तपती हुई पृथ्वी: सामूहिक प्रयास से ही दूर होगा संकट

तपती हुई पृथ्वी: सामूहिक प्रयास से ही दूर होगा संकट

दुनिया आज जलवायु संकट के ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर नया आंकड़ा खतरे की घंटी बनकर सामने आ रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 2015-2025 का दशक अब तक का सबसे गर्म दौर रहा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि ग्रीनहाउस गैसों का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर है और पृथ्वी का एनर्जी इम्बैलेंस लगातार बढ़ रहा है। महासागर, जो जलवायु के संतुलनकर्ता माने जाते हैं, अब 90 प्रतिशत से अधिक अतिरिक्त गर्मी सोख रहे हैं।

भारत के संदर्भ में यह संकट और भी गंभीर रूप लेता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। हाल के वर्षों में कई शहरों में तापमान 48-50 डिग्री तक पहुंचा, जबकि असामान्य गर्मी ने फरवरी-मार्च जैसे महीनों को भी झुलसा दिया। तेज गर्मी का असर कई भारतीय शहर झेल रहे हैं। साथ ही खतरनाक वायु गुणवत्ता का सामना कर रहे हैं। स्पष्ट है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। यह रिपोर्ट बताती है कि देश के लगभग 75 प्रतिशत जिले जलवायु जोखिम के दायरे में हैं। हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों की स्थिरता पर सवाल खड़े कर रहा है। वहीं मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय शहर समुद्री जलस्तर वृद्धि के खतरे से जूझ रहे हैं। कोयला, तेल और गैस के जलने तथा वनों की कटाई के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान अब लगभग एक लाख 25 हजार वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुका है। यानी समस्या की जड़ हमारे विकास मॉडल में है।

कोयले पर निर्भर ऊर्जा, अनियोजित शहरीकरण और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन इस गर्मी को और बढ़ा रहा है। जाहिर है जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल इसी तरह जारी रहा तो तापमान में और बढ़ोतरी होगी। ऐसे में जब तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करके ग्लोबल वार्मिंग को सीमित नहीं किया जाता, तब तक गर्मी के रिकॉर्ड इसी तरह से टूटते रहेंगे। राहत की बात यह है कि इस संकट में ही अवसर निहित हैं। भारत ने 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य रखा है। नवीकरणीय ऊर्जा में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। अब आवश्यकता है ठोस और बहुस्तरीय कार्रवाई की। ऊर्जा संरक्षण को तेज करना, शहरों को हरित बनाना, जल प्रबंधन को जन-आंदोलन में बदलना और कृषि को जलवायु अनुकूल बनाना ही समस्या की राह निकालेगा। साथ ही, जिला स्तर पर हीट एक्शन प्लान और स्थानीय समाधान लागू करने होंगे।

अंतत:, जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चुनौती नहीं, वर्तमान का संकट है। यदि आज निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढिय़ों को एक असंतुलित और तपती हुई पृथ्वी विरासत में मिलेगी। देश-दुनिया के पास समय कम है, लेकिन इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास से यही संकट एक नए और टिकाऊ विकास मॉडल का अवसर भी बन सकता है।

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