वो मुसलमान जिसकी फिल्म का बाल ठाकरे के एक फैसले पर रहा बड़ा असर

वो मुसलमान जिसकी फिल्म का बाल ठाकरे के एक फैसले पर रहा बड़ा असर

शिवसेना के संस्थापक और ताउम्र प्रमुख रहे बाला साहेब ठाकरे या बाल ठाकरे ने उग्र हिंदुत्व और मुस्लिम विरोध की राजनीति की। इस राजनीति के दम पर उन्होंने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि बनाई। लेकिन, उनके जीवन का कम से कम एक फैसला ऐसा रहा, जिस पर एक मुसलमान के काम का असर रहा। यह फैसला था शिवसेना के मुखपत्र का नाम रखने का और वह मुस्लिम व्यक्ति थे जब्बार पटेल। बता दें कि बाल ठाकरे ने 23 जनवरी, 1989 को ‘सामना’ की शुरुआत की थी। 23 जनवरी (1926) बाल ठाकरे की जयंती भी है।

क्यों ‘सामना’ के अलावा कोई और नाम नहीं रखना चाहते थे बाल ठाकरे और जब्बार पटेल से क्या है कनेक्शन

बाल ठाकरे ने जब तय किया कि पार्टी का एक मुखपत्र होना चाहिए तो ‘सामना’ नाम पर आकर वह अटक गए थे। कोई दूसरा नाम उन्हें भा ही नहीं रहा था। ‘सामना’ के लिए बतौर संपादक काम करने वाले पत्रकार हरीश केंची द्वारा वर्षों पहले मीडिया को इस बारे में कुछ जानकारी दी गई थी। ‘कारवां’ में 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिक केंची ने बताया था कि बाल ठाकरे को ‘सामना’ नाम एकदम जंच गया था। इसके कई कारण थे। एक तो यह बोलने-लिखने में आसान है, दूसरा यह नाम उस समय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय था। लोकप्रिय होने की वजह थी 1974 में आई मराठी फिल्म ‘सामना’। इस फिल्म के निर्देशक थे जब्बार पटेल। बाल ठाकरे ने मुखपत्र के लिए जिस तरह की संपादकीय नीति सोच रखी थी, उससे भी ‘सामना’ नाम मेल खाता था। इसलिए भी वह इसके अलावा कोई और नाम चाहते ही नहीं थे।

‘सामना’ नाम उपलब्ध नहीं था। एक पत्रकार 1975 से ही इस नाम से साप्ताहिक अखबार निकाल रहे थे। फिर भी बाल ठाकरे इसी नाम से अखबार निकालना चाहते थे। उन्होंने यह नाम कैसे हासिल किया, इसकी कहानी जानने से पहले जब्बार पटेल और फिल्म ‘सामना’ के बारे में थोड़ा जान लेते हैं।

ब्राह्मणों के बीच इकलौता था डॉ जब्बार का परिवार

जब्बार पटेल पेशे से बच्चों के डॉक्टर थे। वह मराठी नाटकों और फिल्मों के दिग्गज निर्देशक हैं। उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। 1974 में उनके द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सामना’ को बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में जगह मिली और देश में सर्वश्रेष्ठ मराठी फीचर फिल्म का 23वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। फिल्म के लेखक विजय तेंदुलकर थे। उनका लिखा नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ भी जब्बार पटेल ने ही निर्देशित किया था।

पंढरपुर में 1942 में जन्मे डॉ जब्बार पटेल सोलापुर में ऐसी जगह रहते थे जहां ज़्यादातर घर ब्राह्मणों के थे। उनके बीच इकलौता मुस्लिम परिवार उनका ही था।

जानते हैं बाल ठाकरे ने कैसे पाया ‘सामना’ नाम

‘सामना’ नाम से एक साप्ताहिक अखबार 1975 में वसंत कनाडे नाम के शख्स ने शुरू किया था। वसंत पत्रकार थे और सोलापुर जिले के माढा गांव के रहने वाले थे। अखबार शुरू करने से एक साल पहले उन्होंने नर्मदा माने से अंतरजातीय शादी की थी। घरवाले इस शादी के विरोध में थे। फिर भी उन्होंने चुपके से शादी कर ली थी। इसके बाद से उनकी जिंदगी में परेशानी बढ़ गई थी।

1979 में वसंत कनाडे माढा छोड़ कर बार्शी आ गए और वहीं पत्नी के साथ रहने लगे। इस बीच निजी और आर्थिक परेशानियां बढ़ गई थीं और ‘सामना’ का प्रकाशन मुश्किल हो गया था। उधर, शिवसेना का प्रभाव ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ता जा रहा था। 1988 आते-आते महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में शिवसेना अच्छी पैठ बना चुकी थी। उसी साल माढा और बारशी के स्थानीय शिवसैनिकों ने कनाडे से संपर्क साधा और ‘सामना’ नाम खरीदने की बाला साहेब की इच्छा बताई। सोलापुर में पार्टी के कुछ नेताओं को बात आगे बढ़ाने का काम सौंपा गया। उनके कहने पर कनाडे पति-पत्नी मुंबई बाल ठाकरे के पास गए।

नर्मदा माने ने ‘कारवां’ को बताया था कि वे तीन दिन ठाकरे परिवार के साथ रहे। वहां उनका अच्छा सत्कार हुआ। बाल ठाकरे ने जब पूछा कि नाम देने के बदले क्या चाहिए तो कनाडे ने कहा कि ‘सामना’ का जिला संवाददाता बना दीजिएगा। बात पक्की हो गई। उन्हें हर महीने एक निश्चित रकम दी जाती रही।

बाल ठाकरे की बात उठाने की हिम्मत भला कौन करता!

उस समय तक बाल ठाकरे की वह स्थिति थी कि महाराष्ट्र में कोई उन्हें किसी बात के लिए मना नहीं कर सकता था। सुजाता आनंदन ने अपनी किताब Hindu Hriday Samrat: How the Shiv Sena Changed Mumbai Forever में लिखा है, ‘बाल ठाकरे भारत के शायद इकलौते ऐसे नेता थे जो एक आवाज पर मुंबई को पूरी तरह बंद करवा सकते थे। इसके लिए उन्हें किसी संवैधानिक पद की जरूरत नहीं थी। वह खुद रिमोट कंट्रोल थे। मराठी मानुस के पैरोकार से हिंदू हृदय सम्राट की छवि बनाना उनकी सोची-समझी नीति थी।’

सुकेतु मेहता ने एक इंटरव्यू में बाल ठाकरे से पूछा था- क्या आप तानशाह हैं? ठाकरे ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था- हां, मैं तानशाह हूं। लेकिन, लोगों की भलाई के लिए तानाशाही करता हूं। देश में लोकतंत्र का मजाक बना कर रख दिया गया है।

बाल ठाकरे का नया ‘सामना’

12 अगस्त, 1988 को बांद्रा कोर्ट में ट्रांसफर डीड की औपचारिकता पूरी हुई और 23 जनवरी, 1989 को नया ‘सामना’ शुरू हुआ। इस नए ‘सामना’ का तेवर भी एकदम नया था। ‘बाल ठाकरे एंड द राइज ऑफ द शिवसेना’ नाम की किताब में वैभव पुरंदरे लिखते हैं, ‘पहले अंक से ही अखबार ने मास्टहेड पर यह लिख कर अपना राजनीतिक एजेंडा साफ कर दिया कि उग्र हिंदुत्व की पैरोकारी करने वाला एक मात्र मराठी दैनिक।’ नए सामना की यह संपादकीय नीति पुराने साप्ताहिक सामना से एकदम उलट था।

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