संगीत साधना के पथिक : ललित का सुरमय सफर

संगीत साधना के पथिक : ललित का सुरमय सफर

दिनेश कुमार शर्मा

अजमेर (Ajmer news). केशवनगर निवासी 65 वर्षीय ललित कुमार शर्मा का जीवन संगीत साधना और कलाकारों के उत्थान को समर्पित है। डीएवी व डेमोंस्ट्रेशन स्कूल से स्कूली शिक्षा और राजकीय महाविद्यालय से एमए करने वाले शर्मा ने वर्ष 1984 में जलदाय विभाग में सेवा प्रारंभ की और 2021 में सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उनकी असल पहचान संगीत के प्रति उनके जुनून से है।

संगीत को माना साधना का माध्यम

उन्होंने संगीत को साधना का माध्यम माना। स्कूली दिनों में ताल के प्रति रुचि ने उन्हें तबला, ढोलक के साथ-साथ तुंबा, कोंगो, बोंगो और दरबुका जैसे वेस्टर्न वाद्ययंत्रों में दक्ष बनाया। उन्होंने इंदरनारायण माथुर व अभिजीत मजूमदार से तबला सीखा तथा पं. कन्हैयालाल मधुकर से गायन की शिक्षा लेकर संगीत की गहराई को समझा। संगीत के प्रति जुनून उन्हें 1983 में मायानगरी मुंबई ले गया, जहां उन्होंने कई प्रतिष्ठित संगीतकारों से मुलाकात कर अनुभव अर्जित किया। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा तय कर गया।

संस्था बनी संगीत के क्षेत्र में सशक्त मंच

21 अक्टूबर 2001 को विजयादशमी पर ‘सप्तक’ संस्था की स्थापना की, जिसका उद्देश्य परदे के पीछे कार्य करने वाले कलाकारों को मंच प्रदान करना और उन्हें पहचान दिलाना था। आज यह संस्था अजमेर में संगीत के क्षेत्र में एक सशक्त मंच बन चुकी है। अब तक 150 से अधिक कलाकार इसके माध्यम से प्रस्तुति दे चुके हैं। शर्मा के प्रयासों से ढोलक, तबला, शहनाई और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की उपयोगिता फिर से जनमानस तक पहुंची है।

संगीत मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि साधना

वे मानते हैं कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि साधना और ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम है। उनका कहना है कि कलाकारों का ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही सच्ची सेवा है। वे आज भी संगीत के माध्यम से समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहे हैं और ‘सप्तक’ के जरिए सुरों की इस साधना को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

साथी से मिली प्रेरणा

स्कूली शिक्षा के दौरान ताल का शौक रहा। एक दिन कक्षा में साथी कपिल शर्मा टेबल पर पंजाबी भंगड़ा की थाप दे रहे थे। इससे प्रेरणा मिली और उनसे सीखा, फिर इन्दरनारायण माथुर व अभिजीत मजूमदार से तबला वादन सीखा। गाने की चाल को समझने के लिए पंडित कन्हैयालाल मधुकर के यहां गायन की विधिवत शिक्षा ली।

जुनून ने पहुंचाया मायानगरी

कॉलेज शिक्षा के दौरान एक मैगजीन में मशहूर संगीतकार निर्मल कुमार मुखर्जी के बारे में पढ़ा और मुम्बई जाने का निश्चय किया, लेकिन माध्यम नहीं मिला। फिर एक दिन संगीतकार वनराज भाटिया का इंटरव्यू पढ़ा तो उनसे सम्पर्क किया। 31 मई 1983 को दोस्त सादिक अली के साथ मुम्बई पहुंचे। यहां वेस्टर्न आउटडोर स्टूडियो में दमन सूद ‘भारत एक खोज’ की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। तीन दिन रुककर प्रशिक्षण लिया। इस दौरान निर्मल कुमार मुखर्जी, लेजली गुडिनो, मनोहरि दा, सुराज साठे, पं. अनुपम रॉय, भानू गुप्ता आदि से मुलाकात हुई। यहां लेजलीगुडिनो ने उनके पुत्र के पास बहरीन जाने को कहा, लेकिन मां कुंती देवी ने इतनी दूर जाने से मना कर दिया।

