आचरण से मर्यादा सिखाएं, केवल बोलने से नहीं बदलता समाज

आचरण से मर्यादा सिखाएं, केवल बोलने से नहीं बदलता समाज

नागौर के छोटी खाटू में मर्यादा महोत्सव :

सरसंघचालक मोहन भागवत का आह्वान, आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में महोत्सव का आयोजन

छोटी खाटू (नागौर). छोटी खाटू में जैन संत आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में आयोजित मर्यादा महोत्सव में गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संबोधित करते हुए समाज में मर्यादा, आचरण और संतुलित जीवन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया को मर्यादा सिखाने का सबसे प्रभावी माध्यम आचरण है, न कि केवल पुस्तकों का ज्ञान। संतों के सान्निध्य में रहकर ही यह संस्कार समाज तक पहुंच सकते हैं।

सरसंघचालक ने स्वयंसेवकों के शारीरिक अभ्यास का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘हम लाठी क्यों उठाते हैं, यह हमें स्मरण रहना चाहिए। इसका उद्देश्य आक्रामकता नहीं, बल्कि अनुशासन और आत्मरक्षा की भावना है।’ उन्होंने कहा कि वे बार-बार संतों के पास इसलिए आते हैं, ताकि दृष्टि और सोच निरंतर जागृत बनी रहे।

भागवत ने आर्थिक जीवन पर कहा कि पैसा कमाना आवश्यक है, लेकिन पैसे के पीछे भागना उचित नहीं। कमाए हुए धन का दान और समाज के लिए वितरण भारतीय संस्कृति की विशेषता है।

कीटनाशक की बजाए कीट नियंत्रक छिड़कें

गो संरक्षण पर उन्होंने कहा कि गाय बचाने की बात तभी सार्थक है, जब समाज स्वयं गाय पालन को अपनाए। खेती में रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर कीट नियंत्रक के उपयोग की आवश्यकता बताते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाना जरूरी है। ‘कीटों को भी जीने का अधिकार है, नियंत्रण ऐसा हो जो हमारे लिए नुकसानदायक न बने।’

खुद उदाहरण पेश करें

भागवत ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य, अहिंसा और शाश्वत सत्य की खोज भारत में निरंतर जारी रही, इसलिए यहां के पूर्वजों को केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने सूर्य और तारों के उदाहरण से आचरण की महत्ता समझाते हुए कहा कि ‘जिसका प्रकाश लेना है, उसके पास स्वयं प्रकाश होना चाहिए।’ उन्होंने समाज में आत्मीय व्यवहार अपनाने और स्वयं उदाहरण बनकर दुनिया तक भारतीय जीवन मूल्यों को पहुंचाने का आह्वान किया।

संयम, अनुशासन और संतुलन अनिवार्य

मर्यादा की परिभाषा बताते हुए उन्होंने संयम, अनुशासन और संतुलन को अनिवार्य बताया। भागवत ने कहा कि मर्यादा में चलने से समाज में अपराध कम होंगे और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।

जल, अन्न और सद्वाणी ही सच्चे रत्न, मर्यादा से ही बचेगा समाज और सृष्टि : आचार्य महाश्रमण

आचार्य महाश्रमण ने प्रवचन देते हुए मर्यादा, ज्ञान, अनुशासन और अहिंसा को जीवन का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि वास्तविक रत्न पाषाण के टुकड़े नहीं, बल्कि जल, अन्न और अच्छी वाणी हैं। मूढ़ लोगों ने भौतिक पत्थरों को रत्न मान लिया, जबकि शास्त्रों में बताए गए आध्यात्मिक रत्न ही मानव जीवन को सही दिशा देते हैं। आचार्य ने कहा कि यदि किसी को सम्यक ज्ञान देने वाला गुरु मिल जाए तो उसका जीवन सफल हो सकता है और सही दिशा प्राप्त होती है।

ज्ञान के प्रकारों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि एक ज्ञान इंद्रियों से प्राप्त होता है, दूसरा इंद्रियों की सहायता से मिलने वाला परोक्ष ज्ञान होता है। अपने भीतर का ज्ञान ही परम ज्ञान है, जिसे केवल्य ज्ञान कहा गया है। केवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद जानने को कुछ शेष नहीं रहता।

उन्होंने कहा कि अनुशासन लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजतंत्र दोनों में आवश्यक है। कर्तव्य और अनुशासन के बिना लोकतंत्र बिगड़ सकता है। मूल नीति अहिंसा ही रहनी चाहिए, लेकिन जब सारे प्रयास विफल हो जाएं और देश की रक्षा के लिए सेना को शस्त्र उठाने पड़ें तो उसे मजबूरी में किया गया कार्य माना जाना चाहिए।

प्राकृतिक मर्यादा का उदाहरण देते हुए आचार्य ने कहा कि सूर्य भी अपनी मर्यादा में चलता है और समुद्र भी अपनी सीमा में है। यदि दोनों मर्यादा तोड़ दें तो प्रलय आ जाएगा। इसी प्रकार यदि मानव मर्यादा से हट जाए तो समाज और सृष्टि दोनों संकट में पड़ जाएंगे

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