नर्मदापुरम में समर्थन मूल्य पर खरीदी गई सरकारी धान के रखरखाव में गंभीर लापरवाही सामने आई है। अनाज मंडी में नर्मदांचल विपणन सहकारी समिति द्वारा खरीदी गई धान की बोरियां खुले में लावारिश हालत में पड़ी मिलीं। हालात ऐसे हैं कि टैग लगी सरकारी बोरियों से धान बाहर बिखरी हुई है, जिसे आवारा मवेशी खाते नजर आए। इससे शासन को आर्थिक नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। 69 केंद्रों पर जारी है उपार्जन
जिले में 1 दिसंबर से 69 उपार्जन केंद्रों पर धान खरीदी जारी है। नर्मदापुरम अनाज मंडी में नर्मदांचल विपणन सहकारी समिति और मप्र वेयरहाउस कॉर्पोरेशन परिसर स्थित वेयरहाउस में सहकारी समितियों द्वारा खरीदी की जा रही है। नियमों के अनुसार छोटे कांटे से तौल कर धान को सुरक्षित भंडारण में रखा जाना चाहिए, लेकिन यहां ट्रॉलियों को सीधे धर्म कांटे से तौल कर केंद्र पर खाली कराया जा रहा है। धर्म कांटे के पास लावारिश पड़ी बोरियां
रविवार को भी धर्म कांटे पर तुलाई का सिलसिला चलता रहा। इसी दौरान धर्म कांटे के पास करीब 40 बोरी धान लावारिश हालत में पड़ी मिलीं। कई बोरियां फटी हुई थीं, जिससे धान मिट्टी में फैल गई। आसपास मौजूद मवेशी धान खाते रहे, उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। मीडिया का कैमरा देखते ही समिति का एक कर्मचारी दौड़कर पहुंचा और जानवरों को भगाया, लेकिन बोरियों को सुरक्षित स्थान पर रखने की कोई पहल नहीं की गई। कुछ देर बाद फिर मवेशी वहीं मंडराते नजर आए। इन सभी बोरियों पर नर्मदांचल विपणन सहकारी समिति का टैग लगा हुआ था। गलती मानने के बजाय मंडी पर आरोप
जब इस लापरवाही को लेकर नर्मदांचल विपणन सहकारी समिति के प्रबंधक जीतू राजपूत और केंद्र प्रभारी मोहन कहार से सवाल किया गया, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी स्वीकारने के बजाय कृषि उपज मंडी प्रबंधन को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि मवेशियों को भगाने की जिम्मेदारी मंडी प्रबंधन की है। लावारिश बोरियों के सवाल पर सफाई दी गई कि परिवहन से पहले ट्रक का वजन कराया जाता है और अतिरिक्त बोरियों को टीनशेड में रखा जाना था, लेकिन उससे पहले मवेशी आ गए। खरीदी से परिवहन तक समिति जिम्मेदार
नियमों के अनुसार उपार्जन केंद्रों पर फसल की खरीदी से लेकर उसके सुरक्षित परिवहन तक की पूरी जिम्मेदारी संबंधित सहकारी समिति की होती है। यदि धान खराब होती है या उसमें मिट्टी मिलती है, तो उसकी भरपाई भी समिति को ही करनी होती है। सवालों के घेरे में व्यवस्था
सरकारी धान का इस तरह खुले में पड़ा रहना न सिर्फ लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि पूरी उपार्जन व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। किसान जहां अपनी उपज शासन के भरोसे बेचते हैं, वहीं मंडी में उसी धान का जानवरों का चारा बनना गंभीर चिंता का विषय है।


