विख्यात अलगोजा वादक और जैसलमेर के मूलसागर निवासी तगाराम भील को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा से जिले भर में खुशी का माहौल है। उन्होंने अल्प आयु से ही अलगोजा वादन में दक्षता हासिल कर ली थी। कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी साधना जारी रखी और अलगोजा की लोकधुनों को नई पहचान दी। उनके वादन में मरुस्थल की पीड़ा, आनंद, संघर्ष और उत्सव…सब कुछ एक साथ सुनाई देता है। यही कारण है कि उनका संगीत श्रोताओं के दिलों को सीधे छूता है। देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आयोजित लोककला महोत्सवों, सांस्कृतिक आयोजनों और मंचों पर तगाराम भील ने अपनी प्रस्तुति से अलगोजा को विशिष्ट पहचान दिलाई। वे न केवल एक कुशल वादक हैं, बल्कि लोकपरंपरा के संवाहक भी हैं, जिन्होंने नई पीढ़ी को इस वाद्य के प्रति आकर्षित किया। कई युवा कलाकार आज उनसे प्रेरणा लेकर लोकसंगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। इस अवसर पर राजस्थान पत्रिका ने तगाराम भील से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है, बातचीत के प्रमुख अंश –
पत्रिका : पद्मश्री मिलने की जानकारी आपको कैसे मिली ?
तगाराम : मेरे पास दोपहर बाद गृह मंत्रालय से किसी व्यक्ति का फोन आया। उसने पहले मेरा नाम व अन्य परिचय पूछा और बाद में कहा कि, आपको बधाई है…आप पद्मश्री से सम्मानित किए जाएंगे।
पत्रिका : अलगोजा का आपके जीवन में प्रवेश कब हुआ और इस वाद्य का क्या स्थान है?
तगाराम : करीब 10 वर्ष की आयु में मैं अपने पिता टोपणराम भील से चोरी-छिपे अलगोजा लेकर जंगलों में एवड़ चराने जाता था। वहां अलगोजा बजाता रहता। पिता जब तक लकडिय़ा बेच कर शहर से वापस गांव आते, उससे पहले मैं घर आ जाता। मेरी पूरी उम्र इस वाद्य के नाम ही समर्पित रही। निजी जीवन में जितने भी संघर्ष करने पड़े लेकिन अलगोजा वादन के अलावा मैंने और कुछ नहीं किया। आज मेरी करीब 55 वर्ष की साधना सफल हुई है।
पत्रिका : आज तक आपने कहां-कहां अलगोजा वादन किया है?
तगाराम : भारत के लगभग सभी हिस्सों में आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी करने का मुझे मौका मिला है। इसके अलावा दुनिया के 35 से अधिक देशों में अब तक अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका हूं। यह सफर अभी तक निरंतर जारी है।
पत्रिका : आपके परिवार में और कौन यह वाद्य बजाता है?
तगाराम : मेरा पुत्र मुकेश भील अलगोजा वादन करता है। नई पीढ़ी के और भी कई कलाकारों को मैंने यह कला सिखाई है।
पत्रिका : आज के पॉप कल्चर वाले समय में लोक संगीत के भविष्य को लेकर आप क्या कहेंगे ?
तगाराम : लोक संगीत में हमारी मिट्टी की खुशबू शामिल है। यही कारण है कि जमाना चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, लोकगीत-संगीत सीधे श्रोताओं के दिलों तक पहुंचता है। इसकी मिठास सुनने वालों के कानों में रस घोल देती है। हमें किसी के पीछे भागने की जरूरत नहीं है, अपने हुनर को लगातार मांजने की आवश्यकता है। युवा लोक कलाकारों से कहना चाहता हूं कि वे संगीत साधना के साथ पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान-विज्ञान से भी जितना सम्भव हो सके, जुड़ाव बनाए रखें। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों का है, जो वर्षों से परंपरागत कलाओं को जीवित रखने के लिए साधना कर रहे हैं।


