आते हैं। मोर और रोलर बर्ड जैसे देशी पक्षी अक्सर एवियरी के आसपास मंडराते देखे जा सकते हैं। प्रबंधन की यह सोच बेहद सफल रही है कि पर्यटक जब यहां आएं, तो वे सिर्फ जाली के अंदर के विदेशी पक्षियों को ही न देखें, बल्कि उन्हें बाहर के प्राकृतिक और देशी पक्षियों का भी दीदार हो सके। रोजाना पहुंच रहे 2 हजार पर्यटक सफारी में आने वाले पर्यटकों, विशेषकर स्कूली बच्चों के बीच यह बर्ड एवियरी सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है। जू सफारी में प्रतिदिन अधिकतम 2000 पर्यटकों के प्रवेश की अनुमति है। इनमें से लगभग हर पर्यटक एवियरी का दौरा जरूर करता है। बच्चे यहां घंटों बैठकर पक्षियों की रंग-बिरंगी दुनिया को निहारते हैं। इसके अलावा, बर्ड वॉचिंग (पक्षियों को देखने का शौक रखने वाले) और वन्यजीव फोटोग्राफी का शौक रखने वाले लोग भी अब नियमित रूप से राजगीर सफारी का रुख कर रहे हैं। आठ प्रकार के पक्षी हैं मौजूद वन रक्षी राज कुमार मंडल ने बताया कि यहां कुल आठ प्रकार के पक्षी हैं। यह पूरी तरह से एक ‘एक्जॉटिक एरिया’ है। यहां मकाउ की तीन प्रजातियां (स्कार्लेट, इलिगर, ब्लू एंड गोल्ड) मौजूद हैं। इसके अलावा, कॉकटू, कॉकटेल और फिजेंट (गोल्डन-सिल्वर) की प्रजातियां भी पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। एवियरी के अंदर का पूरा परिदृश्य (हैबिटेट) इन पक्षियों की प्राकृतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है। अंदर फलदार पेड़ लगाए गए हैं। ऐसे पौधे भी हैं जिनकी मदद से पक्षी प्राकृतिक रूप से अपनी चोंच (बीक) को ट्रिम (घिसकर नुकीला बनाना) कर सकते हैं। राज कुमार मंडल ने आगे कहा कि कॉकटू और सिल्वर फिजेंट ने अंडे दिए हैं। मलार्ड डक के बच्चे (डकलिंग) तो एवियरी के जलस्रोतों में तैरते हुए आम तौर पर देखे जा सकते हैं। जलस्रोतों की स्वच्छता बनाए रखने के लिए लगातार ‘वाटर साइक्लिंग’ (पानी का चक्रण) किया जाता है, जिससे बत्तखों को हमेशा साफ और ताजा पानी मिलता है। पक्षियों के स्वास्थ्य और उनके प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए उन्हें उनकी पसंद का भोजन, जैसे ताजी मछलियां और मौसमी फल दिए जाते हैं। पर्यटकों को भाह रहा एवियरी राजगीर जू सफारी का यह अनुभव पर्यटकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। पटना से आए पर्यटक रोहित कुमार ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह जगह प्रकृति के बेहद करीब महसूस होती है। यहां की व्यवस्था और मेंटेनेंस शानदार है। एवियरी के अंदर मकाउ और बत्तखों को देखना, और बाहर मोर को स्वतंत्र रूप से घूमते देखना एक अद्भुत अनुभव था। वहीं, राजस्थान के भरतपुर (जो स्वयं अपने प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य के लिए जाना जाता है) से राजगीर घूमने आए एक पर्यटक ने भी इस सफारी की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि हम भरतपुर से आए हैं और यहां की व्यवस्था देखकर बहुत अच्छा लगा। यहां का टूरिस्ट स्पॉट, स्टाफ का व्यवहार और पक्षियों के लिए किया गया इंतजाम, सब कुछ बेहतरीन है। सफारी का अनुभव शानदार रहा। राजगीर सफारी के विदेशी मेहमानों की रोचक दुनिया राजगीर जू