प्रेमचंद रंगशाला में नेपाल से आई डांस-ड्रामा प्रस्तुति ‘मोक्षदा’ ने पंचकन्याओं की पौराणिक कथा को नए नारी दृष्टिकोण से जीवंत कर दिया। नृत्य और सशक्त अभिनय के माध्यम से अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी की आवाज मंच पर गूंजी। यहां उन्हें देवी नहीं, बल्कि भावनाओं और संघर्षों से भरी मानवीय स्त्रियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से आयोजित भारत रंग महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को नेपाल से आई टीम ने मोक्षदा’ का मंचन किया। नम्रता केसी द्वारा लिखित और निर्देशित इस नाटक में नृत्य और अभिनय के माध्यम से पंचकन्याओं की कथा को नए नजरिए से प्रस्तुत किया गया। नाटक की शुरुआत अहिल्या के मंच पर आगमन से होती है। उनकी शांत लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति से सभागार में सन्नाटा छा जाता है। इसके बाद कुंती का प्रवेश होता है और दर्शकों ने तालियों से स्वागत किया। एक-एक कर तारा, द्रौपदी और मंदोदरी भी मंच पर आती हैं। समाज ने नारी की भावनाओं और संघर्षों को नहीं समझा
कहनी अपनी असली रूप में तब पहुंचती है जब मंच पर अहिल्या हिंदू पौराणिक कथाओं में इन पांच स्त्रियों अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी को ‘पंचकन्या’ कहा जाता है। मान्यता है कि इनके स्मरण से पाप नष्ट होते हैं। विवाह और संतान होने के बावजूद इन्हें पवित्र और चिर-कुमारी माना गया है। फिर भी इसमें कन्याओं की ओर से सवाल किया जाता है कि समाज ने हमें देवी तो माना, पर क्या कभी उनकी इच्छाओं, भावनाओं और संघर्षों को समझा? सवाल सुन दर्शक भाव विभोर हो जाते है। सभागार एक अलग रंग में रमता दिखा। यह नाटक कि प्रस्तुति पौराणिक कथाओं पर प्रहार नहीं करती, बल्कि उन्हें नारी दृष्टिकोण से समाज से सवाल करती है। कन्याएं कहती हैं कि समाज महिलाओं से सुंदर, दयालु और वफादार होने की अपेक्षा करता है। लेकिन, यह नहीं पूछता कि वे स्वयं क्या चाहती हैं। नेपाल और भारत दोनों संदर्भों में महिलाओं को ‘देवी’ कहा जाता है। फिर भी उनके साथ अन्याय होता है। प्रस्तुति ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया।
राजस्थानी लोकजीवन का स्पर्श : गुरुवार को ‘गौ रो दान’ के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति मंच पर जीवंत होगी। सरताज नारायण माथुर द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस प्रस्तुति में लोकभाषा की मिठास और सामाजिक यथार्थ का गहन चित्रण है। काठमांडू में हुआ विकसित ‘मोक्षदा’: ‘मोक्षदा’ ने यह संदेश दिया कि पंचकन्याएं केवल पवित्रता की प्रतीक नहीं, बल्कि जटिल मानवीय अनुभवों से गुजरने वाली स्त्रियां हैं। विश्व की पांच अलग-अलग नृत्य शैलियों को नेपाली लय के साथ जोड़कर मिथक और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित किया गया। इस नाटक को पांच महिला कलाकार ने एक महीने में तैयार किया। इसमें नृत्य नाटक की मुख्य भाषा रही। जहां भावनाएं शब्दों से आगे बढ़कर देह-भाषा में व्यक्त हुई। इस नाटक को पांच अभिनेत्रियों ने एक महीने में तैयार किया। पहली बार 2019 में काठमांडू में विकसित किया गया था। भारत रंग महोत्सव नृत्य-अभिनय में अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी की आभा ने विस्मित