ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) आज खुद ‘बीमार’ नजर आ रहे हैं। विडंबना देखिए कि जिन केंद्रों को जिला अस्पतालों का बोझ कम करने के लिए बनाया गया था, वे आज केवल ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह गए हैं। झुंझुनूं जिले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बने ऑपरेशन थियेटर धूल फांक रहे हैं और विशेषज्ञ डॉक्टर होने के बावजूद मरीजों को एक छोटी सी गांठ कटवाने या प्रसव के लिए भी शहर की दौड़ लगानी पड़ रही है। करोड़ों का बुनियादी ढांचा, पर ताले में ऑपरेशन थियेटर झुंझुनूं के 35 केंद्रों की स्थिति भी कागजों पर मजबूत है। यहाँ अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर (OT) हैं, एनेस्थीसिया की मशीनें हैं और सर्जिकल उपकरणों का पूरा सैट मौजूद है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन थियेटरों के दरवाजे महीनों तक नहीं खुलते। विशेषज्ञ चिकित्सकों की लंबी-चौड़ी फौज होने के बावजूद सर्जरी चिकित्सा का ‘शून्य’ रहना सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गहरा आघात है। 35 केंद्र, पर नियमित सर्जरी एक पर भी नहीं झुंझुनूं जिले की स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। जिले में 35 सीएचसी क्रियाशील हैं, जहाँ वरिष्ठ सर्जन और मेडिसिन विशेषज्ञों की नियुक्तियां हैं। एक 30 बेड वाले अस्पताल में 5 डॉक्टरों की टीम होती है। इसके बावजूद ग्रामीण अंचल का कोई भी मरीज इन केंद्रों पर अपनी सर्जरी करवाने का भरोसा नहीं जुटा पा रहा है। परिणाम स्वरूप, झुंझुनूं के बीडीके (BDK) अस्पताल और नवलगढ़ जिला अस्पताल पर मरीजों का सैलाब उमड़ रहा है। बीडीके अस्पताल पर ‘ओवरलोड’: रोजाना 25 जिंदगियों का जिम्मा जब गांवों के 35 केंद्रों पर सर्जरी नहीं होती है तो पूरा बोझ BDK हॉस्पिटल पर आ जाता है।। मासिक ऑपरेशन: करीब 700 दैनिक औसत: 23 से 25 सर्जरी प्रसव संबंधी सर्जरी (C-Section): हर महीने लगभग 200 यही हाल नवलगढ़ अस्पताल का है, जहां प्रतिदिन 10-12 ऑपरेशन हो रहे हैं। जिला अस्पतालों में वेटिंग लिस्ट लंबी होती जा रही है, जिससे गरीब मरीजों को विवश होकर निजी अस्पतालों की महंगी सेवाओं का रुख करना पड़ता है। विशेषज्ञों की फौज और ‘रेफर’ का खेल सीएचसी स्तर पर तैनात विशेषज्ञ डॉक्टर वेतन तो विशेषज्ञता का ले रहे हैं, लेकिन उनका अधिकांश समय ओपीडी में सामान्य सर्दी-जुकाम के मरीज देखने या कागजी खानापूर्ति में बीत रहा है। जटिल केस तो दूर, सामान्य हर्निया, अपेंडिक्स या नसबंदी जैसे ऑपरेशन के लिए भी मरीजों को जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। अविश्वास की खाई: सिस्टम की विफलता या जनता का डर स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इस विफलता का ठीकरा जनता के सिर फोड़ते नजर आते हैं। अधिकारियों का तर्क है कि मरीज खुद सीएचसी पर ऑपरेशन नहीं करवाना चाहते। सवाल ये भी है। क्या आपात स्थिति के लिए ब्लड बैंक या बैकअप की व्यवस्था है? क्या प्रशासन ने कभी ग्रामीणों में इन केंद्रों के प्रति विश्वास जगाने का प्रयास किया? सीएमएचओ डॉ. छोटेलाल गुर्जर कहते हैं कि जिले की सभी 35 सीएचसी पर पर्याप्त मेडिकल स्टाफ तैनात है। सर्जरी तभी संभव है जब मरीज इसके लिए तैयार हों। अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोग बड़े अस्पतालों में ही ऑपरेशन को प्राथमिकता देते हैं।


