नागालैंड के राज्यपाल के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद वरिष्ठ नेता नन्द किशोर यादव ने अपने राजनीतिक जीवन, संघर्षों और भविष्य की जिम्मेदारियों को लेकर दैनिक भास्कर से खुलकर बातचीत की। उन्होंने बताया कि उनके जीवन का मूल सिद्धांत हमेशा से यह रहा है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। जो भी दायित्व संस्था या संगठन देता है, उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाना चाहिए। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर संघ के संस्कारों से प्रभावित रहा, जिसने उन्हें सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने आपातकाल के दौर के अपने संघर्षों को भी याद किया, जब वे लगभग 14–15 महीने जेल में रहे और भूमिगत रहकर लोकतंत्र की आवाज को जीवित रखने के लिए बुलेटिन निकालने का काम करते थे। नन्द किशोर यादव ने बिहारवासियों को भरोसा दिलाया कि भले ही वे नई जिम्मेदारी निभाने के लिए दूसरे राज्य जा रहे हों, लेकिन बिहार उनके दिल में हमेशा रहेगा। पढ़िए नन्द किशोर यादव से दैनिक भास्कर से खास बातचीत- बिहार के लोग हमेशा रहेंगे दिल में- नन्द किशोर यादव नन्द किशोर यादव ने परिवार की भावनाओं, बिहार से अपने जुड़ाव और नागालैंड में नई भूमिका को लेकर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि, ‘बिहार और यहां के लोग हमेशा मेरे दिल में रहेंगे। अब जो नई जिम्मेदारी मिली है, उसके तहत नागालैंड के लोगों की सेवा, वहां शांति और विकास के लिए काम करेंगे।’ उन्होंने राजनीति में आने वाले युवाओं को भी संदेश दिया कि केवल पद या स्वार्थ के लिए राजनीति करने से सफलता नहीं मिलती, बल्कि कड़ी मेहनत और बड़े लक्ष्य के साथ काम करने से ही लंबी राजनीतिक यात्रा संभव होती है। सवाल: सबसे पहले आपको बहुत-बहुत बधाई इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है कैसे देखते हैं आप इसको और कितनी खुशी है? जवाब: देखिए मेरे जीवन का एक ही दर्शन है। काम कोई छोटा नहीं होता, जो काम संस्थान दे, पूरी निष्ठा के साथ उस दायित्व का निर्वाह करना है। सवाल: छात्र राजनीति से आपने राजनीतिक शुरुआत की थी। तब कौन आपके रोल मॉडल रहे, जिन्हें देखकर आपने राजनीति शुरू की, आपने किससे प्रेरणा ली? जवाब: हम आरएसएस में सबसे पहले जुड़े और जो संस्कार मुझे मिला है, वो संघ से मिला है। इसी संस्कार ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है। आज अगर मेरे व्यक्तित्व में कुछ अच्छाई दिखाई पड़ती है तो सारा श्रेय संघ को है, मेरे परिवार के संस्कार को है। सवाल: परिवार वाले कैसे क्या अभी खुशी है आप उनसे दूर जाएंगे? जवाब: किसी के परिवार का आदमी कोई गवर्नर बन जाए तो उसके परिवार के लोग तो खुश होंगे ही। एक बात जरूर है कि परिवार के लोग को लगता है कि फिर पापा दूर चले जाएंगे। ये मन में मलाल जरूर है, लेकिन इतनी बड़ी जिम्मेवारी मिलने का एक हिचकिचाहट भी है। सवाल: आपने बिहार में इतने लंबे समय तक राजनीति किया है और आप बिहार से दूर जा रहे हैं तो क्या बिहारवासी को मिस करेंगे? जवाब: बिहार को मिस करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि बिहार और बिहारी लोग मेरे दिल में बसे हैं। बिहार के विकास में सरकार में रहकर मैंने अपनी भूमिका के निभाई है, लेकिन अब दायित्व बदल गया है तो मैं नागालैंड की सेवा करूंगा। नागालैंड के लोगों की सेवा करूंगा। वहां सौहार्द कैसे बना रहे, शांति बनी रहे और विकास कैसे हो, इसके बारे में नागालैंड के लोगों के साथ मिलकर काम करूंगा। सवाल: आप आपातकाल के वक्त को बहुत से लोगों ने पढ़ा, सुना और आपने भी देखा है। उस वक्त आपने लाठियां भी खाई है। उस दौर के बारे में कुछ बताइए? जवाब: आपातकाल के समय लगभग चौदह पन्द्रह महीने मैं जेल में रहा। जब आपातकाल लागू हुआ तो संगठन ने तय किया कि आपको गिरफ्तार नहीं होना है। उस समय जो कोई समाचार पत्र नहीं छपते थे। आपातकाल के समाचारों का बुलेटिन छापने की जिम्मेदारी मेरे साथ दो और मित्रों, अशोक कुमार, यादव