किया प्रेमचंद रंगशाला में नेपाल से आई डांस-ड्रामा प्रस्तुति ‘मोक्षदा’ ने पंचकन्याओं की पौराणिक कथा को नए नारी दृष्टिकोण से जीवंत कर दिया। नृत्य और सशक्त अभिनय के माध्यम से अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी की आवाज मंच पर गूंजी। यहां उन्हें देवी नहीं, बल्कि भावनाओं और संघर्षों से भरी मानवीय स्त्रियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से आयोजित भारत रंग महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को नेपाल से आई टीम ने मोक्षदा’ का मंचन किया। नम्रता केसी द्वारा लिखित और निर्देशित इस नाटक में नृत्य और अभिनय के माध्यम से पंचकन्याओं की कथा को नए नजरिए से प्रस्तुत किया गया। नाटक की शुरुआत अहिल्या के मंच पर आगमन से होती है। उनकी शांत लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति से सभागार में सन्नाटा छा जाता है। इसके बाद कुंती का प्रवेश होता है और दर्शकों ने तालियों से स्वागत किया। एक-एक कर तारा, द्रौपदी और मंदोदरी भी मंच पर आती हैं। समाज ने नारी की भावनाओं और संघर्षों को नहीं समझा
कहनी अपनी असली रूप में तब पहुंचती है जब मंच पर अहिल्या हिंदू पौराणिक कथाओं में इन पांच स्त्रियों अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी को ‘पंचकन्या’ कहा जाता है। मान्यता है कि इनके स्मरण से पाप नष्ट होते हैं। विवाह और संतान होने के बावजूद इन्हें पवित्र और चिर-कुमारी माना गया है। फिर भी इसमें कन्याओं की ओर से सवाल किया जाता है कि समाज ने हमें देवी तो माना, पर क्या कभी उनकी इच्छाओं, भावनाओं और संघर्षों को समझा? सवाल सुन दर्शक भाव विभोर हो जाते है। सभागार एक अलग रंग में रमता दिखा। यह नाटक कि प्रस्तुति पौराणिक कथाओं पर प्रहार नहीं करती, बल्कि उन्हें नारी दृष्टिकोण से समाज से सवाल करती है। कन्याएं कहती हैं कि समाज महिलाओं से सुंदर, दयालु और वफादार होने की अपेक्षा करता है। लेकिन, यह नहीं पूछता कि वे स्वयं क्या चाहती हैं। नेपाल और भारत दोनों संदर्भों में महिलाओं को ‘देवी’ कहा जाता है। फिर भी उनके साथ अन्याय होता है। प्रस्तुति ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया।
राजस्थानी लोकजीवन का स्पर्श : गुरुवार को ‘गौ रो दान’ के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति मंच पर जीवंत होगी। सरताज नारायण माथुर द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस प्रस्तुति में लोकभाषा की मिठास और सामाजिक यथार्थ का गहन चित्रण है। काठमांडू में हुआ विकसित ‘मोक्षदा’: ‘मोक्षदा’ ने यह संदेश दिया कि पंचकन्याएं केवल पवित्रता की प्रतीक नहीं, बल्कि जटिल मानवीय अनुभवों से गुजरने वाली स्त्रियां हैं। विश्व की पांच अलग-अलग नृत्य शैलियों को नेपाली लय के साथ जोड़कर मिथक और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित किया गया। इस नाटक को पांच महिला कलाकार ने एक महीने में तैयार किया। इसमें नृत्य नाटक की मुख्य भाषा रही। जहां भावनाएं शब्दों से आगे बढ़कर देह-भाषा में व्यक्त हुई। इस नाटक को पांच अभिनेत्रियों ने एक महीने में तैयार किया। पहली बार 2019 में काठमांडू में विकसित किया गया था। भारत रंग महोत्सव नृत्य-अभिनय में अहिल्या, कुंती, तारा, द्रौपदी और मंदोदरी की आभा ने विस्मित किया


