गूंजता रहा जगदीशपुर का शेर अभी जिंदा है…

गूंजता रहा जगदीशपुर का शेर अभी जिंदा है…

मंच पर हल्की-हल्की रोशनी फैलती है… ढोलक की थाप गूंजती है… और दर्शकों के सामने जगदीशपुर का दरबार का दृश्य जीवंत हो उठता है। 1857 की क्रांति के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह अपने साथियों के बीच बैठे हैं। तभी नृत्य और संगीत के बीच कहानी आगे बढ़ती है और दर्शक खुद को उस दौर में महसूस करने लगते हैं। यही था नाटक ‘अधूरा सपना’ का प्रभाव, जिसे प्रांगण पटना की ओर से प्रस्तुत किया गया। इस नाटक का मंचन शुक्रवार को प्रेमचंद रंगशाला में किया गया। नाटक की शुरुआत कुंवर सिंह के दरबार से होती है। यहां शारिफन जान के नृत्य और संगीत का दृश्य माहौल को जीवंत बना देता है। लेकिन कहानी केवल दरबारी रंग-रौनक तक सीमित नहीं रहती। जैसे-जैसे घटनाएं आगे घटती चलती हैं, अंग्रेजी हुकूमत की साजिशें सामने आती हैं। पटना डिवीजन के कमिश्नर टेलर को जब यह पता चलता है कि कुंवर सिंह कर का भुगतान नहीं कर रहे और क्रांतिकारियों की मदद कर रहे हैं, तो उन्हें फांसी देने की साजिश रची जाती है। पद्मश्री डॉ. जगदीश ने लिखी यह कहानी इस नाटक के लेखक पद्मश्री डॉ. जगदीश प्रसाद सिंह हैं। इसकी परिकल्पना और इसका निर्देशन अभय सिन्हा ने किया। निर्देशक ने कहा कि मंच निर्माण, वेशभूषा, संगीत और प्रकाश की बेहतरीन व्यवस्था ने नाटक को और प्रभावशाली बना दिया। उन्होंने कहा कि अधूरा सपना केवल एक नाटक नहीं, बल्कि वीर कुंवर सिंह को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। यह प्रस्तुति दर्शकों को यह एहसास कराती है कि आजादी की हर सांस के पीछे कितने बलिदानों की कहानी छिपी है। मंच पर कुंवर सिंह का साहस दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। उनका संवाद जगदीशपुर का शेर अभी जिंदा है… पूरे सभागार में गूंज उठता है। अंग्रेजों के खिलाफ खुली बगावत का ऐलान और फिर युद्ध के दृश्य, दर्शकों को मानो 1857 के रणक्षेत्र में ले जाते हैं। मंच पर सबसे भावुक पल तब आता है, जब गोली लगने के बाद कुंवर सिंह अपना दाहिना हाथ काटकर मां गंगा को अर्पित कर देते हैं। यह दृश्य गीत और भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ इतने प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया कि सभागार में सन्नाटा छा गया। कई दर्शकों की आंखें नम हो गईं। कहानी आगे बढ़ती है और नाटक में यह भी दिखाया गया कि आजादी की लड़ाई कितनी कठिन और बलिदान से भरी थी। उधर, धर्मन बीवी की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही है। देश की आजादी की लड़ाई के बीच उनका जीवन धीरे-धीरे बुझता हुआ दीपक बन जाता है। अंत में, देश को आजाद देखने का कुंवर सिंह का सपना अधूरा रह जाता है, लेकिन उनके बलिदान की बदौलत ही आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।
कुंवर सिंह ने हाथ काटकर मां गंगा को अर्पित किया, दर्शक हुए भावुक rangmanch प्रेमचंद रंगशाला में प्रांगण ने प्रस्तुत किया अधूरा सपना, जीवंत हुआ जगदीशपुर के शेर का साहस मंच पर हल्की-हल्की रोशनी फैलती है… ढोलक की थाप गूंजती है… और दर्शकों के सामने जगदीशपुर का दरबार का दृश्य जीवंत हो उठता है। 1857 की क्रांति के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह अपने साथियों के बीच बैठे हैं। तभी नृत्य और संगीत के बीच कहानी आगे बढ़ती है और दर्शक खुद को उस दौर में महसूस करने लगते हैं। यही था नाटक ‘अधूरा सपना’ का प्रभाव, जिसे प्रांगण पटना की ओर से प्रस्तुत किया गया। इस नाटक का मंचन शुक्रवार को प्रेमचंद रंगशाला में किया गया। नाटक की शुरुआत कुंवर सिंह के दरबार से होती है। यहां शारिफन जान के नृत्य और संगीत का दृश्य माहौल को जीवंत बना देता है। लेकिन कहानी केवल दरबारी रंग-रौनक तक सीमित नहीं रहती। जैसे-जैसे घटनाएं आगे घटती चलती हैं, अंग्रेजी हुकूमत की साजिशें सामने आती हैं। पटना डिवीजन के कमिश्नर टेलर को जब यह पता चलता है कि कुंवर सिंह कर का भुगतान नहीं कर रहे और क्रांतिकारियों की मदद कर रहे हैं, तो उन्हें फांसी देने की साजिश रची जाती है। पद्मश्री डॉ. जगदीश ने लिखी यह कहानी इस नाटक के लेखक पद्मश्री डॉ. जगदीश प्रसाद सिंह हैं। इसकी परिकल्पना और इसका निर्देशन अभय सिन्हा ने किया। निर्देशक ने कहा कि मंच निर्माण, वेशभूषा, संगीत और प्रकाश की बेहतरीन व्यवस्था ने नाटक को और प्रभावशाली बना दिया। उन्होंने कहा कि अधूरा सपना केवल एक नाटक नहीं, बल्कि वीर कुंवर सिंह को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। यह प्रस्तुति दर्शकों को यह एहसास कराती है कि आजादी की हर सांस के पीछे कितने बलिदानों की कहानी छिपी है। मंच पर कुंवर सिंह का साहस दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। उनका संवाद जगदीशपुर का शेर अभी जिंदा है… पूरे सभागार में गूंज उठता है। अंग्रेजों के खिलाफ खुली बगावत का ऐलान और फिर युद्ध के दृश्य, दर्शकों को मानो 1857 के रणक्षेत्र में ले जाते हैं। मंच पर सबसे भावुक पल तब आता है, जब गोली लगने के बाद कुंवर सिंह अपना दाहिना हाथ काटकर मां गंगा को अर्पित कर देते हैं। यह दृश्य गीत और भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ इतने प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया कि सभागार में सन्नाटा छा गया। कई दर्शकों की आंखें नम हो गईं। कहानी आगे बढ़ती है और नाटक में यह भी दिखाया गया कि आजादी की लड़ाई कितनी कठिन और बलिदान से भरी थी। उधर, धर्मन बीवी की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही है। देश की आजादी की लड़ाई के बीच उनका जीवन धीरे-धीरे बुझता हुआ दीपक बन जाता है। अंत में, देश को आजाद देखने का कुंवर सिंह का सपना अधूरा रह जाता है, लेकिन उनके बलिदान की बदौलत ही आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।
कुंवर सिंह ने हाथ काटकर मां गंगा को अर्पित किया, दर्शक हुए भावुक rangmanch प्रेमचंद रंगशाला में प्रांगण ने प्रस्तुत किया अधूरा सपना, जीवंत हुआ जगदीशपुर के शेर का साहस  

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