साहब को मिली। हम तीनों मिलकर के लोकवाणी नाम से बुलेटिन निकालते थे और पटना, भोजपुर और नालंदा, तीनों जिलों के हाथ पठनु बुलेटिन को पहुंचाने का काम करते थे। पुलिस ने गिरफ्तारी के वारंट जारी थे, लेकिन नहीं पकड़ा जाता था। इसलिए मेरे घर की कुर्की जब्ती हो गई। पूरे आपातकाल के दौरान मेरे घर में दरवाजा, खिड़की, चौखट नहीं था। मेरे परिवार के लोग कपड़ा का परदा टांग के पूरे आपातकाल के दौरान रहे। सवाल: आप आज राज्यपाल की जिम्मेवारी तक पहुंचे हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं जो शुरुआत करते हैं, लेकिन संघर्ष देखकर रुक जाते हैं। आपने भी कई संघर्ष किए हैं तो राजनीति में आगे बढ़ने के लिए लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगे? जवाब: देखिए, जब लक्ष्य बड़ा हो, जब लक्ष्य देश हो, भारत माता हो तो इन छोटे-छोटे कष्टों को आदमी आराम से भुला सकता है। लक्ष्य बड़ा अगर होगा तो आप कष्ट को सह सकते हैं और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी आपको मिलती है। ये लक्ष्य अगर छोटा हुआ, केवल स्वार्थवश आपने कुछ कुर्सी पाने की कोशिश की तो आप लड़ नहीं सकते। सवाल: पहले के समय की राजनीति और अभी के राजनीति में आप क्या अंतर देखते हैं। अभी के जो नए लोग आ रहे हैं, उनके लिए आप क्या कुछ कहेंगे? जवाब: मैं अंतर की बात तो नहीं करूंगा, लेकिन एक बात मैं जरूर नए लोगों से आग्रह करूंगा कि गणेश परिक्रमा करके बहुत दिन तक आप सर्वाइव नहीं कर सकते। आगे बढ़ना है तो काम करना पड़ेगा। अपने परिश्रम को बलिपंथ की पहचान बनाइएगा तो लंबे समय तक समग्र जीवन को बरकरार रखेंगे। सवाल: जाने से पहले बिहारवासियों के लिए क्या कहेंगे? जवाब: बिहार छोड़कर कहां जा रहे हैं। बिहार को दिल में लेके जा रहे हैं। बिहार कभी हमसे अलग कैसे हो सकता है। 2-5 साल का कार्यकाल है, जिसमें मुझे दूसरे राज्य की सेवा करने का अवसर मिला है। मैं जरूर बिहारवासियों को यह विश्वास दिलाता हूं कि बिहार को शीर्ष पर पहुंचाएंगे। नागालैंड के राज्यपाल के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद वरिष्ठ नेता नन्द किशोर यादव ने अपने राजनीतिक जीवन, संघर्षों और भविष्य की जिम्मेदारियों को लेकर दैनिक भास्कर से खुलकर बातचीत की। उन्होंने बताया कि उनके जीवन का मूल सिद्धांत हमेशा से यह रहा है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। जो भी दायित्व संस्था या संगठन देता है, उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाना चाहिए। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर संघ के संस्कारों से प्रभावित रहा, जिसने उन्हें सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने आपातकाल के दौर के अपने संघर्षों को भी याद किया, जब वे लगभग 14–15 महीने जेल में रहे और भूमिगत रहकर लोकतंत्र की आवाज को जीवित रखने के लिए बुलेटिन निकालने का काम करते थे। नन्द किशोर यादव ने बिहारवासियों को भरोसा दिलाया कि भले ही वे नई जिम्मेदारी निभाने के लिए दूसरे राज्य जा रहे हों, लेकिन बिहार उनके दिल में हमेशा रहेगा। पढ़िए नन्द किशोर यादव से दैनिक भास्कर से खास बातचीत- बिहार के लोग हमेशा रहेंगे दिल में- नन्द किशोर यादव नन्द किशोर यादव ने परिवार की भावनाओं, बिहार से अपने जुड़ाव और नागालैंड में नई भूमिका को लेकर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि, ‘बिहार और यहां के लोग हमेशा मेरे दिल में रहेंगे। अब जो नई जिम्मेदारी मिली है, उसके तहत नागालैंड के लोगों की सेवा, वहां शांति और विकास के लिए काम करेंगे।’ उन्होंने राजनीति में आने वाले युवाओं को भी संदेश दिया कि केवल पद या स्वार्थ के लिए राजनीति करने से सफलता नहीं मिलती, बल्कि कड़ी मेहनत और बड़े लक्ष्य के साथ काम करने से ही लंबी राजनीतिक यात्रा संभव होती है। सवाल: सबसे पहले आपको बहुत-बहुत बधाई इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है कैसे देखते हैं आप इसको और कितनी खुशी है? जवाब: देखिए मेरे जीवन का एक ही दर्शन है। काम कोई छोटा नहीं होता, जो काम संस्थान दे, पूरी निष्ठा के साथ उस दायित्व का निर्वाह करना है। सवाल: छात्र राजनीति से आपने राजनीतिक शुरुआत की थी। तब कौन आपके रोल मॉडल रहे, जिन्हें देखकर आपने राजनीति शुरू की, आपने किससे प्रेरणा ली? जवाब: हम आरएसएस में सबसे पहले जुड़े और जो संस्कार मुझे मिला है, वो संघ से मिला है। इसी संस्कार ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है। आज अगर मेरे व्यक्तित्व में कुछ अच्छाई दिखाई पड़ती है तो सारा श्रेय संघ को है, मेरे परिवार के संस्कार को है। सवाल: परिवार वाले कैसे क्या अभी खुशी है आप उनसे दूर जाएंगे? जवाब: किसी के परिवार का आदमी कोई गवर्नर बन जाए तो उसके परिवार के लोग तो खुश होंगे ही। एक बात जरूर है कि परिवार के लोग को लगता है कि फिर पापा दूर चले जाएंगे। ये मन में मलाल जरूर है, लेकिन इतनी बड़ी जिम्मेवारी मिलने का एक हिचकिचाहट भी है। सवाल: आपने बिहार में इतने लंबे समय तक राजनीति किया है और आप बिहार से दूर जा रहे हैं तो क्या बिहारवासी को मिस करेंगे? जवाब: बिहार को मिस करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि बिहार और बिहारी लोग मेरे दिल में बसे हैं। बिहार के विकास में सरकार में रहकर मैंने अपनी भूमिका के निभाई है, लेकिन अब दायित्व बदल गया है तो मैं नागालैंड की सेवा करूंगा। नागालैंड के लोगों की सेवा करूंगा। वहां सौहार्द कैसे बना रहे, शांति बनी रहे और विकास कैसे हो, इसके बारे में नागालैंड के लोगों के साथ मिलकर काम करूंगा। सवाल: आप आपातकाल के वक्त को बहुत से लोगों ने पढ़ा, सुना और आपने भी देखा है। उस वक्त आपने लाठियां भी खाई है। उस दौर के बारे में कुछ बताइए? जवाब: आपातकाल के समय लगभग चौदह पन्द्रह महीने मैं जेल में रहा। जब आपातकाल लागू हुआ तो संगठन ने तय किया कि आपको गिरफ्तार नहीं होना है। उस समय जो कोई समाचार पत्र नहीं छपते थे। आपातकाल के समाचारों का बुलेटिन छापने की जिम्मेदारी मेरे साथ दो और मित्रों, अशोक कुमार, यादव साहब को मिली। हम तीनों मिलकर के लोकवाणी नाम से बुलेटिन निकालते थे और पटना, भोजपुर और नालंदा, तीनों जिलों के हाथ पठनु बुलेटिन को पहुंचाने का काम करते थे। पुलिस ने गिरफ्तारी के वारंट जारी थे, लेकिन नहीं पकड़ा जाता था। इसलिए मेरे घर की कुर्की जब्ती हो गई। पूरे आपातकाल के दौरान मेरे घर में दरवाजा, खिड़की, चौखट नहीं था। मेरे परिवार के लोग कपड़ा का परदा टांग के पूरे आपातकाल के दौरान रहे। सवाल: आप आज राज्यपाल की जिम्मेवारी तक पहुंचे हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं जो शुरुआत करते हैं, लेकिन संघर्ष देखकर रुक जाते हैं। आपने भी कई संघर्ष किए हैं तो राजनीति में आगे बढ़ने के लिए लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगे? जवाब: देखिए, जब लक्ष्य बड़ा हो, जब लक्ष्य देश हो, भारत माता हो तो इन छोटे-छोटे कष्टों को आदमी आराम से भुला सकता है। लक्ष्य बड़ा अगर होगा तो आप कष्ट को सह सकते हैं और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी आपको मिलती है। ये लक्ष्य अगर छोटा हुआ, केवल स्वार्थवश आपने कुछ कुर्सी पाने की कोशिश की तो आप लड़ नहीं सकते। सवाल: पहले के समय की राजनीति और अभी के राजनीति में आप क्या अंतर देखते हैं। अभी के जो नए लोग आ रहे हैं, उनके लिए आप क्या कुछ कहेंगे? जवाब: मैं अंतर की बात तो नहीं करूंगा, लेकिन एक बात मैं जरूर नए लोगों से आग्रह करूंगा कि गणेश परिक्रमा करके बहुत दिन तक आप सर्वाइव नहीं कर सकते। आगे बढ़ना है तो काम करना पड़ेगा। अपने परिश्रम को बलिपंथ की पहचान बनाइएगा तो लंबे समय तक समग्र जीवन को बरकरार रखेंगे। सवाल: जाने से पहले बिहारवासियों के लिए क्या कहेंगे? जवाब: बिहार छोड़कर कहां जा रहे हैं। बिहार को दिल में लेके जा रहे हैं। बिहार कभी हमसे अलग कैसे हो सकता है। 2-5 साल का कार्यकाल है, जिसमें मुझे दूसरे राज्य की सेवा करने का अवसर मिला है। मैं जरूर बिहारवासियों को यह विश्वास दिलाता हूं कि बिहार को शीर्ष पर पहुंचाएंगे।


