दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन शनिवार को भक्तिमय वातावरण में हुआ। अंतिम दिन श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस कथा में संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी पदमहस्ता भारती ने सुदामा प्रसंग एवं रुक्मिणी विवाह प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने कहा- सच्ची भक्ति, समर्पण और निष्काम प्रेम ही आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है। प्रवचन के दौरान साध्वी ने कहा- अध्यात्म मनुष्य को आत्मनिरीक्षण का अवसर देता है। जैसे दर्पण में चेहरा देखकर उसे सुधारा जाता है, उसी तरह अध्यात्म के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मा को सुधार सकता है। उन्होंने बताया- मन के परिष्कार के लिए एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु का मार्गदर्शन की जरूरत है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा- सामाजिक सुधार का आधार आध्यात्मिक जागृति है। व्यक्ति जब खुद के लिए जागरूक होता है, तभी वह समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का सही से निर्वहन कर पाता है। कथा के आखिरी दिन गणगौर पर्व का पूजन भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया गया, जिसमें महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस दौरान नशे से दूरी बनाने के लिए शपथ भी दिलाई गई।


