ड्रैगन फ्रूट की खेती से लिखी सफलता की कहानी:लातेहार की महिला किसान सिबलिन बाड़ा कहलाती हैं “ड्रैगन लेडी”, ‎गांव में ला रही बदलाव

ड्रैगन फ्रूट की खेती से लिखी सफलता की कहानी:लातेहार की महिला किसान सिबलिन बाड़ा कहलाती हैं “ड्रैगन लेडी”, ‎गांव में ला रही बदलाव

मैंने परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए आधुनिक फल उत्पादन‎ की ओर कदम बढ़ाया और ड्रैगन फ्रूट की खेती से अपने गांव ही शुरू कर एक नई पहचान बनाई। पति माइकल‎ कुजूर के निधन के बाद मैंने यह कदम तब उठाया। कुछ नया करने का सपना देखा और उस सपने को हकीकत में‎ बदला। बेटे अनिल कुजूर ने इस पहल में मेरा पूरा साथ दिया। बेटे अनिल ने इंटरनेट और कृषि विभाग की सलाह‎ लेकर ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी जुटाई। नर्सरी में काम से लेकर पौधों की देखभाल तक में उसका सहयोग‎ बहुत बड़ा है। मुझे देखकर कई अन्य किसान नर्सरी का काम करने लगे हैं, जो अच्छी आमदनी कर रहे हैं। दोनों ने‎ मिलकर करीब एक साल पहले खेत में पौधों की रोपाई की। आज वही खेत लाल-गुलाबी ड्रैगन फलों से लहलहा‎ रहे हैं। पहले साल में ही उम्मीद से ज़्यादा आमदनी हुई है। सालभर मिलता हैं फल, मेहनत भी कम सिबलिन मुस्कुराते हुए बताती हैं… ड्रैगन फ्रूट का बाजार‎ अच्छा है, मेहनत भी कम है और फल सालभर मिलता रहता है। अब तक लगभग एक हजार फल बेच लिए, जो‎ प्रति फल ₹100 तक के भाव में बिके हैं। एक पौधा साल में कई बार फल देता है और ठंड के मौसम तक उत्पादन‎ जारी रहता है। इससे सालभर स्थायी आमदनी संभव होती है। आज जिले के कई किसान प्रेरित होकर कृषि और‎ नर्सरी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।‎ मेहनत और विज्ञान का संगम ड्रैगन फ्रूट को ‘सुपर फ्रूट’ कहा जाता है, क्योंकि यह विटामिन, फाइबर और‎ एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। इसमें अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती और ड्रिप सिंचाई प्रणाली से इसका‎ उत्पादन और भी बेहतर होता है। एक पौधा 8–12 महीने में फल देने लगता है। हर साल 10 से 15 किलो तक‎ फल दे सकता है। इसकी बेलनुमा डालियों को सहारे की ज़रूरत होती है, इसलिए अपने खेत में कंक्रीट पोल लगाए‎ हैं। ड्रैगन फ्रूट से कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं। यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है।‎ आसपास की महिलाएं हो रहीं प्रेरित, हो रहा है बदलाव‎ यदि लगन और समझदारी से काम किया जाए, तो सीमित संसाधनों में भी आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की जा‎ सकती है। उनकी यह पहल अब आसपास की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रही है। गांव की कई महिलाएं‎ सिबलिन से ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में सीखने आ रही हैं और यही असली बदलाव की शुरुआत है। सिबलिन‎ बड़ा जैसी महिलाएं न सिर्फ अपने परिवार का जीवन बदल रही हैं, बल्कि ग्रामीण भारत की तस्वीर भी बदल रही‎ हैं।‎ जानिए… कौन हैं सिबलिन बाड़ा‎ महुआ डांड के हरतुआ गांव की सिबलिन बाड़ा मैट्रिक पास हैं और वर्तमान में लगभग 3 एकड़ जमीन पर खेती‎ कर रही हैं। आज मेहनत और तकनीक के सहारे सालाना ₹3-₹4 लाख की आमदनी कर लेती हैं। गांव और‎ आसपास के लोग भी इनकी खेती को देखकर प्रेरित होते हैं। कुछ लोग जानकारी लेते आते हैं, जिन्हें स्वेच्छा से‎ वे पूरी जानकारी देते हैं। ताकि, इससे भी बढ़िया खेती कर सकें। उनका पांच बेटा है। जिसमे तीन बाहर नौकरी‎ करते हैं। जबकि, अनिल कुजूर व एक अन्य बेटा मां के साथ घर पर रहता है।