बेंगलूरु
इस्लाम धर्म में रमजान को सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। इसे इबादत, संयम और आत्म-अनुशासन का महीना कहा जाता है। इस पूरे महीने में मुसलमान अल्लाह की खास इबादत करते हैं और अपने व्यवहार, खानपान व जीवनशैली में सादगी अपनाते हैं। इस पवित्र महीना माह-ए- रमजान का पहला रोजा गुरुवार को रखा जाएगा।रमजान की शुरुआत शाबान महीने की 29 वीं रात को चांद दिखाई देने के बाद होती है। अगर उस दिन चांद नजर नहीं आता, तो शाबान के 30 दिन पूरे किए जाते हैं और उसके अगले दिन से रमजान शुरू माना जाता है।बुधवार को मस्जिदों में चांद देखे जाने और पहला रोजा गुरुवार को रखने का ऐलान किया गया। इसके साथ ही रोजे रखने वाले लोगों ने तैयारियां शुरू कर दी। सुबह में सेहरी और शाम में इफ्तार किया जाएगा।
अब्दुला-बिन-जुबेर मस्जिद, पंपानगर, यशवंतपुर के मौलाना मो. मंजर ने कहा कि रमजान बरकत का पाक महीना माना जाता है। इस माह में रोजा रखने वाले को कई गुणा सवाब मिलता है। रमजान के महीने का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मुस्लिमों का पवित्र ग्रंथ कुरान इसी महीने अवतरित हुआ था, इसलिए इसे रहमत और इबादत का महीना भी कहा जाता है। रमजान के महीने में हर मुसलमान के लिए रोजा रखना अनिवार्य माना गया है ।तीन अशरों में बंटा होता रमजान का महीनामौलाना ने बताया कि रमजान का महीना 30 दिनों का होता है, जिसे तीन अशरों में बांटा गया है। दस-दस दिनों का एक अशरा होता है। इसमें पहला अशरा रहमत, दूसरा असरा मगफिरत (गुनाहों की माफी) और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने के लिए होता है। ऐसा माना जाता है कि रमजान के पहले अशरे में जो लोग रोजा रखते हैं और नमाज अदा करते हैं, उन पर अल्लाह की रहमत बरसती है। दूसरे अशरे में जो अल्लाह की इबादत करते हैं और अल्लाह उनके गुनाहों को माफ कर देते हैं। वहीं, आखिरी और तीसरे अशरे की इबादत और रोजा से जहन्नुम या दोजख से खुद को बचाया जा सकता है।


