बीकानेर की पहचान रही उस्ता कला आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। बेशक इस कला को जीआई टैग मिला, लेकिन मुश्किल से 10-15 कारीगर हैं, जो उस्ता कला को निभा रहे हैं। कला व विरासत विशेषज्ञ लतीफ उस्ता बताते हैं- शुरुआत में यह कला सिर्फ दीवारों पर की जाती थी। बीकानेर के किलों और हवेलियों की दीवारों पर उभरी हुई सुनहरी नक्काशी उसी परंपरा का हिस्सा थी। लेकिन जब अंग्रेज अधिकारी इस कला को अपने साथ ब्रिटेन ले जाना चाहते थे, तब से ही उस्ता कला को ऊंट की खाल से बने कुप्पे, कुप्पियों और अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे टेबल लैंप आदि पर करने की शुरुआत हुई। उस्ता कला कारीगर कहते हैं- हस्तशिल्प पुरस्कार और नियमित सरकारी संरक्षण चाहिए उस्ता कला की प्रक्रिया बेहद लंबी और श्रमसाध्य है। इसके लिए ऊंट की खाल बड़ी मुश्किल से मिल पा रही है, जिससे कुप्पी बनती है। पहले सूखी कुप्पी लाई जाती है, उसके अंदर की मिट्टी निकाली जाती है, मूल आकार बना रहता है। पहले कागज पर डिजाइन बनाते हैं। ट्रेसिंग पेपर पर बारीक सुई से छेद करते हैं, जिसे सुरजन कहते हैं। फिर सफेद और चारकोल पाउडर की मदद से वही डिजाइन कुप्पी पर उतारी जाती है। पुराने घड़ों की कूटी हुई मिट्टी, गुड़ और गोंद मिलाकर बने पेस्ट से डिजाइन उभारी जाती है। जब ये सूख जाती है तो उसके बाद पीली और केसरिया रंग की परत चढ़ती है। फिर असली सोने का वर्क लगाया जाता है। उभरे हिस्सों पर काली स्याही से आउटलाइन और बाकी हिस्सों में रंग भरे जाते हैं। हर चरण में 10 से 12 घंटे सूखने में लगते है। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकार अयूब अली उस्ता बताते हैं- उस्ता कला के सामने आज सबसे बड़ी समस्या कच्चे माल की उपलब्धता और महंगाई है। सोने की कीमत लगातार बढ़ रही है, जबकि खरीदार कम होते जा रहे हैं। 200-250 ग्राम की एक चमड़े की कुप्पी की कीमत उस पर की जाने वाली उस्ता कला नक्काशी के अनुसार 5 से 6 हजार तक पहुंच जाती है। राज्य स्तर पर हस्तशिल्प पुरस्कार और नियमित सरकारी संरक्षण बंद हो चुका है। कारीगर कहते हैं, जब पहचान, बाजार और आमदनी तीनों अनिश्चित हों, तो नई पीढ़ी इस कला में क्यों आएगी। उस्ता कला आज भी जीवित है, लेकिन कुछ गिने-चुने हाथों और सीमित उम्मीदों के सहारे।


