पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सब इंजीनियरों की भर्ती में जमकर भष्ट्राचार हुआ था। कुल 275 पद थे, लेकिन चयन समिति ने 383 सब इंजीनियरों का सलेक्शन कर लिया। इनमें से 89 लोग ऐसे थे, जिनकी परीक्षा देने तक वांछित शैक्षणिक योग्यता ही नहीं थी। इसके बावजूद चयन समिति के पदाधिकारियों ने उनका चयन कर लिया। करीब 14 साल हो गए चयन समिति के पदाधिकारियों की भूमिका की जांच ही नहीं की गई है। हाल ही में हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी मानते हुए भर्ती को रद्द कर दिया है। अब पूरे फर्जीवाड़े की जांच की जिम्मेदारी पुलिस पर आ गई है। हालांकि इस तरह के फर्जीवाड़े की जांच पुलिस के बजाय एसीबी-ईओडब्ल्यू जैसी एजेंसी करती है।
क्या है मामला
वर्ष 2011-12 में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सिविल सब इंजीनियरों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया। इसमें 275 पदों पर भर्ती किया जाना था। इसके लिए 23 फरवरी 2011 को विज्ञापन जारी हुआ और 23 मार्च 2011 तक आवेदन आमंत्रित किए गए थे। भर्ती प्रक्रिया में ऐसे व्यक्तियों को नियुक्ति दे दी गई, जिनकी शैक्षणिक अर्हता 23 मार्च 2011 तक पूरी नहीं हुई थी। कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें न तो प्रमाण पत्र सत्यापन के लिए बुलाया गया और न अभ्यर्थियों की सूची में उनका नाम था। नियुक्ति आदेश में भी उनका नाम नहीं था। कुल विज्ञापित पदों 275 से अधिक 383 सब इंजीनियरों को नियुक्ति दी गई थी। इस फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए भारतेंदु कुमार कमल ने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों, एसीबी-ईओडब्ल्यू से शिकायत की थी, लेकिन मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद पीडि़त ने न्यायालय में परिवाद दायर किया। न्यायालय ने इस मामले में पुलिस को एफआईआर करके जांच के आदेश दिए। इसके बाद सिविल लाइन थाना में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ 16 अप्रैल 2022 को एफआईआर दर्ज की गई।
89 अभ्यर्थियों ने ली थी अग्रिम जमानत
मामले में 89 अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता, चयन का तरीका आदि गलत पाया गया था। फिर भी उनकी पोस्टिंग विभाग में कर दी गई थी। मामले में एफआईआर होने के बाद 89 अभ्यर्थियों ने संभावित कार्रवाई-गिरफ्तारी आदि से बचने के लिए हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली। दूसरी ओर पुलिस ने एफआईआर तो कर ली, लेकिन फर्जीवाड़़े की जांच पिछले 4 साल से सही ढंग से नहीं कर रही है।
चयन समिति पर आंच क्यों नहीं
पूरे फर्जीवाड़े में अहम भूमिका चयन समिति वालों की है, जिसे बचाने का भरसक प्रयास किया जा रहा है। दरअसल भर्ती परीक्षा व्यावसायिक परीक्षा मंडल ले लिया था। मेरिट के आधार पर चयन सूची पंचायत एवं ग्रामीण विभाग को सौंप दी गई। इसके आधार पर विभाग ने भर्ती के लिए अलग से चयन समिति बनाई। भर्ती की अंतिम प्रक्रिया इसी समिति द्वारा की गई। इसके लिए कामकाज के आधार पर एक मुख्य चयन समिति बनाई गई थी, जिसके नीचे दो अन्य चयन समिति थी। तीनों समिति में कुल 5 पदाधिकारी थे। इन्हीं अधिकारियों ने भर्ती की प्रक्रिया पूरी की। सबसे बड़ा सवाल है कि जब 89 अभ्यर्थियों ने व्यापमं की परीक्षा देते समय ही सब इंजीनियर की शैक्षणिक योग्यता पूरी नहीं की थी, तो उनका चयन कैसे कर लिया गया। और चयन समिति ने उनको नियुक्ति कैसे दे दी? जबकि ओएमआरशीट में भी शैक्षणिक योग्यता पूरी होने की झूठी जानकारी दी थी।


