Iran- Israel War: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बहरीन ने प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव पर आज UNSC में वोटिंग होने वाली थी, लेकिन गुड्स फाइडे की वजह से आज होने वाली वोटिंग स्थगित कर दी गई है। वोटिंग की अगली तिथि को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
बहरीन के प्रस्ताव में क्या था?
बहरीन द्वारा लाए गए प्रस्ताव हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय नौवहन को सुरक्षित करने के लिए सिर्फ रक्षात्मक साधनों का इस्तेमाल करने की इजाजत देता है। दरअसल, ईरान ने इस जलडमरूमध्य को ज्यादातर बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
वहीं, पहले के मसौदे में देशों को सभी जरूरी उपायों के इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। संयुक्त राष्ट्र की भाषा में इसे संभावित सैन्य कार्रवाई माना जाता है, ताकि समुद्री आवाजाही सुरक्षित रहे और अंतरराष्ट्रीय आवाजाही में दखल देने की कोशिशों को रोका जा सके, लेकिन अंतिम मसौदे की भाषा को बदला गया। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य और आस-पास के पानी में हालात के हिसाब से सभी ज़रूरी और उचित रक्षात्मक उपायों का इस्तेमाल करने की अनुमति दिए जाने की बात शामिल है।
कहां है होर्मुज जलडमरूमध्य ?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानि होर्मुज जलडमरूमध्य ओमान और ईरान के बीच स्थित संकरी जलसंधि है। यह दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा की धुरी मानी जाती है। इसकी चौड़ाई महज 33 से 39 किलोमीटर के बीच है, लेकिन इसका भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्व असाधारण है।
तेल और गैस की लाइफलाइन: दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत और वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 17 प्रतिशत इसी मार्ग से गुज़रता है। प्रतिदिन लगभग 170 से 210 लाख बैरल तेल इस संकरी राह से होकर एशिया, यूरोप और अन्य बाज़ारों तक पहुँचता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, इराक और कतर — इन सभी प्रमुख तेल निर्यातक देशों के लिए यह जलमार्ग एकमात्र समुद्री निकास द्वार है।
एलएनजी का सबसे बड़ा गलियारा: तेल के अलावा, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा भी इसी रास्ते से होता है। कतर, जो दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में से एक है, अपनी गैस का निर्यात मुख्यतः इसी जलडमरूमध्य से करता है। यूरोप और एशिया के देश जो रूसी गैस पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत और एशिया पर सीधा असर: भारत अपनी तेल ज़रूरतों का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है और उसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि होर्मुज़ का रास्ता बंद हो जाए तो भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। भारत के लिए तो यह और भी संवेदनशील है क्योंकि खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी भी रहते हैं जो देश को रेमिटेंस भेजते हैं।
वैकल्पिक रास्ते हैं बड़े महंगे: सऊदी अरब ने अबकैक-यानबू पाइपलाइन जैसे कुछ विकल्प बनाए हैं, लेकिन वे पूरी तरह से होर्मुज की क्षमता की भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं। केप ऑफ गुड होप होकर जाने वाला वैकल्पिक मार्ग हज़ारों किलोमीटर लंबा है और शिपिंग लागत कई गुना बढ़ा देता है, जिसका असर सीधे आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।
तेल की कीमतों पर तत्काल असर: जब भी होर्मुज़ में तनाव बढ़ता है, अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में कीमतें तुरंत उछाल मारती हैं। 2019 में ईरान द्वारा कुछ टैंकरों को जब्त किए जाने के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम उछल गए थे। वर्तमान संकट में यदि मार्ग पूरी तरह बाधित रहे तो वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।