‎ मैंने परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए आधुनिक फल उत्पादन‎ की ओर कदम बढ़ाया और ड्रैगन फ्रूट की खेती से अपने गांव ही शुरू कर एक नई पहचान बनाई। पति माइकल‎ कुजूर के निधन के बाद मैंने यह कदम तब उठाया। कुछ नया करने का सपना देखा और उस सपने को हकीकत में‎ बदला। बेटे अनिल कुजूर ने इस पहल में मेरा पूरा साथ दिया। बेटे अनिल ने इंटरनेट और कृषि विभाग की सलाह‎ लेकर ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी जुटाई। नर्सरी में काम से लेकर पौधों की देखभाल तक में उसका सहयोग‎ बहुत बड़ा है। मुझे देखकर कई अन्य किसान नर्सरी का काम करने लगे हैं, जो अच्छी आमदनी कर रहे हैं। दोनों ने‎ मिलकर करीब एक साल पहले खेत में पौधों की रोपाई की। आज वही खेत लाल-गुलाबी ड्रैगन फलों से लहलहा‎ रहे हैं। पहले साल में ही उम्मीद से ज़्यादा आमदनी हुई है। सालभर मिलता हैं फल, मेहनत भी कम सिबलिन मुस्कुराते हुए बताती हैं… ड्रैगन फ्रूट का बाजार‎ अच्छा है, मेहनत भी कम है और फल सालभर मिलता रहता है। अब तक लगभग एक हजार फल बेच लिए, जो‎ प्रति फल ₹100 तक के भाव में बिके हैं। एक पौधा साल में कई बार फल देता है और ठंड के मौसम तक उत्पादन‎ जारी रहता है। इससे सालभर स्थायी आमदनी संभव होती है। आज जिले के कई किसान प्रेरित होकर कृषि और‎ नर्सरी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।‎ मेहनत और विज्ञान का संगम ड्रैगन फ्रूट को ‘सुपर फ्रूट’ कहा जाता है, क्योंकि यह विटामिन, फाइबर और‎ एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। इसमें अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती और ड्रिप सिंचाई प्रणाली से इसका‎ उत्पादन और भी बेहतर होता है। एक पौधा 8–12 महीने में फल देने लगता है। हर साल 10 से 15 किलो तक‎ फल दे सकता है। इसकी बेलनुमा डालियों को सहारे की ज़रूरत होती है, इसलिए अपने खेत में कंक्रीट पोल लगाए‎ हैं। ड्रैगन फ्रूट से कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं। यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है।‎ आसपास की महिलाएं हो रहीं प्रेरित, हो रहा है बदलाव‎ यदि लगन और समझदारी से काम किया जाए, तो सीमित संसाधनों में भी आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की जा‎ सकती है। उनकी यह पहल अब आसपास की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रही है। गांव की कई महिलाएं‎ सिबलिन से ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में सीखने आ रही हैं और यही असली बदलाव की शुरुआत है। सिबलिन‎ बड़ा जैसी महिलाएं न सिर्फ अपने परिवार का जीवन बदल रही हैं, बल्कि ग्रामीण भारत की तस्वीर भी बदल रही‎ हैं।‎ जानिए… कौन हैं सिबलिन बाड़ा‎ महुआ डांड के हरतुआ गांव की सिबलिन बाड़ा मैट्रिक पास हैं और वर्तमान में लगभग 3 एकड़ जमीन पर खेती‎ कर रही हैं। आज मेहनत और तकनीक के सहारे सालाना ₹3-₹4 लाख की आमदनी कर लेती हैं। गांव और‎ आसपास के लोग भी इनकी खेती को देखकर प्रेरित होते हैं। कुछ लोग जानकारी लेते आते हैं, जिन्हें स्वेच्छा से‎ वे पूरी जानकारी देते हैं। ताकि, इससे भी बढ़िया खेती कर सकें। उनका पांच बेटा है। जिसमे तीन बाहर नौकरी‎ करते हैं। जबकि, अनिल कुजूर व एक अन्य बेटा मां के साथ घर पर रहता है।‎  

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