सफारी की एवियरी में मौजूद इन विदेशी पक्षियों की अपनी अलग और बेहद दिलचस्प खूबियां हैं, जो इन्हें प्रकृति का अद्भुत अजूबा बनाती हैं। अमेरिका के सदाबहार जंगलों में पाए जाने वाले स्कार्लेट मकाउ को दुनिया के सबसे बड़े तोतों में गिना जाता है। इनका शरीर 33 इंच तक लंबा हो सकता है, जिसमें इनकी लंबी पूंछ का हिस्सा शरीर की कुल लंबाई का लगभग एक तिहाई से आधा होता है। चमकदार लाल पंखों और नीले-पीले छटा वाले इन पक्षियों का औसत वजन एक किलोग्राम तक होता है। ये पक्षी इतनी गहरी और तेज आवाज निकालते हैं कि इन्हें काफी दूर तक आसानी से सुना जा सकता है। वहीं, मध्य और पूर्वी दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले इलिगर मकाउ को ‘मिनी-मकाउ’ भी कहा जाता है, जिनकी लंबाई 40 से 50 सेंटीमीटर के बीच होती है। इनका नामकरण जर्मन पक्षी विज्ञानी जोहान कार्ल विल्हेम इलिगर के सम्मान में किया गया है। इलिगर मकाउ को ‘संकटग्रस्त प्रजाति’ (Near Threatened) की श्रेणी में रखा गया है। इनके हरे पंख, नारंगी-लाल माथा और नीले रंग का मुकुट इनकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। ‘बर्ड एवियरी’ पहुंच रहे पर्यटक पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के समशीतोष्ण वर्षावनों के मूल निवासी ग्रेटर सल्फर-क्रेस्टेड कॉकटू अपनी लंबी पीली कलगी (क्रेस्ट) के कारण पर्यटकों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचते हैं। लगभग 50 सेंटीमीटर लंबे और सफेद शरीर वाले इन पक्षियों में नर और मादा बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं। केवल मादा की आंखों की पुतलियों का रंग गहरा भूरा-लाल होता है, जबकि नर की आंखें सिर्फ भूरी होती हैं। इनकी चोंच नीचे की ओर मुड़ी होती है, जो अक्सर इनके पंखों को संवारने के लिए निकलने वाले सफेद पाउडर के कारण भूरी दिखाई पड़ती है। ऑस्ट्रेलिया के ही मूल निवासी कॉकटेल और बुडगेरिगर (बज्जी) भी आकार में छोटे होने के बावजूद अपनी चहचहाहट से एवियरी को गुंजायमान रखते हैं। कॉकटेल लगभग 32 सेंटीमीटर के होते हैं, जिनके पीले चेहरे और नारंगी गाल बेहद आकर्षक लगते हैं। दूसरी ओर, बुडगेरिगर महज 18 से 20 सेंटीमीटर लंबे छोटे तोते होते हैं, जो सफेद और पीले रंग की मूल श्रृंखलाओं (नीला, ग्रे, हरा) में पाए जाते हैं। जलस्रोतों की शोभा बढ़ाने वाली मलार्ड डक (बत्तख) दुनिया भर में पाई जाने वाली एक अत्यंत अनुकूलनीय प्रजाति है। नर मलार्ड का सिर गहरे हरे रंग का होता है, जबकि मादा मुख्य रूप से चित्तीदार भूरे रंग की होती है। दोनों के पास एक सफेद बॉर्डर वाला नीला पंख होता है, जिसे ‘स्पेकुलम’ कहा जाता है, और यह तब सबसे ज्यादा नजर आता है जब बत्तख उड़ान भरती है। कुल मिलाकर, राजगीर जू सफारी की यह ‘बर्ड एवियरी’ न केवल बिहार के पर्यटन के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रही है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और दुर्लभ विदेशी पक्षियों के सफल प्रजनन के क्षेत्र में भी यह एक नई और सकारात्मक कहानी लिख रही है। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है।  

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