बचपन से रहा संघ से जुड़ाव

पिता महावीर प्रसाद शर्मा संघ के प्रचारक और अध्यापक रहे। उनकी वजह से बचपन से ही संघ से जुडाव रहा। ऐसे में दत्तोपंत ठेंगडी, बालासाहेब देवरस, ब्रह्मदेव शर्मा, गिरराज शर्मा, मूलचंद सोनी आदि का मार्गदर्शन मिलता रहा। बचपन में संघ की तेजाजी सायम शाखा के स्वयंसेवक रहे। वर्तमान में केशव प्रौढ़, संघ के मुख्य शिक्षक विभाग गोसेवा, सम्पर्क विभाग कला श्रेणी के प्रमुख का दायित्व संभाल रहे हैं।

सा​थियों के सहयोग से सप्तक की स्थापना

ललित कुमार शर्मा ने वर्ष 2001 में सौरभ शर्मा, मीरा मुखर्जी, नरेन्द्र ऐरन, रमेश अग्रवाल, नरेन्द्र जैन, लव गोयल, नटवर गोयल आदि के साथ सप्तक संस्था की स्थापना की। संस्था के कार्यक्रम में अब तक 20 से अधिक कार्यक्रम में 150 से अधिक कलाकार प्रस्तुति दे चुके हैं। इनमें संगीतकार वनराज भाटिया, सैक्सोफोन वादक मनोहरी दा, कांगो, तुंगा व डफ वादक निर्मल कुमार मुखर्जी, गिटार वादक अरविंद हल्दीपुर, ढोलक वादक अजीज मोहम्मद, अकोर्डियन मास्टर सुराज साठे, तबला- ढोलक प्लेयर विजय इंदौरकर, सैक्सोफोन वादक श्यामराज, ड्रमर सुरेश सोनी, म्यूजिक अरेंजर किशोर शर्मा, वायलिन वादक अमर हल्दीपुर, गिटार वादक सुनील कौशिक आदि शामिल हैं।

इन कलाकारों ने दी प्रस्तुति

फिल्म संगीतकार वनराज भाटिया, संगीतकार व म्यूजिक अरेंजर किशोर शर्मा, जाने-माने सैक्सोफोन प्लेयर मनोहरि दा, रिदम किंग बाबला, म्यूजिक अरेंजर कांगो-तुंबा प्लेयर निर्मल कुमार मुखर्जी, वायलिन प्लेयर जीतू ठाकुर, ग्रैमी अवार्ड विनर मोहन वीणा वादक पंडित विश्वमोहन भट्ट, प्रसिद्ध संतूर वादक पदमश्री पंडित भजन सोपोरी, पंडित अनुपम राय और कथक नृतक पंडित रविशंकर मिश्र जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कला साधक अजमेर में अपनी प्रस्तुति से सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अविस्मरणीय बना चुके हैं।

संस्था की ओर से सालाना 22 सम्मान

सप्तक की ओर से हर साल होने वाले 6 कार्यक्रमों में 22 सम्मान प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक सम्मान में पत्रपुष्प के रूप में क्रमश: 51 हजार, 21 हजार और 11 हजार रुपए, स्मृति चिन्ह और श्रीफल प्रदान किए जाते हैं। वसंत पंचमी पर वसंतोत्सव-भारत माता पूजन समारोह, चैत्र नवरात्र में नवसृजन, गुरु पूर्णिमा उत्सव, महर्षि भरत मुनि जयंती पर नाट्य एकांकी समारोह, सप्तक के प्रणेता पंडित महावीर प्रसाद व कुंती देवी को समर्पित समर्पण आदि कार्यक्रम किए जाते हैं।

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